धुरंधरः सिनेमा की नई शैली
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

फिल्में हमेशा से नैरेटिव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। भारतीय फिल्म जगत में अब तक वामपंथियों का बौद्धिक और गैंगस्टरों का आर्थिक दबदबा रहा है। इस दबदबे का नैरेटिव के नजरिए से भारतीय समाज में क्या प्रतिकूल असर पड़ा, ये किसी से छिपा नहीं है। वामपंथियों के बारे में तो ये लोकोक्ति प्रचलित रही है कि सरकार किसी की भी हो सिस्टम पर कब्जा उन्हीं का रहता है। लेकिन सरकार बदलने के बाद धीमी रफ्तार से ही सही, अब फिल्म जगत में वामपंथियों का बौद्धिक वर्चस्व कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।
धर्म को अफीम बताने वाले वामंथियों ने छद्म सेक्यूरिज्म, विकृत राष्ट्रवाद और सलेक्टिव सामाजिकता के नाम पर लोगों को जो अफीम चटाई थी, उसके असर से लोग अब धीमे-धीमे उबर रहे हैं। अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को नई अवधारणा के साथ प्रस्तुत करने की चलन बढ़ा है। ‘धुरंधर’ फिल्म भी एक ऐसी नवाचारी फिल्म साबित हुई है, जिसने अपने बेखौफ, बेलाग और बेपरवाह अंदाज में अपनी बात कहकर नैरेटिव के मद्देनजर नई बहस छेड़ दी है।
आदित्य धर ने सिनेमा को लेकर बनाए गए ऑडियोलॉजिकल वेलिडेशन और पॉलिटिकल करेक्टनेस के औपचारिक आग्रह के बंधन की परवाह नहीं करते हुए ‘धुरंधर’ फिल्म के जरिए सर्वथा नवीन सिनेमाई परिभाषा गढ़ दी है। ‘धुरंधर’ फिल्म भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर बनी फिल्म जरूर है, लेकिन उन्होंने इस फिल्म में दो दुश्मन देशों की बजाए दो ‘कौमों’ के बीच के तकरार को रेखांकित किया है। आदित्य धर ने मेजर इकबाल और उसके बाप रिटायर्ड ब्रिगेडियर जहांगीर जैसे पाक सेना के अफसरानों में काफिरों के प्रति मौजूद नफरती सोच को गजवा-ए-हिंद, माल-ए-गनीमत जैसी ट्रेंडिंग सोशल मीडियाई शब्दावली को खास नैरेटिव के साथ डॉयलॉग्स में पिरोया है।
फिल्म के जरिए दिए जाने वाले संदेश की मंशा को लेकर आदित्य धर ‘धुरंधर’ के पहले पार्ट से ही बिल्कुल क्लियर थे। तभी तो उन्होंने इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के हाईजेकर जहूर मिस्त्री से ये कहलवाया था कि, ‘हिंदू बड़ी फट्टू कौम है।‘ आदित्य चाहते तो ‘हिंदू’ की बजाए ‘भारतीय’ भी कहलवा सकते थे। तो क्या आदित्य ने सोच-समझ कर ये डॉयलाग बुलवाया था ताकि दर्शकों की मजहबी आधार पर गोलबंदी करके नैरेटिव की नई लकीर खींची जा सके?
दरअसल आदित्य धर ने भारतीय सिनेमा की अब तक की सभी प्रचलित परंपरागत मान्यताओं और मजबूरियों को सिरे से नकार दिया है। यही वजह है कि ऑडियोलॉजिकल करेक्टनेंस के फेर में नहीं पड़ते हुए आदित्य धर ने ‘धुरंधर’ में भारतीय पाले से ऐसे किसी मुस्लिम पात्र को शामिल नहीं किया है जो देशभक्त के तौर पर मुस्लिम बिरादरी का प्रतिनिधित्व कर सके। और ना ही पाकिस्तानी पाले में ‘अमन की आशा’ का संदेश देने वाले किसी मुस्लिम करेक्टर को उन्होंने धुरंधर की कहानी का हिस्सा बनाने की जरूरत समझी है।
कुछ बौद्धिक वर्ग विशेष के लोग आदित्य धर के इस रवैये को उनका वैचारिक अतिवाद बताते हुए उनके अंदाज-ए-बयां पर ऐतराज जता रहे हैं। लेकिन फिल्म की रिकॉर्डतोड़ कामयाबी ये बताती है कि लोगों को आदित्य धर की प्रस्तुति का अंदाज बेहद पसंद आया है। तो क्या ये माना जाए कि अब फिल्मों में ‘रहमदिल रहीम चाचा’ के लिए रोल मिलने की गुंजाइश कम हो गई है?
