सफरनामा: किलकारियों का किला बना एसएनसीयू, 95 फीसदी नवजात जीत रहे जिंदगी की जंग
• मौत से छीनकर जिंदगी दी, 10 साल में एसएनसीयू ने लिखी उम्मीद की इबारत
• 11% से घटकर 5% से कम हुई मृत्यु दर
• 8 बेड से 18 बेड तक पहुंचा छपरा सदर अस्पताल का एसएनसीयू
श्रीनारद मीडिया, पंकज मिश्रा, अमनौर/:छपरा (बिहार):

किसी अस्पताल की असली पहचान उसकी इमारत से नहीं, बल्कि वहां बचाई गई जिंदगियों से होती है। छपरा सदर अस्पताल का स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) इसकी एक जीवंत मिसाल बनकर उभरा है। आज जब यह इकाई अपने 10 वर्षों का सफर पूरा कर चुकी है, तो इसके साथ हजारों परिवारों की उम्मीदें, मुस्कानें और उन नन्हीं किलकारियों की कहानियां जुड़ी हैं, जिन्हें समय रहते उपचार मिला और जीवन की नई शुरुआत हुई।
एक दशक पहले, वर्ष 2015 में जब सदर अस्पताल में एसएनसीयू की शुरुआत हुई थी, तब इसकी तस्वीर बिल्कुल अलग थी। एक जर्जर भवन, मात्र 8 बेड, सीमित संसाधन और बढ़ती मरीज संख्या के बीच स्वास्थ्यकर्मी नवजात शिशुओं को बचाने की जंग लड़ रहे थे। कई बार एक ही बेड पर दो-दो नवजातों को रखना पड़ता था। इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता था और मृत्यु दर भी अपेक्षाकृत अधिक थी। लेकिन आज वही एसएनसीयू आधुनिक संसाधनों, प्रशिक्षित मानव संसाधन और बेहतर चिकित्सा व्यवस्था के साथ नवजात शिशुओं के लिए जीवन की नई उम्मीद बन चुका है।
जर्जर भवन से आधुनिक मातृ-शिशु अस्पताल तक
पिछले दस वर्षों में एसएनसीयू ने केवल स्थान नहीं बदला, बल्कि अपनी कार्यक्षमता और गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार किया है। अब यह इकाई सदर अस्पताल के मातृ-शिशु अस्पताल (एमसीएच) के आधुनिक भवन में संचालित हो रही है। यहां बेड की संख्या 8 से बढ़ाकर 18 कर दी गई है। सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि अब प्रत्येक नवजात को अलग बेड उपलब्ध कराया जाता है। पहले जहां जगह की कमी के कारण एक बेड पर दो बच्चों को रखना पड़ता था, वहीं अब ऐसी स्थिति नहीं आती। प्रत्येक बेड पर मल्टीपारा मॉनिटर, सिरिंज पंप, रेडिएंट वार्मर, फोटोथेरेपी यूनिट समेत अन्य अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। 24 घंटे शिशु रोग विशेषज्ञों की निगरानी और निर्धारित रोस्टर के अनुसार प्रशिक्षित स्टाफ नर्सों की तैनाती ने उपचार की गुणवत्ता को और बेहतर बनाया है। हर महीने औसतन 130 से 140 नवजात शिशु यहां भर्ती होकर उपचार प्राप्त कर रहे हैं।
14 हजार से अधिक नवजातों को मिला उपचार
एसएनसीयू के प्रभारी ज्योति ऑइजक बताते हैं कि 1 मई 2016 से 31 मई 2026 तक कुल 14,246 नवजात शिशु इस इकाई में भर्ती हुए हैं। इनमें से 9,767 नवजात पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे हैं। गंभीर स्थिति वाले कई बच्चों को उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफर भी किया गया। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की उम्मीदों की कहानी है, जिनके घरों में एसएनसीयू की वजह से किलकारियां गूंज सकीं।
मृत्यु दर में आई उल्लेखनीय कमी
सदर अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप यादव बताते हैं कि शुरुआती वर्षों में एसएनसीयू में मृत्यु दर 10 से 11 प्रतिशत से अधिक थी। सीमित संसाधन, कम बेड और बढ़ते मरीजों का दबाव बड़ी चुनौती थी। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार संसाधन उपलब्ध कराने, चिकित्सकों एवं नर्सिंग स्टाफ के प्रशिक्षण तथा आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता के कारण अब स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है। वर्तमान में मृत्यु दर घटकर 5 प्रतिशत से भी कम हो चुकी है। यानी आज एसएनसीयू में भर्ती होने वाले लगभग 95 प्रतिशत नवजात सफल उपचार के बाद स्वस्थ होकर अपने घर लौट रहे हैं। यह उपलब्धि जिले की नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
जब 800 ग्राम की बच्ची ने जिंदगी की जंग जीती
मीरा मुसहरी निवासी मेराज अली के लिए एसएनसीयू किसी वरदान से कम नहीं रहा। वे बताते हैं कि उनकी पत्नी आइसा खातून ने समय से पहले एक बच्ची को जन्म दिया। जन्म के समय बच्ची का वजन मात्र 800 ग्राम था। वह ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी और उसकी हालत बेहद गंभीर थी। जब डॉक्टरों ने बच्ची को एसएनसीयू में भर्ती किया, तब मन में डर और उम्मीद दोनों थे। मशीनों की बीप-बीप की आवाज सुनकर दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं। हर दिन एक नई परीक्षा जैसा लगता था। नियमित निगरानी और उपचार के कारण बच्ची की हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। सामान्यतः 28 दिनों तक भर्ती रखने की व्यवस्था होती है, लेकिन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए बच्ची को 41 दिनों तक एसएनसीयू में रखा गया। आज वह बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है और उसके घर में किलकारियां गूंज रही हैं। मेराज अली कहते हैं, अगर एसएनसीयू नहीं होता तो शायद मेरी बेटी आज हमारे साथ नहीं होती।
गरीब परिवारों के लिए बनी उम्मीद
बनियापुर के सतुआ गांव की सीमा देवी भी एसएनसीयू को अपनी बेटी की दूसरी जिंदगी मानती हैं। वे बताती हैं कि गर्भावस्था के दौरान उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जन्म लेते ही उनकी बच्ची को जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। समय से पहले जन्म होने के कारण बच्ची का वजन काफी कम था, उसे सांस लेने में दिक्कत थी और जन्म के समय वह रो भी नहीं रही थी। चिकित्सकों ने तत्काल एसएनसीयू में भर्ती करने की सलाह दी। सीमा देवी बताती हैं निजी अस्पताल में इलाज कराने पर प्रतिदिन पांच से दस हजार रुपये खर्च होने की बात कही जा रही थी। हमारे लिए इतना खर्च उठाना संभव नहीं था। लेकिन सदर अस्पताल के एसएनसीयू में पूरी तरह निःशुल्क इलाज मिला। करीब 15 दिनों के इलाज के बाद बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट गई। आज मेरी गोद भरी हुई है और घर में खुशियां हैं। यह सब एसएनसीयू की वजह से संभव हुआ, वे भावुक होकर कहती हैं।
क्या है स्टडी रिपोर्ट –
लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 79.5 प्रतिशत नवजात मौतें जन्म के पहले सात दिनों के भीतर होती हैं। वहीं करीब 78 प्रतिशत नवजात मौतों के लिए समयपूर्व जन्म एवं कम वजन (33%), नवजात संक्रमण (27%) तथा जन्म के समय श्वास लेने में परेशानी (19%) जैसे कारण जिम्मेदार होते हैं। ये सभी ऐसी स्थितियां हैं जिनका उपचार और प्रबंधन स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में किया जाता है। यही वजह है कि एसएनसीयू जैसी विशेष नवजात देखभाल इकाइयां गंभीर रूप से बीमार नवजातों की जान बचाने और नवजात मृत्यु दर में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उम्मीदों का केंद्र बन चुका है एसएनसीयू
सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी ने कहा कि जन्म के पहले 28 दिन किसी भी शिशु के जीवन के सबसे संवेदनशील दिन होते हैं। समयपूर्व जन्म, कम वजन, संक्रमण और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं नवजात मृत्यु के प्रमुख कारण होती हैं। ऐसे में एसएनसीयू जैसी विशेष इकाइयां नवजात मृत्यु दर कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। छपरा सदर अस्पताल का एसएनसीयू इसका सफल उदाहरण बनकर सामने आया है। एक दशक पहले जहां संसाधनों की कमी सबसे बड़ी चुनौती थी, वहीं आज यह इकाई आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, प्रशिक्षित मानव संसाधन और बेहतर प्रबंधन के साथ हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का केंद्र बन चुकी है। जर्जर भवन से आधुनिक स्वास्थ्य सुविधा तक का यह 10 वर्षों का सफर केवल एक अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों नन्हीं सांसों की कहानी है जिन्हें समय पर उपचार मिला और जिन्होंने जीवन की जंग जीतकर अपने घरों में खुशियों की नई रोशनी बिखेरी।
उपलब्धि आंकड़ा
– स्थापना वर्ष- 2015
– प्रारंभिक बेड क्षमता 8
– वर्तमान बेड क्षमता 18
– कुल भर्ती नवजात (2016-2026) 14,246
– सफलतापूर्वक डिस्चार्ज 9,767
– वर्तमान मासिक भर्ती 130-140
– पहले मृत्यु दर- 11% से अधिक
– वर्तमान मृत्यु दर- 5% से कम
– सफल उपचार दर- लगभग 95%
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