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सरला माहेश्वरी का नहीं रहना

सरला माहेश्वरी का नहीं रहना

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अभी शम्मी नारंग जी की पोस्ट देखी। स्तब्ध करने वाली सूचना मिली। सरला माहेश्वरी जी नहीं रहीं। आज की नयी पीढ़ी खासकर जेन-जी, शायद ही वाकिफ होंगी कि सरला माहेश्वरी के होने का मानी क्या था? जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं, जो हमारे घरों की हवा-धूप में इस तरह घुलमिल जाते हैं कि हम उन्हें अपना मानने लगते हैं। यद्यपि उनसे कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं होता। फिर भी वे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। मसलन बचपन के रेडियो पर बजती कोई धुन, या अलमारी में रखा कोई पुराना अख़बार जिसका पन्ना अब भी हल्की स्याही की महक लिए है। सरला माहेश्वरी उन्हीं में से एक थीं।

हमारे युवाकाल का वह दौर था जब सूचना का समंदर एक ही समुद्र में सिमटा था। दूरदर्शन। हर रात जैसे किसी तय अनुष्ठान की तरह घरों में शांति छा जाती। माँ रसोई के काम से निवृत्त होकर आले पर कटोरी रख देतीं। पिता अख़बार की तह ठीक कर चश्मा सीधा करते। तभी सलोरा के ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ टीवी के परदे पर एक चेहरा उभरता। संयमित, गंभीर, परंतु आत्मीय। ‘नमस्कार’ की वह ध्वनि ऐसी थी, मानो किसी कुशल वीणा वादक ने पहले तार को हल्के से छेड़ा हो।

सरला जी समाचार नहीं पढ़ती थीं, वे उसे जीती थीं। शब्द उनके होंठों से उतरकर जैसे हम सबके चित्त पर एक-एक अक्षर बनकर अंकित होते। कोई उतावलापन नहीं, कोई बनावट नहीं। सिर्फ़ एक गहरी निष्ठा, जिसे आज की भाषा में पेशेवर ईमानदारी कहा जाता है।

उनकी साड़ी की तहें, माथे पर सधी बिंदिया! कैमरे में स्थिर निगाहें, इन सब में एक युग की मर्यादा झलकती थी। वे सिर्फ़ खबरें नहीं सुनाती थीं, बल्कि भारतीय स्त्री के उस सधी हुए तेज़ की प्रतीक थीं, जो सजग भी है, सौम्य भी। उन दिनों एंकर ‘चेहरा’ नहीं, ‘चरित्र’ होते थे। इस अर्थों में सरला जी उस परंपरा का आदर्श रूप थीं।

फिर समय की नदी बहती रही। चैनलों की बाढ़ आयी। शब्दों की चमक ने स्वर की गरिमा ढँक दी। सरला जी ओझल होती गईं, जैसे कोई पुराना दीपक जो अब भी गरम है, पर लौ मद्धम पड़ चुकी है। पर आज जब उनके न रहने का समाचार मिला, तो लगा वह दीपक एक क्षण को फिर से जल उठा है। उसी शालीन उजास में जिसने कभी हमारे घरों के अंधियारे को विश्व-घटनाओं से जोड़ दिया था।

सरला जी, चली गईं। पर उनकी स्मृतियाँ अब भी दूरदर्शन के उस संगीत-मुखर लोगों की तरह भीतर बजती हैं। इसकी वजह क्या है? यही न कि उन्होंने महज समाचार नहीं सुनाए, आपने एक पीढ़ी को संवाद की मर्यादा सिखाई।

उस मधुर, संयत आवाज़ के पीछे जो संस्कार था, वही शायद हमारी पत्रकारिता को आज सबसे अधिक चाहिए। सतर्कता की संवेदना और भाषा की प्रामाणिकता।

सरला जी की स्मृतियों को नमन…

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