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हँसी के बहाने: मूर्खता का सौन्दर्य

हँसी के बहाने: मूर्खता का सौन्दर्य

अप्रैल फूल पर विशेष आलेख

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मनुष्य के इतिहास में जितनी गंभीर घटनाएँ दर्ज हैं, उतनी ही चुपचाप उसके भीतर एक हल्की, लगभग अदृश्य-सी हँसी भी बहती रहती है—जैसे किसी पुरानी नदी के तल में बचा हुआ पानी। उसी हँसी का एक दिन है, जब मनुष्य स्वयं को और दूसरों को एक साथ थोड़ी देर के लिए उलट-पुलट कर देखता है। यह दिन बताता है कि समझदारी का दावा जितना ठोस लगता है, उतना ही भीतर से खोखला भी हो सकता है। मूर्ख बनना और बनाना, दोनों ही इस खोखलेपन को उजागर करने के छोटे-छोटे उत्सव हैं।

मूर्खता, दरअसल, कोई स्थायी गुण नहीं है; यह एक क्षणिक स्थिति है, जिसमें हम अपने ही बनाए हुए विश्वासों के जाल में उलझ जाते हैं। कोई हमें एक साधारण-सी बात को असाधारण बनाकर कह देता है और हम बिना सोचे-समझे उस पर विश्वास कर लेते हैं। उस एक क्षण में हमारी सारी तर्क-प्रणाली जैसे छुट्टी पर चली जाती है। हम हँसते हैं और फिर अचानक समझते हैं कि हँसी का लक्ष्य हम स्वयं हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ मनुष्य अपने अहंकार के साथ सबसे अधिक ईमानदार हो सकता है—क्योंकि वहाँ उसके पास छिपाने के लिए कुछ बचता ही नहीं।

मूर्ख बनाना एक तरह की कला है। इसमें क्रूरता नहीं बल्कि चतुराई का हल्का स्पर्श होता है। यह उस सीमा तक ही सुंदर है, जहाँ तक वह किसी को आहत किए बिना उसके भीतर के कठोर विश्वासों को थोड़ी देर के लिए ढीला कर दे। जैसे कोई बच्चा अपने पिता से कह दे कि आसमान आज हरा हो गया है और पिता एक पल के लिए सचमुच खिड़की की ओर देख लें—वहीं उस क्षण में एक अद्भुत समता जन्म लेती है। सत्ता, उम्र, अनुभव—सब कुछ एक क्षण के लिए बराबर हो जाता है। मूर्ख बनाना यहाँ किसी को गिराने का नहीं बल्कि सबको एक ही धरातल पर लाने का साधन बन जाता है।

परंतु मूर्ख बनना, उससे कहीं अधिक गहरा अनुभव है। इसमें एक प्रकार की विनम्रता छिपी होती है। जब हम स्वयं को मूर्ख बनते हुए पकड़ लेते हैं, तब हमारे भीतर एक दरार खुलती है, जिससे प्रकाश अंदर आता है। यह प्रकाश हमें बताता है कि हम जितने सुनिश्चित थे, उतने नहीं हैं; जितने सजग थे, उतने भी नहीं और यही बोध हमें थोड़ा अधिक मनुष्य बनाता है। जो व्यक्ति अपने ऊपर हँस सकता है, वही दूसरों के साथ भी एक सहज संबंध बना सकता है। उसकी हँसी में कटुता नहीं बल्कि एक तरह की आत्म-स्वीकृति होती है।

अप्रैल का यह पहला दिन, अपने भीतर एक अजीब-सी द्वैतता लिए हुए है। एक ओर यह छल का दिन है, दूसरी ओर यह सत्य का भी दिन है। छल इसलिए कि हम एक-दूसरे को भ्रमित करते हैं; सत्य इसलिए कि उसी भ्रम के टूटने में हम अपनी सीमाओं को पहचानते हैं। यह दिन हमें सिखाता नहीं बल्कि धीरे-से याद दिलाता है कि हम सभी अपने-अपने छोटे-छोटे भ्रमों के साथ जी रहे हैं। कोई अपने ज्ञान पर, कोई अपने पद पर, कोई अपने संबंधों पर—और इन सबके बीच एक हल्की-सी धक्का हमें दिखा देता है कि यह सब कितना अस्थायी है।

इस पूरे खेल में एक जोखिम भी है। जब मूर्ख बनाने की प्रवृत्ति संवेदनहीनता में बदल जाती है तब वह हँसी की जगह अपमान बन जाती है। तब यह उत्सव नहीं बल्कि एक प्रकार का आक्रमण हो जाता है। इसलिए इस दिन की असली गरिमा इसी में है कि हम सीमा को पहचानें—किसी की गरिमा को तोड़े बिना, उसके भ्रम को हल्के से छुएँ। यह संतुलन ही इस खेल को सुंदर बनाता है।

मनुष्य का जीवन स्वयं एक लंबा अप्रैल फूल है। हम योजनाएँ बनाते हैं, भविष्य के लिए निश्चितताएँ गढ़ते हैं और समय बार-बार उन पर हँसता है। हम सोचते हैं कि हमने सब समझ लिया है और जीवन अचानक कोई नया मोड़ दिखा देता है। इस अर्थ में, हम सभी निरंतर मूर्ख बनते रहते हैं—और शायद यही हमारी सबसे बड़ी संभावना भी है क्योंकि यदि हम पूरी तरह समझदार हो जाएँ तो हमारे भीतर आश्चर्य की जगह ही समाप्त हो जाएगी।

मूर्ख बनना और बनाना कोई साधारण क्रिया नहीं है; यह मनुष्य के आत्मबोध का एक सूक्ष्म साधन है। इसमें हँसी है पर उस हँसी के पीछे एक गहरी गंभीरता भी छिपी है। यह हमें हमारे ही बनाए हुए दर्पण के सामने खड़ा कर देता है, जहाँ हम स्वयं को थोड़ा अलग, थोड़ा असहज और शायद थोड़ा अधिक सच्चा देख पाते हैं। यही इस दिन की असली उपलब्धि है—कि हम अपने भीतर की उस हल्की-सी दरार को पहचान लें, जहाँ से प्रकाश आता है और हमें याद दिलाता है कि हम अभी भी पूरी तरह निश्चित नहीं हुए हैं और शायद यही हमारी सबसे बड़ी मुक्ति है।

आभार~ परिचय दास सर

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