माँ की जिंदगी हो रही महफूज, सरकारी अस्पतालों में संस्थागत प्रसव में 13% का उछाल
• माताओं की जिंदगी हो रही सुरक्षित
• जब घर में प्रसव कराना पड़ता था भारी, अब सारण की माँएं चुन रही हैं अस्पताल
• प्रसव पूर्व जांच में 10% की बढ़त
श्रीनारद मीडिया, पंकज मिश्रा, अमनौर/छपरा (बिहार):

छपरा। मातृ मृत्यु दर किसी भी देश और समाज की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि उन महिलाओं की जिंदगी की कहानी है, जो गर्भावस्था या प्रसव के दौरान समय पर इलाज, जागरूकता या संसाधनों के अभाव में अपनी जान गंवा बैठती हैं। ऐसे में मातृ मृत्यु दर को कम करना न केवल स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता है, बल्कि यह सामाजिक जिम्मेदारी भी बन चुकी है। सारण जिले में हाल के वर्षों में इस दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है, जो उम्मीद जगाता है कि आने वाले समय में स्थिति और बेहतर होगी।
विश्व स्तर पर निर्धारित सतत विकास लक्ष्य (SDG) के तहत मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) को 70 प्रति एक लाख जीवित जन्म से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है। भारत ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2014-16 में जहां देश का एमएमआर 130 था, वहीं 2018-20 में यह घटकर 97 और 2020-22 में 88 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गया है। यह गिरावट बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और जागरूकता में वृद्धि का परिणाम है।
बिहार की स्थिति में सुधार
बिहार, जो कभी उच्च मातृ मृत्यु दर के लिए जाना जाता था, अब तेजी से सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य का एमएमआर घटकर 91 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गया है, जो पहले 118 से अधिक था। हालांकि यह राष्ट्रीय औसत 88 से थोड़ा अधिक है, लेकिन अंतर तेजी से कम हो रहा है।
सारण में सकारात्मक बदलाव
सारण जिले में भी मातृ स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार देखने को मिला है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-20) के अनुसार, जिले में 73 प्रतिशत प्रसव अब स्वास्थ्य संस्थानों में हो रहे हैं, जबकि 2015-16 में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत था। यानी 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। सरकारी संस्थानों में प्रसव की संख्या में 13.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही, चार प्रसव पूर्व जांच (ANC) कराने वाली महिलाओं की संख्या में भी लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
इस बदलाव के पीछे सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं की बड़ी भूमिका है। वर्ष 2005 में शुरू की गई जननी सुरक्षा योजना ने गरीब और वंचित वर्ग की महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के लिए प्रोत्साहित किया। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिससे वे बेहतर पोषण और देखभाल सुनिश्चित कर सकें। जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत गर्भवती महिलाओं को मुफ्त इलाज, दवा, जांच और अस्पताल आने-जाने की सुविधा मिल रही है, जिससे उनके ऊपर आर्थिक बोझ कम हुआ है।
हर गर्भवती महिला को मिल रही है सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं
इसके अलावा, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (सुमन) योजना के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि हर गर्भवती महिला को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं की विशेष जांच की जाती है, जिससे हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान हो सके। लक्ष्य कार्यक्रम के तहत प्रसव कक्षों और ऑपरेशन थिएटर की गुणवत्ता में सुधार किया गया है, जिससे प्रसव के दौरान जोखिम कम हुआ है।
जमीनी स्तर पर आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सेविकाएं और एएनएम की भूमिका भी बेहद अहम रही है। ये स्वास्थ्यकर्मी गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण कराती हैं, उन्हें समय पर जांच के लिए प्रेरित करती हैं और जरूरत पड़ने पर अस्पताल तक पहुंचाने में मदद करती हैं। इसके साथ ही मातृ मृत्यु निगरानी प्रणाली (एमडीएसआर) के जरिए हर मृत्यु की समीक्षा कर कारणों की पहचान की जाती है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
सदर अस्पताल की पूर्व स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. नीला सिंह बताती हैं, संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी और नियमित एएनसी जांच से मातृ मृत्यु दर में काफी कमी आई है। अब हाई-रिस्क गर्भावस्था की पहचान समय पर हो जाती है, जिससे जटिल मामलों को संभालना आसान हुआ है। हालांकि अभी भी एनीमिया और कुपोषण जैसी समस्याएं बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
वहीं, आशा कार्यकर्ता सीमा देवी कहती हैं कि पहले गांव की महिलाएं घर पर ही प्रसव कराती थीं, लेकिन अब हम उन्हें अस्पताल जाने के लिए समझाते हैं। सरकार की योजनाओं का लाभ मिलने से भी महिलाओं का रुझान बढ़ा है। अब लोग जागरूक हो रहे हैं और सुरक्षित प्रसव को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इसके बावजूद चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, एनीमिया और कुपोषण की समस्या, समय पर अस्पताल पहुंचने में दिक्कत और कुछ जगहों पर अब भी जागरूकता की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इन पर ध्यान देना जरूरी है ताकि मातृ मृत्यु दर को और कम किया जा सके।
निजी अस्पताल से बेहतर व्यवस्था
सदर प्रखंड के करिंगा निवासी रीना देवी बताती है कि पहले सोचती थी सरकारी अस्पताल में क्या होगा। लेकिन MCH वार्ड में कदम रखते ही भरोसा हो गया। साफ-सफाई, अच्छा खाना, समय पर दवा और सुरक्षित प्रसव सब कुछ मिला। जाते वक्त पोषण किट भी दी।
मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहा सुधार:
सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी ने बताया कि सारण जिले में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहा सुधार एक सकारात्मक संकेत है। यदि सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, स्वास्थ्य कर्मियों की सक्रियता और समाज की भागीदारी इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब मातृ मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर लाकर हर मां और नवजात के जीवन को सुरक्षित किया जा सकेगा।
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