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रविंद्र जैन ने अपनी मन की आंखों से रामायण को अमर बना दिया

रविंद्र जैन ने अपनी मन की आंखों से रामायण को अमर बना दिया

एक जन्मांध व्यक्ति ने हमारी सनातन परंपरा को नवाचार में बदल दिया

जन्मतिथि पर विशेष

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

जब भी फागुन की हवा में कहीं से कोई धुन तैरती हुई आती है—“कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया…”—तो लगता है जैसे समय ने अपने पाँवों में घुँघरू बाँध लिए हों। उस धुन के भीतर एक उजली, विनम्र और आस्तिक आत्मा का स्पर्श है— रवींद्र जैन । उनका जन्मदिन केवल एक तिथि नहीं, वह भारतीय सिनेमा की स्मृति में जलता हुआ दीप है; वह उन सुरों की वर्षगाँठ है जिन्होंने गाँव की पगडंडियों को, नदी के बहाव को, और मनुष्य के अंतःकरण को एक साथ बाँध दिया।

वे जन्म से दृष्टि~दिव्यांग थे पर उनकी भीतर की आँखें असाधारण रूप से जाग्रत थीं। जिस संसार को हम दृश्य से पहचानते हैं, उसे उन्होंने ध्वनि से पहचाना; जिसे हम रंग से पहचानते हैं, उसे उन्होंने राग से। उनकी संगीत-यात्रा में कोई कोलाहल नहीं था, कोई आडंबर नहीं—केवल साधना थी, विश्वास था, और भारतीय लोक की धूल से उठती हुई सुगंध थी। उनके सुरों में एक ऐसी गत्यात्मकता है जो चुपचाप बहती है, जैसे नदी—बिना शोर किए, बिना दावा किए, अपनी दिशा में अडिग।

फिल्मों की भीड़ में, जहाँ चमक और शोर का साम्राज्य था, वहाँ एक दिन एक सादा-सा गीत आया और उसने सबको ठहरा दिया। वह फिल्म थी— नदिया के पार। यह केवल एक प्रेमकथा नहीं थी; यह गाँव के मन का उत्सव था, लोक के लय का पुनरागमन था। और उस पुनरागमन के पुरोहित थे रवींद्र जैन। उन्होंने इस फिल्म के लिए जो धुनें रचीं, वे किसी स्टूडियो की कृत्रिम रोशनी में नहीं जन्मीं; वे खेतों की मेड़ों पर, कुएँ की जगत पर, आँगन की चौखट पर जन्मीं।

“कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया…”—यह गीत सुनते हुए लगता है जैसे मन स्वयं एक यात्री बन गया हो। दिशा केवल भौगोलिक नहीं रहती; वह जीवन की दिशा बन जाती है। प्रेम का रास्ता किस ओर जाता है? विरह किस दिशा में बहता है? मिलन की आहट किस पगडंडी से आती है? रवींद्र जैन के सुर इन प्रश्नों को उत्तर नहीं देते; वे उन्हें एक मृदुल आलोक में रख देते हैं, ताकि हम स्वयं उनमें उतर सकें।

‘नदिया के पार’ में प्रेम की भाषा अत्यंत सरल है, पर उस सरलता के भीतर एक गहरी रचनात्मकता है। रवींद्र जैन ने लोकधुनों को केवल उद्धृत नहीं किया; उन्होंने उन्हें पुनर्जीवित किया। उनकी रचना-प्रक्रिया में लोक केवल सामग्री नहीं है, वह आत्मा है। उन्होंने भोजपुरी और अवधी के स्वरों को इस तरह साधा कि वे शहरी दर्शकों के लिए भी आत्मीय हो गए। यह उनके संगीत की रचनात्मकता थी—जो लोक को सीमित नहीं करती, उसे सार्वभौमिक बना देती है।

उनके गीतों में स्त्री-पुरुष का प्रेम किसी प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। वह संकोच से भरा है, लाज से आच्छादित है पर भीतर से दैदीप्यमान है। जैसे किसी नदी के किनारे बैठा हुआ मन चुपचाप अपने ही प्रतिबिंब को देख रहा हो। इस फिल्म में संगीत कथा का परिशिष्ट नहीं, कथा का प्राण है। संवाद जहाँ समाप्त होते हैं, वहाँ से सुर बोलने लगते हैं और उन सुरों में एक विश्वास है—कि जीवन अंततः सौंदर्य का पक्षधर है।

रवींद्र जैन की विशेषता यह थी कि वे केवल संगीतकार नहीं थे; वे कवि भी थे। शब्द और स्वर उनके भीतर अलग-अलग नहीं रहते थे। वे जब धुन बनाते थे, तो शब्दों की देह को भी उसी के अनुरूप आकार देते थे। उनकी रचनाओं में कोई कृत्रिम जटिलता नहीं, कोई बौद्धिक दंभ नहीं। वे जानते थे कि भारतीय हृदय की धड़कन कैसी है—धीमी, संयत, पर गहरी। उसी धड़कन पर उन्होंने अपने गीतों को रखा।

‘नदिया के पार’ का संगीत हमें उस समय में ले जाता है जब प्रेम का अर्थ प्रतीक्षा था, जब मिलन का अर्थ उत्सव था, और जब विरह भी एक मधुर तपस्या था। आज जब संबंधों की भाषा तीव्र और अधीर हो गई है, तब रवींद्र जैन के गीत हमें ठहरना सिखाते हैं—नदी के किनारे बैठकर जल को देखना, हवा को सुनना, और अपने भीतर के कंपन को पहचानना। उनकी धुनें हमें बताती हैं कि सौंदर्य का मूल स्वर शांति है, और शांति का मूल स्वर विश्वास।

उनका जन्मदिन हमें यह स्मरण कराता है कि प्रतिभा किसी एक इंद्रिय की मोहताज नहीं होती। उन्होंने दृष्टि के अभाव को कभी अभिशाप नहीं बनने दिया; उसे साधना का माध्यम बना लिया। उनके भीतर का प्रकाश इतना प्रखर था कि बाहरी अंधकार अप्रासंगिक हो गया। यही कारण है कि उनके संगीत में एक आंतरिक आलोक है—जो सुनते ही मन को उजला कर देता है।

‘नदिया के पार’ के गीत केवल फिल्मी गीत नहीं हैं; वे भारतीय लोक-संवेदना के दस्तावेज़ हैं। उनमें खेत की मिट्टी है, नदी की नमी है, और मनुष्य के सहज प्रेम की गंध है। रवींद्र जैन ने सिद्ध कर दिया कि सिनेमा भी लोक का उत्सव हो सकता है—यदि उसमें सच्चाई का स्वर हो। उन्होंने लोकप्रियता को कभी हल्केपन में नहीं बदला; उन्होंने उसे गरिमा दी।

जब हम उनके जन्मदिन पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो केवल एक संगीतकार को नहीं, एक साधक को स्मरण करते हैं। वह साधक जिसने सुरों को प्रार्थना की तरह जिया। जिसने नदी को केवल दृश्य नहीं, एक रूपक बनाया—जीवन का, प्रेम का, समय का। ‘नदिया के पार’ में बहती हुई वह नदी आज भी बह रही है—हमारे भीतर, हमारी स्मृतियों में, हमारे उत्सवों में।

रवींद्र जैन का संगीत हमें यह विश्वास देता है कि भारतीयता केवल परंपरा नहीं, एक जीवित अनुभूति है। वह गाँव की चौपाल से लेकर शहर के सिनेमाघर तक एक ही तरह से धड़क सकती है। उनके सुरों में जो विनम्रता है, वही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने कभी ऊँचा बोलने की कोशिश नहीं की; वे धीमे गाते रहे—और वही धीमा स्वर आज भी सबसे दूर तक सुनाई देता है।

उनकी जन्मतिथि हर वर्ष आती है, पर उनके सुर किसी तिथि में सीमित नहीं। वे नदी की तरह हैं—निरंतर, अविराम। ‘नदिया के पार’ केवल एक फिल्म नहीं, एक स्मृति है; और उस स्मृति के केंद्र में बैठा हुआ एक शांत, उजला चेहरा है—रवींद्र जैन। उनकी धुनों में जो लालित्य है, वह समय के साथ मद्धिम नहीं पड़ता; वह हर बार सुनने पर नया हो उठता है, जैसे पहली बार किसी ने प्रेम का नाम लिया हो।

नदी बहती रहती है। गीत गूँजते रहते हैं। और हम, अपनी-अपनी दिशाओं में चलते हुए, कभी-कभी ठहरकर उस बटोहिया से पूछ लेते हैं—कौन और दिशा में लेके चला रे…। उस प्रश्न में ही उनका संगीत जीवित है; उसी प्रश्न में उनकी जन्म-दीपशिखा आज भी उजास दे रही

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