कच्चे तेल के खेल से भारत बेफिक्र,क्यो ?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की प्रभावी बंदी के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में अभूतपूर्व संकट गहराया हुआ है। ईरान की कार्रवाई से खाड़ी के क्षेत्र से 20 प्रतिशत वैश्विक तेल और एलएनजी निर्यात प्रभावित हुआ है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
भारत के पास कच्चे तेल की कमी नहीं
जापान, दक्षिण कोरिया व दूसरे सबसे बड़े तेल आयातक देशों के भीतर साफ असर दिख रहा है। लेकिन इस हालात में भी दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश यानी भारत की रिफाइनरियों के पास कच्चे तेल की कोई बड़ी कमी नहीं है। सरकार ने तीन हफ्ते पहले दावा किया था कि देश में 74 दिनों के उपभोग के हिसाब से कच्चा तेल उपलब्ध है। दैनिक जागरण के पास जो ताजा जानकारी है उसके मुताबिक भारतीय रिफाइनरियों, पेट्रोल पंपों और रणनीतिक भंडारण मिला कर कम से कम 60 दिनों का भंडार अभी भी है।
अपनी जरूरत का 85-90 फीसद तक कच्चा तेल बाहर आयात करने वाले देश भारत ने यह स्थिति ऐसे ही नहीं हासिल की है। पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, ‘पश्चिम एशिया संघर्ष की शुरुआत होने के साथ ही (मार्च के पहले हफ्ते से) भारतीय रिफाइनरियां एक तरह से दुनिया में जहां भी क्रूड मिल रहा है, वहां से खरीद कर रही हैं।’
सूत्रों के मुताबिक, ‘मार्च के अंतिम हफ्तों और अप्रैल में भारत रूस और अमेरिका से तेल खरीद कई गुणा (पिछले महीनों के मुकाबले) बढ़ा चुका है। ये दोनों देश भारत के शीर्ष पांच तेल आपूर्तिकर्ता देशों में आ चुके हैं।’
इस बात का आधिकारिक डेटा तो सरकार ने जारी नहीं किया है लेकिन विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक रूस से अब भारत औसतन 20 लाख बैरल की खरीद कर रहा है। इससे पहले रूस से इतनी ज्यादा क्रूड की खरीद अप्रैल, 2023 (21 लाख बैरल प्रति दिन) में की गई थी।
क्रूड ऑयल के स्टॉक की निगरानी
देश में क्रूड के स्टॉक की निगरानी के लिए चौबीसों घंटे काम करने वाले एक कंट्रोल रूम भी स्थापित है। तेल की खरीद निश्चित तौर पर इंडियन ऑयल, ओएनजीसी, बीपीसीएल,एचपीसीएल, रिलायंस जैसी कंपनियां वाणिज्यिक आधार पर कर रही हैं लेकिन इनकी मदद के लिए पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की संयुक्त मदद मिल रही है।
असलियत में दुनिया भर में फैले भारतीय दूतावासों व मिशनों के लिए अभी सबसे बड़ा काम यहीं है कि वह ऊर्जा खरीद से जुड़े अभियानों में भारतीय कंपनियों की मदद करें।
इसका असर यह हुआ है कि पहले मैक्सिको, ब्राजील, नाइजीरिया, घाना, गुयाना जैसे देशों से सीमित मात्रा में तेल की खरीद होती थी लेकिन अब वह एक बड़े आपूर्तिकर्ता के तौर पर सामने गये हैं। पश्चिम एशिया के हालात सुधरने तक यही स्थिति रहेगी।
सरकार ने मार्च के अंतिम सप्ताह में संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक एसपीआर (विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर) में 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता के मुकाबले 3.37 मिलियन मीट्रिक टन (64 प्रतिशत) कच्चा तेल भरा हुआ था, जो पूर्ण क्षमता पर लगभग 9.5 दिनों का बफर प्रदान करता है।
बाकी लगभग 50 दिनों का स्टाक तेल कंपनियों, तेल उत्पादक कंपनियों व पेट्रोल पंपों के पास है। 14 अप्रैल तक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
पीपीएसी की वेबसाइट से प्राप्त नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में पेट्रोल (एमएस) की कुल खपत 42,586 हजार मीट्रिक टन रही, जबकि डीजल (एचएसडी) की खपत 94,704 हजार मीट्रिक टन (लगभग 94.70 मिलियन मीट्रिक टन) रही। यह आंकड़े प्रोविजनल हैं और अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक के मासिक डेटा पर आधारित हैं।
मार्च 2026 में अकेले पेट्रोल की खपत 3,779 हजार मीट्रिक टन और डीजल की 8,726 हजार मीट्रिक टन रही, जो आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को दर्शाता है। देश में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत पिछले वित्त वर्ष के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है जो भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों का संकेत है। साथ ही यह भी साबित करता है कि जरूरतों को पूरा किया गया है।
