गोरखपुर विश्वविद्यालय : शिलान्यास दिवस
1 मई: एक संस्थान नहीं, एक सांस्कृतिक आरंभ
श्रीनारद मीडिया स्टेट डेस्क

1 मई का दिन केवल कैलेंडर का एक अंक नहीं है, यह स्मृति की उस तह को छूने वाला समय है जहाँ संस्थाएँ भवन नहीं रहतीं, अनुभव बन जाती हैं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय का शिलान्यास~दिवस इसी तरह का एक दिन है—पत्थर रखने का नहीं, समय में एक विचार रखने का दिन और अजीब बात यह है कि पत्थर तो वहीं रहते हैं लेकिन विचार चलने लगते हैं, बोलने लगते हैं और कभी-कभी मनुष्य के भीतर लौटकर उसे ही देख लेते हैं कि वह कितना बदल गया या शायद बदला ही नहीं।
मैं इस विश्वविद्यालय का शोधछात्र रहा हूँ। यह कहना जितना सरल लगता है, उतना ही भीतर कई परतें खोल देता है। शोधछात्र होना केवल एक शैक्षणिक स्थिति नहीं होती, वह एक मानसिक मौसम होता है जहाँ प्रश्न अधिक होते हैं और उत्तर अपनी निश्चितता खोने लगते हैं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय मेरे लिए केवल अध्ययन का स्थान नहीं था, वह भाषा के भीतर प्रवेश करने का एक द्वार था। हिंदी विभाग वहाँ केवल विभाग नहीं था, वह एक जीवित परंपरा थी जो किताबों से अधिक बातचीत में चलती थी और बातचीत से अधिक चुप्पी में समझी जाती थी।
गोरखपुर शहर तब भी वैसा ही था—धीरे-धीरे चलता हुआ लेकिन भीतर बहुत कुछ समेटे हुए। सड़कें साधारण थीं पर उन सड़कों पर चलते हुए कई बार लगता था कि जैसे किसी पुराने वाक्य के भीतर चल रहे हों, जिसका अर्थ पूरी तरह अभी तक खुला नहीं है। रिक्शा की आवाज़, चाय की दुकानों पर बहसें, छात्रावास की शामें—सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते थे जहाँ साहित्य किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रहता वह जीवन की आदत बन जाता है।
हिंदी विभाग की अपनी एक अलग गरिमा थी लेकिन वह गरिमा किसी औपचारिक चमक से नहीं बनी थी। वह उन अध्यापकों से बनी थी जो केवल पढ़ाते नहीं थे बल्कि सोचने की शैली बदल देते थे। वहाँ साहित्य को केवल पाठ के रूप में नहीं देखा जाता था, उसे समय के साथ संवाद करने वाली चीज़ माना जाता था।
कभी-कभी लगता था कि कक्षाओं में शब्द नहीं, शब्दों के पीछे छिपे हुए प्रश्न चलते हैं।
शिलान्यास दिवस का अर्थ मेरे लिए अब केवल ऐतिहासिक नहीं रहा। वह एक प्रतीक बन गया है—एक ऐसी शुरुआत का प्रतीक जो अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है क्योंकि विश्वविद्यालय कभी पूरा नहीं होता, वह हर पीढ़ी के साथ फिर से लिखा जाता है और हर पीढ़ी उसे थोड़ा बदल देती है, बिना यह जाने कि वे स्वयं भी बदल रहे हैं।
वहाँ के गलियारे अब भी स्मृति में चलते हैं। दीवारें शायद वही होंगी, लेकिन समय ने उन पर कई अदृश्य परतें चढ़ा दी होंगी। छात्र आते-जाते रहे लेकिन परिसर ने उन्हें केवल विदा नहीं किया अपने भीतर कुछ देर के लिए रोक भी लिया। यही किसी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी शक्ति होती है—वह आपको केवल डिग्री नहीं देता, एक अनजाना-सा बोध दे देता है कि ज्ञान कोई वस्तु नहीं है, वह एक प्रक्रिया है जो कभी समाप्त नहीं होती।
गोरखपुर शहर और विश्वविद्यालय के बीच एक अदृश्य संवाद चलता रहता था। शहर जीवन था, विश्वविद्यालय विचार था और इन दोनों के बीच हम जैसे शोध छात्र कहीं बीच में खड़े थे—न पूरी तरह जीवन में, न पूरी तरह विचार में। यह स्थिति असुविधाजनक भी थी और सबसे अधिक रचनात्मक भी क्योंकि यहीं से प्रश्न पैदा होते हैं और प्रश्न ही किसी भी साहित्य की असली पूँजी होते हैं।
हिंदी विभाग ने देश को समृद्ध किया, यह कहना केवल प्रशंसा नहीं है, यह एक अनुभव का निष्कर्ष है। वहाँ से निकले अनेक विचार, अनेक दृष्टियाँ, अनेक आलोचनात्मक परंपराएँ—सबने हिंदी साहित्य को केवल विस्तार नहीं दिया, उसे गहराई भी दी। वहाँ साहित्य इतिहास नहीं बनता था, वह वर्तमान में जीता था और वर्तमान में जीने वाला साहित्य ही सबसे अधिक जीवित होता है।
कभी-कभी लगता है कि विश्वविद्यालय का असली काम परीक्षा लेना नहीं बल्कि मनुष्य को उसके प्रश्नों से मिलवाना होता है और गोरखपुर विश्वविद्यालय ने यह काम चुपचाप किया। बिना किसी बड़े घोषणापत्र के, बिना किसी शोर के। वहाँ की कक्षाएँ कई बार किताबों से कम और मौन से अधिक चलती थीं। मौन जो अपने आप में एक तरह की भाषा है—और शायद सबसे कठिन भाषा भी।
स्मृतियाँ अब समय के साथ बदल गई हैं। जो चीज़ें तब सामान्य लगती थीं, वे अब अर्थपूर्ण हो गई हैं और जो बातें तब महत्त्वपूर्ण लगती थीं, वे अब किसी दूर के दृश्य की तरह प्रतीत होती हैं। यह स्मृति का स्वभाव है—वह वर्तमान को बदल देती है और अतीत को अधिक स्पष्ट कर देती है जबकि दोनों ही वास्तविकता के हिस्से होते हैं।
गोरखपुर के दिन केवल अध्ययन के नहीं थे, वे भीतर के निर्माण के दिन थे। वहाँ भाषा केवल लिखने का साधन नहीं थी, वह सोचने का माध्यम बन गई थी। शब्दों के भीतर छिपे अर्थ धीरे-धीरे खुलते थे और हर अर्थ के पीछे एक और प्रश्न खड़ा रहता था। यही प्रक्रिया साहित्य को जीवित रखती है।
कई चेहरे याद आते हैं—अध्यापक, सहपाठी और वे लोग जो औपचारिक रूप से किसी भूमिका में नहीं थे लेकिन जिनकी उपस्थिति ने वातावरण को बनाया। हर व्यक्ति वहाँ किसी न किसी तरह से एक पाठ था जिसे समझना जरूरी नहीं था लेकिन महसूस करना संभव था।
शिलान्यास दिवस अब मेरे लिए केवल एक तारीख नहीं है। वह एक स्मृति-प्रवेश द्वार है, जहाँ से गुजरते हुए मैं फिर से उसी परिसर में लौटता हूँ, जहाँ समय थोड़ा धीमा था और विचार थोड़ा अधिक गहरे। वहाँ लौटना शारीरिक रूप से संभव नहीं लेकिन भाषा उसे संभव बना देती है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय की भूमिका केवल शैक्षणिक नहीं रही, वह सांस्कृतिक भी रही है। उसने केवल डिग्रियाँ नहीं दीं, उसने एक दृष्टि दी—जिसमें साहित्य केवल सौंदर्य नहीं, एक सामाजिक और बौद्धिक जिम्मेदारी भी है और यह जिम्मेदारी धीरे-धीरे व्यक्ति के भीतर उतरती है बिना किसी घोषणा के।
अब जब १ मई आता है, वह केवल इतिहास की याद नहीं दिलाता। वह यह भी पूछता है कि जो कुछ वहाँ शुरू हुआ था, वह आज कहाँ पहुँच रहा है और शायद इसका कोई अंतिम उत्तर नहीं है क्योंकि विश्वविद्यालयों के प्रश्न कभी समाप्त नहीं होते, वे केवल बदलते रहते हैं।
गोरखपुर शहर अब भी वहीं होगा, अपनी गति में, अपने शोर और अपने मौन के साथ।
विश्वविद्यालय भी वहीं होगा, अपने नए छात्रों के साथ लेकिन मेरे भीतर वह अब स्मृति बन चुका है—एक ऐसी स्मृति जो स्थिर नहीं है, वह लगातार लिखी जा रही है।
और शायद यही किसी संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है—वह केवल बाहर नहीं रहता, वह भीतर भी बस जाता है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय का शिलान्यास दिवस केवल एक तिथि नहीं है, यह समय के भीतर गड़ा हुआ एक ऐसा चिन्ह है जो हर वर्ष लौटकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। १ मई जब आता है, वह केवल कैलेंडर का पन्ना नहीं पलटता बल्कि स्मृति के भीतर एक पूरा परिसर फिर से खड़ा हो जाता है। ईंट, दीवार, वृक्ष, गलियारे, कक्षाएँ और उनसे भी अधिक—वह अदृश्य बौद्धिक वातावरण, जिसमें विचार पहली बार आकार लेते हैं और भाषा अपने अनुशासन से बाहर जाकर जीवन से संवाद करने लगती है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय का शिलान्यास केवल भवन निर्माण की शुरुआत नहीं था। वह उस विश्वास का आरंभ था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की भूमि पर भी एक ऐसा बौद्धिक केंद्र खड़ा हो सकता है जहाँ ज्ञान केवल परीक्षा का साधन न रहकर जीवन की समझ बन जाए।
शिलान्यास की वह घटना अपने भीतर भविष्य की पूरी यात्रा को समेटे हुए थी, हालांकि उस समय यह किसी को पूरी तरह स्पष्ट नहीं रहा होगा। हर शिलान्यास अपने भीतर अनिश्चितता और संभावना दोनों को साथ लेकर चलता है, और यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता होती है।
इस विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा पहलू यह है कि यह केवल शिक्षण संस्थान नहीं रहा, यह एक सांस्कृतिक स्मृति-स्थान भी रहा है। यहाँ शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं रहा, बल्कि सोचने की आदत विकसित करना रहा है। कई पीढ़ियाँ यहाँ से गुजरीं लेकिन हर पीढ़ी अपने साथ केवल डिग्री नहीं लेकर गई, बल्कि एक दृष्टि लेकर गई, जिसमें दुनिया को देखने का कोण थोड़ा बदल चुका होता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता, यह धीरे-धीरे भीतर उतरता है, जैसे पानी पत्थर को भी अपनी भाषा सिखा देता है।
गोरखपुर शहर स्वयं इस विश्वविद्यालय के साथ एक समानांतर जीवन जीता रहा है। शहर की गति और विश्वविद्यालय की गति हमेशा एक जैसी नहीं रही लेकिन दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे हैं। शहर की गलियों में जो साधारण जीवन चलता है, वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में जाकर विचार बन जाता है और विश्वविद्यालय में जन्म लेने वाले विचार फिर शहर में लौटकर किसी न किसी रूप में जीवन की व्याख्या करने लगते हैं। यह एक अदृश्य आवागमन है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता।
शिलान्यास दिवस इस पूरे संबंध की स्मृति को पुनर्जीवित करता है। यह दिन केवल अतीत की ओर देखने का अवसर नहीं है बल्कि यह भी देखने का अवसर है कि उस अतीत ने वर्तमान को कैसे गढ़ा है। जब कोई संस्था समय के भीतर लंबी यात्रा करती है तो उसकी शुरुआत एक प्रतीक में बदल जाती है। १ मई अब केवल एक तारीख नहीं है, यह एक प्रतीकात्मक प्रवेश-द्वार बन गया है, जहाँ से विश्वविद्यालय की कहानी बार-बार भीतर लौटती है।
इस विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग विशेष रूप से एक जीवंत परंपरा का केंद्र रहा है। यहाँ भाषा केवल व्याकरण का विषय नहीं रही, बल्कि विचार और संवेदना का माध्यम रही है। साहित्य को यहाँ केवल पढ़ा नहीं गया, उसे जिया गया। कविता, आलोचना, कथा और विचार—ये सभी रूप यहाँ किसी स्थिर परिभाषा में नहीं बंधे बल्कि लगातार विकसित होते रहे। अध्यापन और शोध यहाँ दो अलग गतिविधियाँ नहीं थीं, वे एक ही बौद्धिक प्रक्रिया के दो पहलू थे।
कई अध्यापक इस संस्थान की बौद्धिक नींव का हिस्सा रहे हैं। उनकी उपस्थिति केवल कक्षा तक सीमित नहीं थी, वह बातचीत, बहस, मौन और व्यक्तिगत संवाद तक फैली हुई थी। विद्यार्थी उनके लिए केवल नाम नहीं थे, वे प्रश्न थे, जिनके भीतर संभावनाएँ छिपी होती थीं और शिक्षा का सबसे सुंदर रूप तब बनता है जब शिक्षक और विद्यार्थी दोनों एक-दूसरे को केवल पदानुक्रम में नहीं बल्कि संवाद में देखते हैं।
शिलान्यास दिवस की ऐतिहासिकता के भीतर एक और महत्त्वपूर्ण पहलू छिपा है—संस्थान का धीरे-धीरे विकसित होना। कोई भी विश्वविद्यालय एक दिन में नहीं बनता। वह वर्षों की परतों से बनता है। हर बैच, हर शिक्षक, हर प्रशासनिक निर्णय, हर छोटी घटना मिलकर उसे आकार देती है। इस अर्थ में शिलान्यास केवल शुरुआत नहीं बल्कि एक सतत प्रक्रिया का पहला दृश्य है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय की पहचान केवल अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही, वह उस बौद्धिक वातावरण से भी बनी है जिसमें प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता रही है। यह स्वतंत्रता किसी लिखित घोषणा से नहीं आती, यह धीरे-धीरे संस्थान की संस्कृति में बस जाती है। जब विद्यार्थी बिना भय के प्रश्न पूछने लगते हैं, तब समझा जा सकता है कि कोई विश्वविद्यालय केवल संरचना नहीं, चेतना बन चुका है।
इस संस्थान का एक पहलू उसकी भौगोलिक और सामाजिक स्थिति से जुड़ा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना, उसकी भाषाएँ, उसकी लोक परंपराएँ—ये सभी यहाँ के शैक्षणिक जीवन में किसी न किसी रूप में प्रवेश करती रही हैं। इसलिए यहाँ का ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं रहा, वह सामाजिक अनुभवों से भी जुड़ा रहा है। यही कारण है कि यहाँ से निकलने वाला विचार अक्सर जमीन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
शिलान्यास दिवस को यदि प्रतीकात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल ईंट और पत्थर रखने की घटना नहीं है। यह उस विश्वास का नाम है जिसमें यह माना गया कि शिक्षा किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वह फैलनी चाहिए, विकसित होनी चाहिए और समाज के भीतर जाकर काम करनी चाहिए। इस विश्वास ने ही विश्वविद्यालय को धीरे-धीरे एक जीवित संस्था में बदल दिया।
समय के साथ विश्वविद्यालय बदलता है लेकिन उसकी स्मृति स्थिर रहती है। जो लोग यहाँ पढ़ते हैं, वे भले ही अलग-अलग क्षेत्रों में चले जाएँ लेकिन उनके भीतर एक साझा अनुभव बचा रहता है। वह अनुभव किसी भवन का नहीं बल्कि उस बौद्धिक वातावरण का होता है जिसमें उन्होंने पहली बार अपने प्रश्नों को गंभीरता से सुना था।
गोरखपुर शहर की अपनी एक सांस्कृतिक धड़कन है। यहाँ की भाषा, यहाँ का लोक जीवन, यहाँ की सामाजिक परतें—ये सब विश्वविद्यालय के साथ लगातार संवाद में रहते हैं। कई बार लगता है कि शहर विश्वविद्यालय को आकार देता है और विश्वविद्यालय शहर को एक नया अर्थ देता है। यह पारस्परिकता ही इस पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक शक्ति है।
शिलान्यास दिवस पर जब हम पीछे देखते हैं तो केवल इतिहास नहीं दिखता, एक लंबी यात्रा दिखती है। वह यात्रा जिसमें कई पीढ़ियाँ शामिल हैं, कई विचार शामिल हैं और कई अनकहे अनुभव शामिल हैं। यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है क्योंकि कोई भी विश्वविद्यालय तब तक समाप्त नहीं होता जब तक उसमें प्रश्न पूछे जाते रहते हैं।
आज जब १ मई की स्मृति लौटती है तो वह केवल एक संस्था की शुरुआत को याद नहीं दिलाती। वह यह भी पूछती है कि क्या हम उस बौद्धिक परंपरा को आगे ले जा रहे हैं जो यहाँ शुरू हुई थी और शायद यह प्रश्न किसी भी शिलान्यास का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है—वह हमें केवल अतीत में नहीं रोकता, वह हमें भविष्य की ओर भी धकेलता है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय का शिलान्यास दिवस एक बहुस्तरीय स्मृति है—ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और व्यक्तिगत। यह एक ऐसा दिन है जो हर वर्ष लौटकर यह याद दिलाता है कि संस्थाएँ केवल दीवारों से नहीं बनतीं, वे उन लोगों से बनती हैं जो उन्हें अर्थ देते हैं।
आभार~ परिचय दास
