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प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ के 134वें एपिसोड में देश को खास संदेश दिए

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ के 134वें एपिसोड में देश को खास संदेश दिए

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज मन की बात के 134 वां एपिसोड में बोल रहे हैं. इस कार्यक्रम में पीएम ने देश में बढ़ती खगोल विज्ञान यानी Astronomy के प्रति रुचि का जिक्र किया. पीएम मोदी ने कहा कि भारत में खगोल विज्ञान के प्रति आकर्षण कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी विरासत का ही एक हिस्सा रहा है.

ग्रहों-तारों को समझना भारत की पुरानी परंपरा

पीएम मोदी ने कहा कि भारतीय सभ्यता में आकाश, ग्रहों और तारों को समझने की परंपरा बहुत ही पुरानी रही है. भारत में आज भी कई प्राचानी वेधशालाएं यानी Observatories मौजूद हैं, जो उस दौर की वैज्ञानिक सोच और गणितीय क्षमता का प्रमाण हैं. उन्होंने बताया कि भारत में कई महत्वपूर्ण गणितीय खोजें हुईं, जिनका संबंध खगोल विज्ञान से सीधा रहा है. नेविगेशन हो, पंचांग हो या पर्व-त्योहारों की गणना लंबे समय तक यह सभी आकाशीय घटनाओं के अध्ययन पर ही की जाती रही है.

पीएम मोदी के मुताबिक, खगोल विज्ञान ने हर पीढ़ी में जिज्ञासा पैदा की है और लोगों को खोज के लिए प्रेरित भी करने का काम किया है. यही कारण है कि आज भारत के युवाओं में भी Astronomy को लेकर उत्साह लगातार बढ़ रहा है. देशभर में एस्ट्रोनॉमी कल्ब तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और उनकी गतिविधियां अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे कस्बों और स्कूलों तक पहुंच रही हैं.

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 134वें एपिसोड में चोल साम्राज्य की कॉपर प्लेट्स का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि जब वे नीदरलैंड की यात्रा पर गए थे, उसी दौरान उन्हें चोल युगीन ताम्र पत्र दिए गए. पीएम मोदी ने बताया कि इन ताम्र पत्रों को 300 साल बाद भारत वापस लाया गया है. यह ताम्रपत्र भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक हैं. पीएम मोदी ने कहा कि भारत वापस लाई गई चोल-युग की प्लेटों में 21 बड़ी और तीन छोटी तांबे की प्लेटें शामिल हैं. आइए जानते हैं इन ताम्र पत्रों की और राजा राजेंद्र चोल की खासियत, जिनके शासन की खूबियां इन प्लेटों में दर्ज है.

चोल युग की 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें पीएम मोदी को सौंपी गई

नीदरलैंड में पीएम मोदी को चोल राजवंश के शासनकाल की कुल 24 प्लेटें सौंपी गईं. इन प्लेटों में 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं. इन ताम्र पत्रों का वजन 30 किलोग्राम है. इन ताम्र पत्रों को कांसे के छल्ले से बांधा गया है, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी हुई है.यह ताम्र पत्र 11 शताब्दी की हैं. उस वक्त दक्षिण में चोल राजाओं का शासन था और राजेंद्र चोल के हाथों में कमान थी. वे चोल शासक राजराजा चोल के बेटे थे. इन पट्टिकाओं में तमिल और संस्कृत में उस काल की महत्वपूर्ण बातें लिखी हुई हैं.

इन प्लेटों में नागपट्टिनम के पास अनाइमंगलम गांव को बौद्ध विहार, चूड़ामणि विहार के रखरखाव के लिए दी गई स्थायी जमीन और रेवेन्यू ग्रांट का रिकॉर्ड है. राजराजा ने यह आदेश बोलकर जारी किया था. उनके बेटे राजेंद्र चोल ने इस ऑर्डर को तांबे की प्लेटों पर औपचारिक रूप से लिखवाया था ताकि उनके दान को स्थायी कानूनी और शाही अधिकार मिल सके. इन ताम्र पत्रों में चोल वंश की समुद्री ताकत और दक्षिण एशियाई देशों से उनके संबंधों का भी उल्लेख है. इतिहासकार इन ताम्रपत्रों को चोल साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक मानते हैं.

ये ताम्रपत्र नीदरलैंड कैसे पहुंचे?

चोल कालीन ताम्र पत्र आखिर भारत से नीदरलैंड कैसे पहुंचे? यह सवाल सबके मन में उठता है, तो आप यह जान लें कि 17वीं-18वीं सदी में नागपट्टिनम क्षेत्र डच नियंत्रण में था, तब ये ताम्रपत्र वहां से नीदरलैंड ले जाए गए. बाद में उन्हें लीडेन विश्वविद्यालय( Leiden University) के संग्रह का हिस्सा बनाया गया. भारत 2012 से इन्हें वापस लाने की कोशिश कर रहा था और 2026 में सफलता मिली है.

राजेंद्र चोल कौन थे?

चोल साम्राज्य दक्षिण भारत के सबसे अधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था. राजेंद्र चोल उसके सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे. वे महान चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के बेटे थे. उन्होंने लगभग 1014 से 1044 ईस्वी तक शासन किया और चोल साम्राज्य को शिखर तक पहुंचाया. राजेंद्र चोल ने दक्षिण भारत से निकलकर पूर्वी भारत तक सैन्य अभियान चलाया और गंगा क्षेत्र तक अपनी शक्ति का विस्तार किया. उन्होंने पाल राजवंश के साथ युद्ध किया था और उनसे काफी संपत्ति जीती थी.

इसी जीत की याद में उन्होंने गंगैकोंड चोलपुरम नामक नई राजधानी बसाई, जिसका अर्थ है -गंगा को जीतने वाला चोल राजा. राजेंद्र चोल ने पूरे दक्षिण भारत में अपनी सत्ता जमाने के बाद अपनी नौसेना को मजबूत किया, जिसके लिए उनकी ख्याति बहुत ज्यादा है. दक्षिण एशियाई देशों के साथ उनके व्यापार और युद्ध की खूब चर्चा होती है.

उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया तक नौसैनिक अभियान चलाए और उस समय के शक्तिशाली श्रीविजय साम्राज्य को चुनौती दी थी. यह साम्राज्य आधुनिक इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर स्थित एक शक्तिशाली और समृद्ध मलय बौद्ध समुद्री साम्राज्य था. मजबूत समुद्री ताकत की वजह से चोल साम्राज्य का व्यापार और प्रभाव भारत से बाहर तक फैल गया.राजेंद्र चोल को इतिहासकार भारत के सबसे सफल समुद्री और साम्राज्यवादी शासकों में गिनते हैं. राजेंद्र चोल ने अपना प्रभाव हिंद महासागर में स्थापित कर लिया था.

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