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महाशिवरात्रि का लालित्य

महाशिवरात्रि का लालित्य

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

शिवरात्रि की रात एक साधारण रात नहीं होती; वह समय का वह बिंदु है जहाँ अँधेरा अपने भीतर एक सूक्ष्म दीप्ति को छिपाए रहता है। यह अँधेरा भय का नहीं, गर्भ का अँधेरा है—जैसे किसी आदिम शून्य में सृष्टि की पहली धड़कन छिपी हो। जिसे “निगेटिव कैपेबिलिटी” कहा गया—अर्थात् अनिश्चितता और रहस्य में ठहरने की क्षमता—शिवरात्रि उसी विराम की आध्यात्मिक प्रतिध्वनि है। यहाँ प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए जाते, उन्हें प्रेमपूर्वक धारण किया जाता है।

शिव इस रात किसी एक प्रतिमा या कथा के पात्र नहीं रह जाते; वे अस्तित्व की उस गहराई का नाम बन जाते हैं जहाँ संहार और सृजन एक ही श्वास में समाहित हैं।दार्शनिक परंपरा में द्वंद्वात्मक सिद्धांत—थीसिस, एंटीथीसिस और सिंथेसिस—जिस प्रकार विरोधों को एक उच्चतर एकता में रूपांतरित करता है, उसी प्रकार शिव का तांडव विनाश को भी एक रचनात्मक आवेग में बदल देता है। विनाश यहाँ अंतिम सत्य नहीं, एक संक्रमण है—एक रूपांतरण की सांध्य बेला।

शिवरात्रि की रात्रि में उपवास केवल देह का अनुशासन नहीं, संवेदना की एकाग्रता है। जब जिह्वा विराम लेती है, तब मन की लहरें अधिक स्पष्ट सुनाई देती हैं। सौंदर्यशास्त्र में “कैथार्सिस” की जो अवधारणा है—अंतर के विषाद का परिशोधन—वह इस रात्रि में साधना के रूप में उपस्थित होती है। भक्त का जागरण किसी बाहरी अनुष्ठान का आग्रह नहीं, भीतर के अंधकार में उतरने की सहमति है।

शिवरात्रि की कथा में जब हम समुद्र-मंथन का प्रसंग स्मरण करते हैं और नीलकंठ की छवि उभरती है, तो यह केवल पौराणिक आख्यान नहीं रह जाता। यह मनुष्य की नैतिक क्षमता का प्रतीक बन जाता है—विष को पीकर भी उसे अमृत में रूपांतरित कर देने की। आधुनिक मनोविज्ञान में जिसे ‘शैडो’ कहा गया—मनुष्य का वह अँधेरा पक्ष जिसे वह अस्वीकार करता है—शिव उसी शैडो को अंगीकार करते हैं। वे उसे दबाते नहीं, धारण करते हैं। यही धारण करना करुणा का चरम रूप है।

इस रात्रि में बजती हुई घंटियों की ध्वनि किसी सामूहिक सम्मोहन का परिणाम नहीं; वह समय की रेखीयता को तोड़ने का प्रयत्न है। पश्चिमी आधुनिकता ने समय को घड़ी की सूइयों में बाँध दिया, उसे उत्पादकता और प्रगति के पैमाने पर मापा। पर शिवरात्रि उस रेखीय समय को वृत्त में बदल देती है—एक ऐसा वृत्त जहाँ प्रारंभ और अंत का भेद मिट जाता है। यह वही वृत्त है जिसे नटराज के नृत्य में देखा जाता है—आग के घेरे में थिरकता हुआ ब्रह्मांड।

इस नृत्य में भय नहीं, लय है। दार्शनिक नीत्शे ने ‘डायोनिसियन’ उत्सव का उल्लेख किया था—एक ऐसा उल्लास जिसमें व्यक्ति अपनी सीमाओं को विसर्जित कर देता है। शिवरात्रि का तांडव भी वैसा ही है, किंतु यहाँ उच्छृंखलता नहीं, संयमित उन्मेष है। यह उन्मेष भीतर की गांठों को ढीला करता है। मनुष्य अपनी कठोरता से मुक्त होता है।

रात्रि का गाढ़ापन जब अपने चरम पर पहुँचता है, तब दीपक की लौ अधिक उजली प्रतीत होती है। यह लौ किसी बाहरी तेल से नहीं, विश्वास से जलती है। पश्चिमी अस्तित्ववाद ने मनुष्य को एकाकी और उत्तरदायी प्राणी के रूप में देखा। शिवरात्रि उस उत्तरदायित्व को आध्यात्मिक आयाम देती है—मनुष्य अपने भीतर के शून्य से संवाद करे, अपने भय को पहचाने, और उसे आलोक में रूपांतरित करे।

शिवलिंग पर गिरती हुई जलधारा एक अत्यंत कोमल दृश्य रचती है। वह जल, जो निरंतर गिरता है, समय की धारा जैसा है—परंतु शिवलिंग की स्थिरता उस धारा को संतुलन देती है। दार्शनिक परंपरा में ‘बीइंग’ और ‘बीकमिंग’ का जो द्वंद्व है—स्थायित्व और परिवर्तन का—वह यहाँ एक ही दृश्य में सुलह कर लेता है। जल बदलता रहता है, पर आधार अचल है।

शिवरात्रि का उपवास, जप, और मौन—ये सब मिलकर एक ऐसी काव्यात्मक संरचना रचते हैं जहाँ जीवन की क्षणभंगुरता और अनंतता एक-दूसरे को आलिंगन करते हैं। यह आलिंगन किसी सिद्धांत की कठोरता से नहीं, अनुभूति की कोमलता से जन्म लेता है। सौंदर्यशास्त्र में ‘सब्लाइम’—उदात्त—की जो अवधारणा है, वह भय और विस्मय के संगम से बनती है। शिवरात्रि उसी उदात्तता का भारतीय रूप है—जहाँ हिमालय की नीरवता, गंगाजल की शीतलता और डमरू की ध्वनि एक साथ गूँजती हैं।

यह रात्रि मनुष्य को स्मरण कराती है कि भीतर का अँधेरा शत्रु नहीं, संभावना है। यदि हम उसे स्वीकार कर लें, तो वही अँधेरा प्रकाश का बीज बन सकता है। शिवरात्रि का अर्थ किसी बाहरी विजय में नहीं, भीतर की स्वीकृति में है। जब हम अपने ही मन के विष को पहचान लेते हैं, तब नीलकंठ होने की संभावना जन्म लेती है।

शिवरात्रि एक उत्सव से अधिक एक दृष्टि है—एक ऐसी दृष्टि जो विरोधों को अलग-अलग नहीं देखती, उन्हें एक ही वृत्त में समाहित करती है। यह दृष्टि हमें बताती है कि जीवन का सौंदर्य उसके संतुलन में है—विनाश और सृजन, मौन और नाद, अँधेरा और प्रकाश—सब एक ही लय के विभिन्न स्वर हैं।

इस रात्रि में जागना केवल आँखें खोलना नहीं; यह चेतना की परतों को धीरे-धीरे हटाना है। जब अंतिम पहर में आकाश कुछ हल्का होने लगता है, तब लगता है कि भीतर भी कोई प्रभात उतर आया है। शिवरात्रि की यही लालित्यपूर्ण सच्चाई है—अँधेरे के गर्भ से जन्म लेती हुई एक नर्म, शांत और दीर्घकालिक उजास।

आभार- आदरणीय परिचय दास सर।

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