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राजनीति साहित्य को क्यों अपना उपनिवेश बनाए रखना चाहती है?

राजनीति साहित्य को क्यों अपना उपनिवेश बनाए रखना चाहती है?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

 

राजनीति को साहित्य से केवल भय ही नहीं होता, आकर्षण भी होता है। राजनीति जानती है कि जनता का मन केवल योजनाओं और भाषणों से नहीं जीता जा सकता। मनुष्य आँकड़ों से कम, कथाओं से अधिक प्रभावित होता है। इसीलिए हर राजनीतिक व्यवस्था अपने लिए एक सांस्कृतिक आख्यान गढ़ती है। कोई राष्ट्रीयता की कथा रचता है, कोई क्रांति की, कोई धर्म की। कोई जाति की, कोई विकास की, कोई सामाजिकता का बयान देता है। साहित्य इन आख्यानों को भाषा, संवेदना और भावनात्मक गहराई देता है। बिना कविता के नारा जल्दी थक जाता है। बिना कहानी के विचार सूखा लगने लगता है। राजनीति साहित्य से अपनी आत्मा उधार लेना चाहती है।

लेकिन समस्या यहीं शुरू होती है। जैसे ही साहित्य सत्ता की भाषा बोलने लगता है, उसकी स्वतंत्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है। वह मनुष्य के अनुभव की जटिलता को छोड़कर घोषणाओं में बदलने लगता है। कविता तब प्रश्न नहीं पूछती, प्रमाणपत्र बाँटने लगती है। कहानी तब जीवन को नहीं, विचारधारा को सिद्ध करने लगती है। साहित्य का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब वह मनुष्य को देखने के बजाय “उपयोगी नागरिक” देखने लगे।

राजनीति अपने अनुकूल लेखक तैयार करना चाहती है। यह प्रक्रिया हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होती। कभी पुरस्कारों के माध्यम से, कभी संस्थाओं के माध्यम से, कभी पाठ्यक्रमों के माध्यम से, कभी सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से। धीरे-धीरे कुछ नाम लगातार सामने रखे जाते हैं, कुछ नाम धीरे-धीरे धुँधले कर दिए जाते हैं। साहित्य का इतिहास केवल रचनात्मकता का इतिहास नहीं, चयन और बहिष्कार का इतिहास भी है। कौन पढ़ाया जाएगा, कौन भुला दिया जाएगा, यह भी सत्ता-संबंधों से प्रभावित होता है।

विश्वविद्यालय इस प्रक्रिया के सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल बन जाते हैं। वहाँ साहित्य केवल पढ़ाया नहीं जाता, उसकी व्याख्या भी निर्मित की जाती है। कोई कविता किस दृष्टि से पढ़ी जाएगी, कौन-सा लेखक प्रगतिशील कहलाएगा, कौन प्रतिक्रियावादी, कौन “राष्ट्रीय”, कौन “विरोधी” – ये सभी निर्णय धीरे-धीरे वैचारिक संरचनाओं का हिस्सा बन जाते हैं। छात्र कई बार साहित्य पढ़ने से पहले ही उसके बारे में तय धारणाएँ सीख लेते हैं। साहित्य तब खुला अनुभव न रहकर वैचारिक नक्शे में बदलने लगता है।

राजनीति को सबसे अधिक असुविधा उन लेखकों से होती है जो किसी एक खेमे में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। जो न पूरी तरह समर्थन करते हैं, न पूरी तरह विरोध क्योंकि राजनीति स्पष्ट पहचान चाहती है। उसे ऐसे लोग पसंद हैं जिन्हें आसानी से वर्गीकृत किया जा सके। लेकिन बड़े लेखक अक्सर वर्गीकरण से बाहर निकल जाते हैं। वे अपनी ही विचारधारा से भी प्रश्न पूछ लेते हैं। यही उनकी स्वतंत्रता है और यही उनकी कठिनाई।

कई बार राजनीति साहित्य को सीधे नियंत्रित नहीं करती बल्कि उसे थका देती है। लेखक को इतने विवादों, प्रतिक्रियाओं और वैचारिक संघर्षों में उलझा दिया जाता है कि वह गहरे सृजन के लिए आवश्यक एकांत खो देता है। आज का समय लगातार प्रतिक्रिया माँगता है। हर घटना पर तुरंत वक्तव्य, हर विवाद पर तुरंत पक्ष। धीरे-धीरे लेखक भी सार्वजनिक मुद्रा में जीने लगता है। उसके भीतर का शांत, धैर्यवान, निरीक्षणशील मन कमजोर होने लगता है। राजनीति को हमेशा सक्रिय भीड़ चाहिए; साहित्य को कई बार लंबी चुप्पी।

बाजार ने इस संबंध को और उलझा दिया है। अब साहित्य पर केवल राज्य का दबाव नहीं, लोकप्रियता का दबाव भी है। कौन-सी किताब बिकेगी, कौन-सा लेखक ट्रेंड करेगा, कौन-सा वक्तव्य वायरल होगा। लेखक धीरे-धीरे पाठक से कम, दृश्यता से अधिक संवाद करने लगता है। राजनीति और बाजार दोनों को तेज प्रभाव चाहिए। साहित्य का स्वभाव धीमा है। वह समय लेता है, भीतर उतरता है, कई बार तुरंत समझ में भी नहीं आता। यही धीमापन आज की दुनिया में उसके लिए संकट भी है और गरिमा भी।

फिर भी साहित्य बार-बार बच निकलता है। यह उसकी सबसे रहस्यमय क्षमता है। कोई कवि सेंसरशिप के बीच रूपकों में सच कह देता है। कोई उपन्यासकार प्रेम कथा के भीतर पूरा सामाजिक विघटन लिख देता है। कोई लोकगायक व्यंग्य में सत्ता की आलोचना कर देता है। शब्दों की दुनिया में प्रतिरोध हमेशा सीधे नारों में नहीं आता; कई बार वह करुणा बनकर आता है, कई बार स्मृति बनकर, कई बार हास्य बनकर।

लोक साहित्य को पूरी तरह नियंत्रित करना सबसे कठिन रहा है। गाँव की औरत जब चक्की पीसते हुए गीत गाती है, तो वह किसी सरकारी सांस्कृतिक नीति से निर्देशित नहीं होती। किसान जब फसल, सूखा या कर वसूली पर लोकगीत बनाता है, तब वह अपने समय का वास्तविक दस्तावेज रच रहा होता है। राजनीति अक्सर लिखित साहित्य पर नियंत्रण स्थापित कर लेती है, लेकिन लोक की स्मृति में बचे शब्द लंबे समय तक स्वतंत्र बने रहते हैं। इसी कारण लोक परंपराएँ कई बार आधिकारिक इतिहास से अधिक सच्ची लगती हैं।

राजनीतिक विचारधाराएँ अक्सर साहित्य से “प्रतिबद्धता” माँगती हैं। लेकिन साहित्य की सबसे बड़ी प्रतिबद्धता अंततः मनुष्य से होती है। यदि वह केवल किसी दल, किसी विचारधारा या राजनीति का उपकरण बन जाए तो उसकी मानवीय जटिलता समाप्त होने लगती है। बड़ा साहित्य हमेशा मनुष्य को उसके पूरे विरोधाभास के साथ देखता है। उसमें अपराधी भी मनुष्य होता है, पीड़ित भी, शासक भी, विद्रोही भी। राजनीति अक्सर संसार को दो हिस्सों में बाँटती है; साहित्य उन दोनों हिस्सों के बीच की धुँधली जगहों को भी देखता है।

शायद इसी कारण इतिहास बदलने के बाद भी महान साहित्य बचा रहता है। साम्राज्य टूट जाते हैं, विचारधाराएँ कमजोर पड़ जाती हैं, नारे पुराने हो जाते हैं लेकिन कुछ कविताएँ, कुछ उपन्यास, कुछ गीत जीवित रहते हैं क्योंकि वे केवल सत्ता या विरोध के दस्तावेज नहीं होते, वे मनुष्य की गहरी अनुभूतियों के दस्तावेज होते हैं।

राजनीति को सबसे अधिक भय इसी बात से होता है कि साहित्य मनुष्य को अकेले में सोचने की आदत देता है। भीड़ में खड़ा आदमी नारे दोहरा सकता है लेकिन जब वही आदमी रात में अकेले कोई कविता पढ़ता है, तब उसके भीतर प्रश्न जन्म लेते हैं। राजनीति को नियंत्रित भीड़ चाहिए, साहित्य जागा हुआ मनुष्य पैदा करता है।

शायद इसीलिए हर युग में शब्दों पर निगाह रखी गई। कवियों पर संदेह किया गया। किताबों से डर पैदा हुआ। क्योंकि इतिहास जानता है कि तलवारें कई बार साम्राज्य बनाती हैं लेकिन शब्द मनुष्य की आत्मा बदल देते हैं। और जिसकी आत्मा बदल जाए, उसे लंबे समय तक उपनिवेश बनाकर रखना आसान नहीं रहता।

आभार~ परिचय दास

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