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26 दिनों में कैसे बदला जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन

26 दिनों में कैसे बदला जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

छात्रों के भविष्य और परीक्षा सुधार के मुद्दे से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक और वैचारिक विमर्श का मंच भी बनता जा रहा है और ऐसे चेहरों की भरमार दिखने लगी जो अक्सर किसी भी दूसरे आंदोलन में दिखते रहे है। चेहरों से लेकर नारों तक में बहुत समानता दिखने लगी।

शिक्षा मंत्री प्रधान के इस्तीफे के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपशब्दों ने तो सीमा तोड़ दी। किसी ने उमर खालिद की रिहाई की मांग उठाई, तो किसी ने कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। मंच से हिंदुत्व और हिंदू धर्म को लेकर भी टिप्पणियां की गईं। वहीं, कुछ वक्ताओं ने भारत की स्थिति की तुलना नेपाल और बांग्लादेश से करते हुए नारे भी लगाए।

शिक्षा और परीक्षा सुधार से शुरुआत

जंतर-मंतर पर शुरू हुए छात्र आंदोलन की शुरुआती मांगें स्पष्ट थीं। NEET पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं पर रोक और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही। मंच से परीक्षा सुधार, री-एग्जाम, तकनीक आधारित परीक्षा प्रणाली और छात्रों के भविष्य जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए। हालांकि, समय बीतने के साथ आंदोलन का दायरा भी लगातार बढ़ता गया।

आंदोलन के शुरुआती दिनों में छात्र, शिक्षक और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग प्रमुख रूप से शामिल रहे। बाद में किसान संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों की भागीदारी बढ़ी। इसके बाद विपक्षी नेताओं की मौजूदगी भी बढ़ने लगी।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले, कीर्ति आजाद और योगेंद्र यादव समेत कई नेता जंतर-मंतर पहुंचे और आंदोलन का समर्थन किया।

अभिनेता प्रकाश राज, शबाना आजमी, स्वरा भास्कर और स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा भी वहां पहुंचे। इसमें से अधिक तरह चेहरे सीएए के विरोध में शाहीनबाग में भी दिखे थे और किसान आंदोलन में भी।

राजनीति की एंट्री

विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल के बीच जंतर-मंतर का यह छात्र आंदोलन केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा। मंच से केंद्र सरकार की आलोचना, कश्मीर, अनुच्छेद-370 और उमर खालिद की रिहाई जैसे मुद्दे भी उठाए जाने लगे।

विपक्ष ने सरकार को घेरा

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मंच से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने पेपर लीक, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और शिक्षा मंत्री की जवाबदेही जैसे मुद्दे उठाते हुए सरकार की आलोचना की।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को लोकतंत्र से जोड़ा

सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि अब इस देश में लोकतंत्र का भविष्य संसद से तय नहीं होगा, बल्कि सड़क से तय होगा। चुनावों से तय नहीं होगा, प्रतिरोध से तय होगा। और 20 तारीख को उसकी एक झलक, हमने दिल्‍ली में देखी।

बॉलीवुड और जंतर-मंतर

शबाना आजमी ने कहा कि वे संविधान प्रदत्त शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के समर्थन में आंदोलन में शामिल हुई हैं। उन्होंने अपील की कि आंदोलन का फोकस उसके मूल मुद्दों पर बना रहे और अनावश्यक विवादों से बचा जाए। वहीं, स्वरा भास्कर ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार नागरिक अधिकारों और असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना चाहती है।

आंदोलन के साथ बढ़ा वैचारिक विमर्श

आंदोलन के दौरान कुछ वक्ताओं ने हिंदुत्व, धार्मिक नेताओं, शिक्षा नीति और अन्य वैचारिक विषयों पर भी अपनी राय रखी। CJP से जुड़े कुछ वक्ताओं ने धार्मिक हस्तियों पर टिप्पणी की, जबकि कुणाल कामरा ने केंद्र सरकार पर व्यंग्य किया। इन बयानों के बाद आंदोलन का विमर्श शिक्षा संबंधी मुद्दों से आगे बढ़कर राजनीतिक और वैचारिक विषयों तक पहुंचता दिखाई दिया।

23 दिनों में क्या क्या हुआ

28 जून : पहला दिन- सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।

6–8 जुलाई- सिविल सोसाइटी और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों की भागीदारी बढ़ी।

8 जुलाई- दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने उमर खालिद की रिहाई की मांग उठाई।

11–15 जुलाई- किसान संगठनों और सामाजिक समूहों ने आंदोलन का समर्थन किया।

16 जुलाई- भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत पहुंचे। उन्होंने आंदोलन का समर्थन करते हुए इसे वैचारिक संघर्ष बताया।

18 जुलाई- सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाया गया। बड़ी संख्या में समर्थक वहां पहुंचे।

20 जुलाई- ‘संसद चलो’ मार्च निकाला गया। अरविंद केजरीवाल, डिंपल यादव, महुआ मोइत्रा, सुप्रिया सुले, कीर्ति आजाद और योगेंद्र यादव सहित कई विपक्षी नेता जंतर-मंतर पहुंचे।

21 जुलाई- भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद आंदोलन स्थल पहुंचे और पुलिस कार्रवाई की आलोचना की।

22 जुलाई- शबाना आजमी, प्रकाश राज, स्वरा भास्कर और कुणाल कामरा आंदोलन में शामिल हुए। उनके भाषणों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और केंद्र सरकार की नीतियों पर भी चर्चा हुई।

23 जुलाई- केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह ने मेदांता अस्पताल में सोनम वांगचुक से मुलाकात की। इसके बाद 26 दिनों से जारी उनका अनशन समाप्त हो गया।

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