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मातृभाषाओं का प्रश्न सबसे वंदनीय है

मातृभाषाओं का प्रश्न सबसे वंदनीय है

विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर विशेष

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज विश्व मातृभाषा दिवस है । आज ही के दिन पूर्वी पाकिस्तान ( आज के बंगलादेश ) के मुसलमान उर्दू की जगह बंगला को राजभाषा बनाने की माँग करते हुए अपनी ही सरकार की गोलियों के शिकार हुए थे। उस समय पाकिस्तान नया-नया ही बना था और उसका संविधान बन रहा था। पाकिस्तान की संविधान सभा ने उर्दू को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया परंतु बांग्लादेश के मुसलमानों को यह स्वीकार नहीं था । उन्होंने सड़क पर उतर कर इसका विरोध किया ।

यह हृदयद्रावक घटना थी। धर्म के लिए मरना , राष्ट्र के लिए मरना, जाति के लिए मरना तो आम बात है परंतु भाषा के लिए मरने की यह पहली बड़ी घटना थी। इसी की याद में संयुक्त राष्ट्र संघ की शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ( यूनेस्को ) के महाधिवेशन ने नवंबर 1999 में विश्व मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2002 के अपने प्रस्ताव में इस दिवस की घोषणा का स्वागत किया।

बंगलादेश में शहीद हुए लोगों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया । 1971 में जब बंगलादेश आजाद हुआ तब बंगला वहाँ की राजभाषा बनी और रवीन्द्रनाथ टैगोर का लिखा हुआ गीत ‘ अमार सोनार बांग्ला … ‘ राष्ट्रगीत बना । 2000 से पूरी दुनिया में 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस मनाया जाता है।

मां , मातृभूमि और मातृभाषा

माँ जैसी अभिन्न स्मृति के साथ मातृभूमि और मातृभाषा जुड़ गयी है । यह मातृभाषा के महत्त्व को बताता है। मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । कुछ लोग धर्म के आधार पर अपनी मातृभाषा लिखवाते हैं । बिहार के लोगों के लिए हिंदी , संस्कृत, उर्दू अर्जित की हुई भाषा है । बिहार के लोगों की मातृभाषा भोजपुरी, मगही , मैथिली , अंगिका , बज्जिका , सुरजापुरी है । यहाँ की कुछ लोग जाति और धर्म के आधार पर अपनी मातृभाषा हिंदी, संस्कृत , उर्दू लिखवाते हैं।

कभी राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी क्षेत्र के मातृभाषाओं का प्रश्न उठाया था । आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है । हिंदी क्षेत्र की मातृभाषाओं ( भोजपुरी , मगही , अंगिका , वज्जिका , सुरजापुरी , अवधी , ब्रजभाषा , राजस्थानी , छत्तीसगढी , बुंदेली आदि ) को हिंदी में गिन लिया जाता है । इसके पीछे यह मान्यता है कि जनसंख्या और क्षेत्र अधिक दिखाने से हिंदी को मजबूती मिलेगी ।

मेरे जानते इसका विपरीत असर हुआ । दक्षिण भारत , विशेषकर तमिलनाडु में हिंदी का विरोध इसी के वजह से होता है । वहॉं के लोगों को लगता है कि उत्तर भारत के लोगों की मातृभाषा हिंदी है और अगर वह राजभाषा हो गई तो प्रतियोगी परिक्षाओं में उत्तर भारत के लोगों को आसानी हो जाएगी और हम पिछड़ जाएंगे । अंग्रेजी के राजभाषा रहने से दोनों को समान रूप से रहेंगे । हमारे लिए खड़ी बोली हिंदी अर्जित की हुई भाषा है । उसे सीखने के लिए अभ्यास की जरूरत पड़ती है जैसे तमिलनाडु के लोगों को पड़ती है । गाँवों में खड़ी बोली (हिंदी) बोलने पर लोग कहते हैं ” का अंग्रेजी छटले बाड़ ! ”
उत्तर भारत की मातृभाषाओं की मान्यता से हिंदी को खतरा नहीं है ।

जनगणना में मातृभाषा

भारत भौगोलिक रूप से एक बड़ा देश तो है ही साथ ही यहां विभिन्न जाति , धर्म , संप्रदाय , भाषा आदि के लोग रहते हैं । कहीं एक जगह बैठकर या किसी एक फार्मूले से पूरे देश को ठीक ढंग से जानना – समझना अथवा सही ढंग से चलाना संभव नहीं है ।

जनगणना के द्वारा विभिन्न तरह के आंकड़े जमा होते हैं । इसके आधार पर पूरे देश को समझने – जानने में मदद मिलती है । भाषा भी ऐसा ही एक सवाल है । देश के लोगों की मातृभाषा क्या है ? इसे जनगणना के माध्यम से जाना जा सकता है । अब तक इसी उद्देश्य से मातृभाषा को शामिल किया जाता रहा है। इससे देश की भाषिक विविधता का अंदाज होता है। कुछ लोगों को यह लगता है की जनगणना में ईमानदारी से मातृभाषा की गणना होने से हिंदी भाषियों की संख्या घटी हुयी दिखाई देगी । असल में उत्तर भारत के सभी लोगों की मातृभाषा हिंदी मानी जाती है । यहाँ की एक भाषा मैथिली संविधान की आठवीं अनुसूची में आ चुकी है । मिथिलांचल में बड़ी संख्या में लोग अपनी मातृभाषा हिंदी नहीं लिखवाते हैं । इधर भोजपुरी , राजस्थानी , अवधी , ब्रजभाषा , मगही , अंगिका को अपनी मातृभाषा के रूप में मानने की माँग जोड़ पकड रही है । अभी तक इन भाषाओं को बोलनेवालों को हिंदी में गिन लिया जाता रहा है । जनगणना में मातृभाषा को शामिल किया गया तो भोजपुरी , राजस्थानी , मगही , अंगिका , अवधी , ब्रजभाषा जैसी कई भाषा – भाषी अपनी मातृभाषा हिंदी नहीं लिखवाएंगे ।

उत्तर भारत में 49 से अधिक ऐसी भाषाएँ हैं जिनकी गणना जनगणना में हिंदी में की जाती है । ऐसी भाषाओं में अवधी , भोजपुरी , मगही , अंगिका , वज्जिका , सुरजापुरी , राजस्थानी , बुंदेलखंडी , छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाएँ शामिल हैं । इन भाषाओं को हिंदी मान लिया जाता है ।

मातृभाषा की परिभाषा

सन 1961 की जनगणना में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन मातृभाषाओं की गणना की व्यवस्था करवाई थी । उस समय मातृभाषा तय करने वाला सरकारी निर्देश इस प्रकार था ” जनगणना के क्रम में लोग जैसा कहते हैं , उसी प्रकार मातृभाषा का उल्लेख , बोली सहित , पूर्णरूपेण करें । मातृभाषा वह भाषा है , जिसमें किसी की माँ बाल्यावस्था में उससे बोलती है या वह भाषा है जो मुख्यतः परिवार में बोली जाती है , अगर बाल्यावस्था में ही माँ की मृत्यु हो गई हो तो उस भाषा का उल्लेख करें जो इस व्यक्ति की बाल्यावस्था में उसके घर में मुख्यतः बोली जाती हो । बच्चे या गूंगे – बघिर के संबंध में उस भाषा का उल्लेख करें जो उन सबों की माँएँ बराबर बोलती हो । ”

मातृभाषा तय करनेवाले इस निर्देश के फलस्वरूप उत्तर भारत की भाषाओं की संख्या में बढोत्तरी हुई । इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है । सन 1951 के जनगणना में भोजपुरी भाषियों की संख्या 1902 थी वह सन 1961 की जनगणना में बढ़ कर 78 लाख हो गई । कुछ लोगों को लगा कि इससे हिंदी की संख्या घट रही है । इसका विरोध हुआ । फलतः 1971 की जनगणना में इसे बदल दिया गया । तब से इन भाषाओं को हिंदी माना जाता रहा है ।

मातृभाषा से बहुभाषिकता की ओर

भाषाविज्ञान की एक धारा का मानना है कि किसी देश में भाषा की अधिकता उस देश के विकास में बाधक तत्त्व की भूमिका निभाती है । अगर कोई व्यक्ति भी बहुभाषिक है तो उसका भी विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है । यस्पर्सन और फिशमैन जैसे भाषावैज्ञानिक इस विचार के पोषक हैं।

इस विचार को हम विस्तारित करें तो यह बात निकलेगी कि संसार में भाषा की बहुलता संसार के विकास में बाधक तत्त्व है। पूरी दुनिया की भाषा एक होनी चाहिए। और आज की तारीख में वैश्विक स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में स्थापित अंग्रेजी को सभी लोगों को स्वीकार करना चाहिए ।

यद्यपि इसका एक दूसरा रूप भी है। जो भाषा जहाँ बड़ी है वहाँ अपने से छोटी भाषाओं को निगलने का प्रयास करती हैं। इसके पीछे भी एक भाषा वाला तर्क दिया जाता है । भारत में हिंदी, चीन में मंदारिन सहित विश्व के सभी भागों में कमोवेश ऐसा प्रयास दिखता है ।

एक मोटा अनुमान है कि हिंदी क्षेत्र में 49 जनभाषाएँ हैं । यद्यपि इसकी संख्या और अधिक है। हिंदी के अति उत्साही समर्थक इन भाषाओं को मान्यता दिये जाने का विरोध करते हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि जब इन सभी भाषाओं को मान्यता मिल जाएगी, उनके शब्दों में ‘अलग हो जायेंगी तो हिंदी कहाँ जाएगी! ऐसी चिंता करने वाले चिंतकों की बुद्धि के अनुसार जिस भाषा का क्षेत्र और जनसंख्या जितना ही अधिक होगा वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध होगी !

यहाँ पर हमें एक बात पर गौर करना चाहिए हिंदी को पूरे उत्तर भारत की भाषा के रूप प्रचारित करने का उल्टा परिणाम भी हुआ दक्षिण भारत के लोगों को लगता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने से उन लोगों को परीक्षाओं तथा अन्य जगहों पर अधिक लाभ होगा जिनकी मातृभाषा हिंदी है। वे प्रयास के साथ कितनी भी हिंदी सीखेंगे तो मातृभाषा वालों की तुलना में पीछे ही रहेंगे। सच्चाई यह है कि उत्तर भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आज भी प्रयास के साथ हिंदी सीखती है। उनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है ।

असल में हिंदी के इस फैलाव के बीज आजादी की लड़ाई में छिपे हैं । अंग्रेज यह प्रचारित कर रहे थे कि भारत एक राष्ट्र है ही नहीं । उनके हिसाब से एक राष्ट्र के लिए कई अन्य चीजों के साथ एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए थी । इसके जबाब में भारतीय राष्ट्रवादियों हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में पेश किया जो आजादी की लड़ाई का अभिन्न अंग बन गई। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी का खूब विस्तार हुआ। पूरे उत्तर भारत के लोगों ने अपनी मातृभाषा की जगह हिंदी को आगे बढ़ाया ।

हिंदी क्षेत्र हरदम बहुभाषिक रहा है। यहाँ आदिकाल में डिंगल ( राजस्थानी ) पिंगल ( ब्रजभाषा) और मैथिली साहित्य-सृजन की भाषा रही है। भक्तिकाल और रीतिकाल में एक साथ कई-कई भाषाओं में साहित्य सृजन हुआ । भक्तिकाल तो मातृभाषाओं के आंदोलन सरीखा ही था। इस काल में सभी कवियों ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं में लिखा। कई कवियों ने एक अधिक भाषाओं में लिखा ।

भक्तिकाल से रीतिकाल तक साहित्य-सृजन की मुख्य भाषा ब्रजभाषा और अवधी रही । भक्तिकाल में कृष्णभक्त कवियों की मुख्य भाषा ब्रजभाषा और रामभक्त मधुरोपासक कवियों की मुख्य भाषा अवधी रही। परंतु अधिकांश कवियों ने एक से अधिक भाषाओं में सृजन किया। अमीर खुसरो ने फारसी, खड़ीबोली, उर्दू सहित कई भाषाओं में साहित्य – सृजन किया।

आधुनिक काल की शुरुआत भारतेन्दु युग से होती है । यह युग भी बहुभाषिक रहा है । इस युग में मुख्यतः ब्रजभाषा और खड़ी बोली में साहित्य-सृजन हुआ। इन दोनों भाषाओं के अलावा इस युग में उर्दू में भी साहित्य-सृजन हुआ। इस युग में शुरू में प्रमुखता ब्रजभाषा की रहीं, खड़ीबोली का स्थान उसके बाद रहा। धीरे-धीरे खड़ीबोली की प्रधानता बढ़ते गई। ब्रजभाषा, खड़ीबोली के साथ-साथ इस काल में उर्दू में भी सृजन होने लगा । भारतेन्दु स्वयं ‘रसा’ नाम से उर्दू में शायरी करते थे। इसी तरह प्रताप नारायण मिश्र और उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रमघन’ क्रमशः ‘बरहमन’ और ‘अब्र’ नाम से उर्दू में लिखते थे

द्विवेदी युग में गया प्रसाद शुक्ल स्नेही सहित कई लेखक खड़ी बोली, ब्रजभाषा के साथ-साथ उर्दू में लिखते थे। रामनरेश त्रिपाठी उर्दू बहर में लिखा करते थे। खड़ी बोली के प्रथम कवि माने जाने वाल श्रीधर पाठक खड़ी बोली के साथ-साथ ब्रजभाषा में लिखा ।

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