द्रविड़ राजनीति के चौराहे पर तमिलनाडु
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ केवल सरकार गठन का संकट नहीं है बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग के बदलने की बेचैनी भी उपस्थित है। लंबे समय तक यह राज्य भारतीय राजनीति में स्थिरता, स्पष्ट जनादेश और मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व का उदाहरण माना जाता रहा। यहाँ सत्ता का संघर्ष तीखा अवश्य रहा, पर परिणाम अक्सर निर्णायक रहे।
द्रविड़ राजनीति ने तमिलनाडु को ऐसी राजनीतिक संरचना दी जिसमें वैचारिक आग्रह, क्षेत्रीय अस्मिता, भाषायी स्वाभिमान और कल्याणकारी राजनीति एक साथ चलते रहे। किंतु अब वही तमिलनाडु ऐसी स्थिति में दिखाई दे रहा है जहाँ सरकार बनने में कठिनाई हो रही है। यह कठिनाई केवल सीटों की संख्या का प्रश्न नहीं है। इसके भीतर समाज, नेतृत्व, पीढ़ीगत बदलाव, सिनेमा-राजनीति संबंध, गठबंधन संस्कृति और जनता की बदलती आकांक्षाओं का गहरा द्वंद्व छिपा हुआ है।
तमिलनाडु की राजनीति को समझे बिना वर्तमान संकट को समझना कठिन है। 1967 के बाद से यह राज्य लगभग निरंतर द्रविड़ दलों की राजनीति के अधीन रहा। पहले डीएमके और बाद में एआईएडीएमके ने राज्य की सत्ता को अपने बीच बाँट लिया। कांग्रेस धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। राष्ट्रीय दल तमिलनाडु में सहयोगी दल तो बन सके, केंद्रीय शक्ति नहीं। इसका कारण केवल चुनावी रणनीति नहीं था। द्रविड़ आंदोलन ने तमिल समाज में एक वैचारिक भावभूमि निर्मित की थी। भाषा, क्षेत्रीय गौरव, सामाजिक न्याय और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरोध ने राजनीति को भावनात्मक आधार दिया। इस कारण तमिलनाडु की राजनीति अन्य राज्यों की तुलना में अधिक क्षेत्रीय और सांस्कृतिक बनी रही।
एम. करुणानिधि और एम. जी. रामचंद्रन जैसे नेताओं ने राजनीति को केवल प्रशासन नहीं रहने दिया, उसे सांस्कृतिक अभिनय में बदल दिया। बाद में जयललिता ने उसमें व्यक्तित्व की चमक और सत्ता की दृढ़ता जोड़ दी। इन नेताओं के दौर में जनता को यह भरोसा रहता था कि चाहे राजनीतिक संघर्ष कितना भी तीखा हो, अंततः एक स्थिर सरकार बनेगी। व्यक्तित्व इतने विराट थे कि दल उनके इर्द-गिर्द व्यवस्थित रहते थे। किंतु समय के साथ यह नेतृत्व समाप्त हुआ। करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में वह करिश्माई केंद्रीकरण कमजोर होने लगा जिसने दशकों तक व्यवस्था को बाँधे रखा था।
यहीं से वर्तमान संकट की पृष्ठभूमि तैयार होती है। आज तमिलनाडु में जनता केवल दो पारंपरिक दलों के बीच सीमित नहीं रहना चाहती। समाज बदल चुका है। नई पीढ़ी सोशल मीडिया, वैश्विक संस्कृति, रोजगार संकट और पहचान की नई राजनीति के बीच बड़ी हुई है। उसे पुराने द्रविड़ विमर्श का सम्मान तो है, पर वही उसकी एकमात्र राजनीतिक आकांक्षा नहीं रह गया। इसी खाली स्थान में अभिनेता विजय की राजनीतिक उपस्थिति उभरती है। विजय केवल अभिनेता नहीं हैं।
वे तमिल जनमानस में लोकप्रिय सांस्कृतिक चेहरा हैं। तमिल राजनीति में सिनेमा और सत्ता का संबंध नया नहीं है। एमजीआर, करुणानिधि, जयललिता, विजयकांत तक यह परंपरा रही है लेकिन विजय ऐसे समय में राजनीति में आए जब जनता पुरानी संरचनाओं से ऊब भी रही थी और पूरी तरह किसी नए विकल्प पर भरोसा करने को तैयार भी नहीं थी।
वर्तमान स्थिति में सरकार न बन पाने का सबसे बड़ा कारण यही है कि विधानसभा का जनादेश बिखरा हुआ है। कोई दल स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त कर पाया। विजय की पार्टी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी, पर बहुमत से दूर रह गई। डीएमके अपनी पुरानी ताकत के बावजूद पूर्ण नियंत्रण खो चुकी दिखाई देती है। एआईएडीएमके अभी भी सामाजिक आधार रखती है, पर उसका नेतृत्व वैसी ऊर्जा नहीं पैदा कर पा रहा जो जयललिता के समय दिखाई देती थी। परिणामस्वरूप कोई भी दल अपने बल पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।
केवल अंकगणित पर्याप्त व्याख्या नहीं है। वास्तविक समस्या मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक अविश्वास की भी है। तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक गठबंधन आधारित नहीं रही। यहाँ सरकारें सामान्यतः मजबूत बहुमत वाली रही हैं। इसलिए साझा सत्ता की संस्कृति बहुत विकसित नहीं हो पाई। उत्तर भारत के कई राज्यों में गठबंधन सरकारें राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बन चुकी हैं, लेकिन तमिलनाडु में अभी भी दल स्वयं को पूर्ण शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। कोई दल दूसरे को बराबरी का स्थान देने के लिए सहज नहीं है। यही कारण है कि बातचीत के बावजूद स्थायी सहमति बनती नहीं दिख रही।
डीएमके की स्थिति विशेष रूप से दिलचस्प है। एक ओर वह सत्ता से बाहर नहीं रहना चाहती, दूसरी ओर विजय को पूर्ण वैधता देकर भविष्य उनकी का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी भी नहीं बनाना चाहती। यदि वह खुलकर समर्थन देती है तो विजय की राजनीतिक विश्वसनीयता बढ़ेगी। यदि समर्थन नहीं देती तो राजनीतिक अस्थिरता का दोष उस पर भी आ सकता है। एआईएडीएमके की समस्या अलग है। वह अपनी पारंपरिक पहचान बचाने में लगी हुई है। भाजपा के साथ उसके संबंध भी तमिल राजनीति में उसे जटिल स्थिति में डालते हैं। तमिलनाडु का बड़ा हिस्सा अब भी भाजपा को बाहरी राजनीतिक प्रभाव के रूप में देखता है। इसलिए एआईएडीएमके खुलकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती जिससे उसका क्षेत्रीय चरित्र कमजोर पड़े।
विजय की राजनीति भी विरोधाभासों से भरी है। जनता उन्हें नए विकल्प के रूप में देखना चाहती है लेकिन राजनीति केवल लोकप्रियता से नहीं चलती। संगठन, विधायकों की निष्ठा, सत्ता-संतुलन और प्रशासनिक अनुभव भी आवश्यक होते हैं। सिनेमा का नायक दो घंटे में व्यवस्था बदल देता है पर लोकतंत्र में हर विधायक का अपना गणित होता है।
विजय को अब यह समझना पड़ रहा है कि पर्दे की तालियाँ और विधानसभा की संख्याएँ अलग-अलग चीज़ें हैं। भारतीय राजनीति में लोकप्रियता सत्ता का द्वार खोल सकती है पर सत्ता को स्थिर रखने के लिए धैर्य, समझौता और कठोर संगठन चाहिए।
इस पूरे संकट में राज्यपाल की भूमिका भी चर्चा में है। भारतीय संघीय ढाँचे में जब स्पष्ट बहुमत नहीं आता, तब राज्यपाल का निर्णय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। किसे पहले बुलाया जाए, कितने समय का अवसर दिया जाए, समर्थन पत्रों की वैधता क्या हो, यह सब राजनीतिक विवाद का विषय बन जाता है। विपक्ष अक्सर राज्यपाल पर केंद्र सरकार के प्रभाव का आरोप लगाता है।
तमिलनाडु में भी यह अविश्वास मौजूद है। इसलिए सरकार गठन केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं रह जाता, वह राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन जाता है।
इसके अतिरिक्त एक सामाजिक परिवर्तन भी इस संकट के पीछे काम कर रहा है। तमिल समाज अब एकरैखिक नहीं रहा।
शहरीकरण, आईटी उद्योग, प्रवासन, उच्च शिक्षा और वैश्विक संपर्क ने नई राजनीतिक आकांक्षाएँ पैदा की हैं। पुरानी द्रविड़ राजनीति सामाजिक न्याय की बड़ी उपलब्धियों के बावजूद नई पीढ़ी की आर्थिक बेचैनियों का पूरा उत्तर नहीं दे पा रही। बेरोजगारी, निवेश, तकनीकी शिक्षा और वैश्विक अवसर जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इस कारण जनता पारंपरिक दलों को चुनौती देना चाहती है पर पूरी तरह उन्हें त्यागने का साहस भी नहीं जुटा पा रही। यही अधूरा विश्वास विधानसभा में अधूरे जनादेश के रूप में दिखाई देता है।
तमिलनाडु में सरकार न बन पाने का संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूरे भारत की क्षेत्रीय राजनीति के भविष्य का संकेत देता है। करिश्माई नेतृत्व के बाद दलों का संक्रमणकाल अक्सर अस्थिर होता है। जब पुराने प्रतीक टूटते हैं और नए प्रतीक पूरी तरह स्थापित नहीं होते, तब राजनीति अनिश्चित हो जाती है। तमिलनाडु आज उसी संक्रमण में है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक संस्कृति के पुनर्गठन का समय है।
यदि अगले कुछ दिनों में कोई गठबंधन बनता भी है, तब भी स्थिरता की गारंटी नहीं होगी। अल्पमत सरकार लगातार दबाव में रहेगी। विधायकों की निष्ठाएँ बदल सकती हैं। पुनः चुनाव की संभावना भी बनी रह सकती है। लेकिन दूसरी ओर यह संकट तमिलनाडु को एक नई राजनीतिक परिपक्वता की ओर भी ले जा सकता है। संभव है कि राज्य पहली बार गठबंधन राजनीति की व्यवहारिकता सीखे। संभव है कि नई पीढ़ी के नेता अधिक संवादात्मक राजनीति विकसित करें। संभव यह भी है कि द्रविड़ राजनीति स्वयं को नए सामाजिक प्रश्नों के अनुसार पुनर्गठित करे।
लोकतंत्र की विडंबना यही है कि जनता परिवर्तन चाहती है, पर अस्थिरता नहीं चाहती। वह नए चेहरे चाहती है, पर अनुभव भी चाहती है। तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति इसी द्वंद्व का परिणाम है। जनता ने पुरानी राजनीति को चुनौती दी है, लेकिन नई राजनीति को पूर्ण अधिकार अभी नहीं दिया। परिणामस्वरूप सत्ता बीच रास्ते में खड़ी है। सरकार बनने में देरी दरअसल उस मानसिक निर्णय की देरी है जो समाज के भीतर चल रही है।
तमिलनाडु की राजनीति का यह क्षण केवल चुनावी समाचार नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न का संकेत है कि क्या भारत के क्षेत्रीय दल अपने करिश्माई अतीत के बाद संस्थागत भविष्य बना पाएँगे। यदि नहीं, तो हर चुनाव के बाद ऐसी अस्थिरता बढ़ सकती है। और यदि हाँ, तो तमिलनाडु एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत कर सकता है जहाँ व्यक्तित्व से अधिक संस्थाएँ महत्वपूर्ण होंगी। फिलहाल स्थिति धुँधली है। सत्ता के गलियारों में बातचीत जारी है, विधायक सुरक्षित स्थानों पर रखे जा रहे हैं, और जनता टीवी स्क्रीन पर संख्या जोड़ रही है। लोकतंत्र कभी-कभी गणित की ऐसी कक्षा बन जाता है जहाँ पूरी जनता परिणाम का इंतज़ार करती रहती है और उत्तर-पुस्तिका अब भी जाँच में होती है।
आभार~ परिचय दास
