मशरक में चैती छठ महापर्व की भव्य शुरुआत, नहाए-खाए के साथ गूंजा आस्था का स्वर
श्रीनारद मीडिया, विक्की बाबा, मशरक, सारण (बिहार):

सारण जिला के मशरक प्रखंड के विभिन्न गांवों में लोक आस्था और सूर्य उपासना के महान पर्व चैती छठ का शुभारंभ रविवार को नहाए-खाए के साथ पूरे धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के माहौल में हो गया। आचार्य टुन्ना बाबा ने बताया कि चार दिनों तक चलने वाले इस पवित्र अनुष्ठान में व्रती कठिन नियमों और अनुशासन का पालन करते हुए छठी मईया और भगवान सूर्य की उपासना करते हैं। इस पर्व को शुद्धता, संयम और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम माना जाता है।
नहाए-खाए के दिन व्रतियों ने प्रातःकाल उठकर घर की साफ-सफाई करने के बाद नजदीकी पोखरों, नदियों एवं अन्य जलाशयों में स्नान किया। स्नान के उपरांत शुद्ध और सात्विक भोजन के रूप में कद्दू-भात ग्रहण किया गया, जिसे नहाए-खाए की परंपरा कहा जाता है। इस दिन से व्रती पूर्णतः सात्विक आहार-विहार अपनाते हुए चार दिनों तक कठिन व्रत का संकल्प लेते हैं।
घरों में विशेष रूप से शुद्धता का ध्यान रखा जा रहा है और रसोई में लकड़ी या गोबर के उपले पर प्रसाद बनाने की परंपरा निभाई जा रही है।महापर्व के आरंभ के साथ ही पूरे क्षेत्र में छठ पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। गांव-गांव में स्थित छठ घाटों की साफ-सफाई युद्ध स्तर पर की जा रही है। स्थानीय लोग, युवा समितियां और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर घाटों को स्वच्छ और सुरक्षित बनाने में जुटे हैं। कई स्थानों पर घाटों की सजावट, रोशनी की व्यवस्था और बैरिकेडिंग का कार्य भी किया जा रहा है, ताकि व्रतियों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
बाजारों में भी छठ पर्व को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। फल, नारियल, गन्ना, सूप, दौरा, मिट्टी के बर्तन और अन्य पूजा सामग्री की दुकानों पर भीड़ उमड़ रही है। खासकर बांस से बने सूप और दौरा की मांग बढ़ गई है। महिलाएं प्रसाद बनाने के लिए गेहूं धोने और सुखाने में जुटी हैं, वहीं घरों में ठेकुआ, कसार और अन्य पारंपरिक प्रसाद बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
छठ महापर्व का दूसरा दिन 23 मार्च को खरना के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को शुद्धता के साथ गुड़-खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर भगवान को अर्पित करने के बाद स्वयं ग्रहण करते हैं। खरना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं, जो इस पर्व की सबसे कठिन तपस्या मानी जाती है।तीसरे दिन 24 मार्च को व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे। इस अवसर पर घाटों पर भव्य दृश्य देखने को मिलेगा, जहां व्रती जल में खड़े होकर सूर्य देव की उपासना करेंगे।
लोकगीतों, भजनों और छठी मईया के पारंपरिक गीतों से वातावरण भक्तिमय हो उठेगा। चौथे और अंतिम दिन 25 मार्च को उदयमान सूर्य को अर्घ्य देकर इस चार दिवसीय महापर्व का समापन किया जाएगा। इसके साथ ही व्रती पारण कर व्रत को पूर्ण करेंगे और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगे।छठ पर्व को लेकर पूरे मशरक क्षेत्र में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो गया है।
हर ओर भक्ति, अनुशासन और सामाजिक एकता का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, स्वच्छता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी संदेश देता है।
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