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फ्रांस में फिल्मों का मेला

फ्रांस में फिल्मों का मेला

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भूमध्यसागर के किनारे जब शाम उतरती है, तब फ्रांस का वह छोटा-सा नगर अचानक किसी विशाल स्वप्न की तरह चमकने लगता है। समुद्र की सतह पर रोशनियाँ काँपती हैं और दूर से आती हवाओं में इत्र, नमक, शराब और कैमरों की फ्लैश एक साथ घुलने लगती हैं। ऐसा लगता है मानो पृथ्वी ने एक रात के लिए स्वयं को दर्पणों से ढँक लिया हो। यही वह समय है जब फिल्मों का मेला आरम्भ होता है। मनुष्य अपनी कहानियों को लेकर वहाँ पहुँचता है, जैसे सदियों पहले व्यापारी रेशम और मसालों की गठरियाँ लेकर मेलों में जाते थे। अब कथा सबसे बड़ी वस्तु है और चेहरा सबसे महँगा बाज़ार।

फ्रांस में फिल्मोत्सव केवल सिनेमा का आयोजन नहीं होता, वह आधुनिक सभ्यता का वार्षिक मुखौटा-उत्सव भी है। लाल कालीन पर चलते हुए अभिनेता किसी दूसरे लोक के जीव लगते हैं। उनकी मुस्कानें इतनी व्यवस्थित होती हैं कि लगता है जैसे दाँतों को भी अभिनय सिखाया गया हो। स्त्रियाँ चमकदार परिधानों में समुद्र की लहरों जैसी दिखाई देती हैं और पुरुष अपने काले सूटों में ऐसे चलते हैं मानो पृथ्वी पर नहीं, किसी पुराने यूरोपीय चित्र में उतर आए हों। कैमरे लगातार चमकते रहते हैं। मनुष्य अब स्मृति से अधिक तस्वीरों पर भरोसा करता है। जो क्षण कैमरे में नहीं गया, वह मानो घटित ही नहीं हुआ।

किन्तु उस चकाचौंध के भीतर एक दूसरी दुनिया भी चलती रहती है। छोटे-छोटे थिएटरों में दूर देशों से आए निर्देशक बैठे होते हैं। किसी के पास युद्ध की कथा है, किसी के पास भूख की, किसी के पास प्रेम की ऐसी टूटन है जिसे शब्दों में कहना संभव नहीं। एक कोने में ईरान का कोई फिल्मकार अपने देश की चुप्पियों को लेकर बैठा है, दूसरे कोने में अफ्रीका का कोई युवा निर्देशक अपनी मिट्टी की धूल को पर्दे पर उतारने की बेचैनी में है। कोई लातिन अमेरिका से आया है, जिसकी फिल्मों में बारिश बहुत गिरती है और तानाशाहियाँ बहुत चलती हैं। कोई एशिया से आया है, जिसकी आँखों में अभी भी गाँव की कच्ची सड़कें चमक रही हैं।

सिनेमा का यह मेला दरअसल पृथ्वी के दुःखों और इच्छाओं का भी मेला है। मनुष्य जहाँ-जहाँ टूटता है, वहाँ-वहाँ से कहानियाँ जन्म लेती हैं। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, सभ्यता के अवचेतन की छवियाँ हैं। किसी फिल्म में प्रेम इतना मौन होता है कि दर्शक की साँस धीमी पड़ जाती है। किसी फिल्म में हिंसा इतनी निर्मम होती है कि आँखें पर्दे से हटाना चाहती हैं। किसी फिल्म में एक बूढ़ा आदमी केवल खिड़की के बाहर देखता रहता है और वही दृश्य जीवन का सबसे बड़ा दर्शन बन जाता है।

फ्रांस इस पूरे आयोजन में केवल मेज़बान नहीं होता, वह एक पुरानी सांस्कृतिक स्मृति की तरह उपस्थित रहता है। उसकी गलियों में चलते हुए लगता है कि कला अभी भी वहाँ रोटी की तरह आवश्यक मानी जाती है। कैफ़े में बैठे लोग फिल्मों पर वैसे बहस करते हैं जैसे किसान मौसम पर करते हैं। वहाँ आलोचना भी एक कला है। एक दुबला-पतला समीक्षक आधी रात तक किसी फिल्म के एक दृश्य पर बोलता रहेगा और सामने बैठा श्रोता उसे उतनी ही गंभीरता से सुनेगा जैसे किसी दार्शनिक का व्याख्यान। मनुष्य ने शायद फ्रांस में सबसे पहले यह सीखा कि सौन्दर्य भी विचार हो सकता है।

फिल्मोत्सव के दिनों में समुद्र के किनारे की सड़कें किसी चलते हुए रंगमंच जैसी लगती हैं। सुबह पत्रकार भागते हुए दिखाई देते हैं। उनके गले में लटके कार्ड किसी आधुनिक यज्ञोपवीत की तरह झूलते रहते हैं। दोपहर तक इंटरव्यू, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रदर्शन और चर्चाएँ चलती रहती हैं। शाम होते-होते शहर फिर चमकने लगता है। होटल के बाहर भीड़ जमा हो जाती है। कोई अभिनेता हाथ हिला दे तो लोग ऐसे प्रसन्न हो उठते हैं मानो इतिहास ने उन्हें व्यक्तिगत अभिवादन दे दिया हो। मनुष्य की यह आदत अद्भुत है। वह प्रसिद्धि के सामने तुरंत पिघल जाता है। सदियों पहले राजा आते थे, अब अभिनेता आते हैं। भीड़ का स्वभाव अधिक नहीं बदला।

लेकिन इस पूरे वैभव के बीच सिनेमा का एकाकीपन भी दिखाई देता है। हर महान निर्देशक भीतर से थोड़ा उदास होता है। वह जानता है कि कैमरा दुनिया को पूरी तरह पकड़ नहीं सकता। जीवन हमेशा फ्रेम से बाहर छूट जाता है। एक माँ की थकान, मजदूर की चुप्पी, बूढ़े पिता की प्रतीक्षा, प्रेमिका की आँखों में अचानक उतर आया संदेह, इन सबको पूरी तरह फिल्माया नहीं जा सकता। इसलिए सिनेमा लगातार असफल होता हुआ भी सबसे सुंदर कलाओं में बना रहता है।

फ्रांस का यह मेला कला और बाज़ार के विचित्र गठबंधन का भी दृश्य है। एक ओर गंभीर फिल्में हैं जिनमें मनुष्य की आत्मा काँपती है, दूसरी ओर करोड़ों डॉलर के सौदे हैं। निर्माता मुस्कराते हुए अनुबंधों पर हस्ताक्षर करते हैं। वितरक फिल्मों को देशों में बाँटते हैं। किसी फिल्म का भविष्य तय होता है कि उसे कितने पर्दे मिलेंगे, कितने पुरस्कार मिलेंगे, कितनी चर्चा होगी। कला और पूँजी एक-दूसरे को घूरते रहते हैं, फिर अंततः हाथ मिला लेते हैं। आधुनिक दुनिया में शायद कोई भी कला बाज़ार से पूरी तरह बाहर नहीं रह सकती।

भारतीय सिनेमा भी जब वहाँ पहुँचता है तो अपने साथ एक अलग ताप लेकर आता है। भारत की फिल्मों में रंग अधिक होते हैं, भावनाएँ अधिक खुली होती हैं, संगीत अचानक फूट पड़ता है और दुःख भी कई बार नाचते हुए दिखाई देता है। यूरोपीय दर्शक कभी-कभी इस भावुकता को विस्मय से देखते हैं। लेकिन भारत का जीवन ही इतना बहुरंगी और विस्फोटक है कि उसका सिनेमा संयमित यूरोपीय फ्रेम में पूरी तरह समा नहीं सकता। हमारे यहाँ बारिश भी नाटकीय होती है और प्रेम भी।

फिर भी भारतीय समानांतर सिनेमा जब फ्रांस के इन समारोहों में दिखता है, तब एक अलग भारत सामने आता है। वहाँ गाँवों की धूल है, श्रमिकों की थकान है, स्त्रियों की चुप्पियाँ हैं, छोटे शहरों की बेचैनियाँ हैं। उस समय सिनेमा किसी राष्ट्र का प्रचार नहीं करता, उसकी आत्मा का अनुवाद करता है।

रात गहराने लगती है। समुद्र की हवा ठंडी हो जाती है। कहीं दूर किसी पार्टी में संगीत बज रहा है। होटल की ऊँची खिड़कियों में रोशनियाँ जल रही हैं। किसी कमरे में निर्देशक अपनी फिल्म पर आई कठोर समीक्षा पढ़कर चुप बैठा है। किसी कमरे में एक अभिनेत्री अपने मेकअप को धीरे-धीरे उतार रही है, मानो चेहरे से एक दूसरा चेहरा अलग कर रही हो। किसी युवा लेखक की आँखों में पहली बार विश्वास जागा है कि उसकी कहानी दुनिया तक पहुँच सकती है।

फिल्मों का यह मेला अंततः मनुष्य की अनन्त कथा-पिपासा का उत्सव है। आदमी जन्म से ही कहानी चाहता है। वह युद्धों में भी कहानी ढूँढ़ता है, प्रेम में भी, राजनीति में भी, मृत्यु में भी। शायद इसी कारण सिनेमा इतनी जल्दी पृथ्वी की सार्वभौमिक भाषा बन गया। जब शब्द असफल हो जाते हैं, तब एक दृश्य बोलता है। जब विचार टूट जाते हैं, तब एक चेहरा स्क्रीन पर चुप खड़ा रहता है और पूरा सभागार मौन हो जाता है।

फ्रांस की रातों में चलने वाला यह फिल्मोत्सव इसलिए केवल चमक का आयोजन नहीं है। वह मनुष्य की सामूहिक कल्पना का मेला है। यहाँ पृथ्वी के अलग-अलग कोनों से आए लोग अपने दुःख, अपने स्वप्न, अपनी स्मृतियाँ और अपनी असफलताएँ लेकर आते हैं। फिर कुछ घंटों के लिए अँधेरे हॉल में बैठकर वे एक-दूसरे की आँखों से दुनिया देखने लगते हैं। शायद कला का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि वह अजनबियों को थोड़ी देर के लिए एक साझा हृदय दे देती है।

आभार~ परिचय दास

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