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पहली भोर के हनुमान

पहली भोर के हनुमान

हनुमान जयंती पर विशेष आलेख

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

कहते हैं, जीवन के सबसे स्थायी परिचय वही होते हैं, जो बचपन में घटित होते हैं। तब तक मन अभी किसी विचार से बोझिल या आवेशित नहीं होता। हनुमान जी से पहला परिचय भी ऐसी ही एक भोर में हुआ था। मशरक में। वहाँ हर मनई में भक्ति की आर्द्रता थी। पीपल की छाँव जस, शीतलता। वह कोई साधारण भोर नहीं थी।

चैत्र की मृदुल वेला। सूरज अभी-अभी गेंहूँ की बालियों को सोने की झिलमिल देता निकलने को आतुर। पर, तनिक अलसाया-सा। दूर से मंदिर के लाउडस्पीकर पर कोई मधुर नाद उठता—’हे दुखभंजन मारुति नंदन…।’ अभी बाल-मन उसके अर्थ नहीं जानता था। पर, उस ध्वनि में आत्मीयता थी। मानो कोई अपने ही नाम से पुकार रहा हो। मन ठिठक गया था। यह कौन हैं, जो दुखभंजन हैं? कौन हैं, जो हर भोर इस कस्बे को अपनी वंदना में जगाते हैं?

तब चौथी कक्षा में पढ़ता था। आश्रम स्कूल में। दो ही कमरे थे, वहाँ। एक में प्रधानाचार्य जी का दफ्तर, दूसरे में पाँचवीं के छात्र। हमारी चौथी की कक्षा हमेशा खुले में लगती। कभी बरामदे में। कभी पीपल के नीचे। वही पीपल, जिसके नीचे बच्चों के खेल और सुस्ताते हुए बूढ़ों की भीड़। सब साथ-साथ चलते। शायद इसी सम्मिलन ने संवेदना को आकार दिया।

उस दिन मास्साहब ने घोषणा की। कल हनुमत् जयंती पर विद्यालय में भजन प्रतियोगिता होगी। सबको कुछ न कुछ गाना है। बाल मन में उत्साह तो उमगा। पर, बुद्धि चुप थी। क्या गाऊँ? तब वही भोर का सुना गीत याद आया। भक्ति की ध्वनि अब स्वर बन माँग रही थी। अगले दिन बारी आयी। काँपते स्वर में खड़ा हुआ।गाया, ‘पवन सुत विनती बारम्बार…।’ गीत पूरा नहीं याद था। पर, जो कुछ भी था, उसी में श्रद्धा का पूरा समुद्र उमड़ आया।

गाते वक्त यह नहीं लगा कि किसी देवता को पुकार रहा हूँ। सच कहूँ, तो ऐसा लगा जैसे अपने किसी प्रिय जन से बात कर रहा हूँ। जो सब दुख समझ सकता है। पर, माँगने से पहले ही समाधान जानता है। उसी क्षण मन में एक गहरी समीपता अंकुरित हुई। हनुमान जी अब अपने हुए।

इसके बाद हर वर्ष हनुमत् जयंती आने लगी, तो लगता, कोई उत्सव बाहर नहीं भीतर हो रहा हो। मशरक के वह दिन जैसे साक्षात् आनंद का पर्व बन जाता। लाउडस्पीकर पर भक्ति गीतों की शृंखला। मंदिर की भीड़। सड़क किनारे मिठाई की दुकानों से उठती बेसन व बूंदी की सुगंध। सब एक साथ हृदय को भर देते। जब कथा शुरू होती, तो गाँव-गाँव से लोग जुटते। बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ सब आते। पंडाल में मानो श्रद्धा की ‘घोघारी’ बह निकलती।

हम छोटे थे। पर हमें भी जिम्मेदारी मिलती। कथा वाचकों की सेवा। कोई जल लाता। कोई आसनी बिछाता। कोई पंडाल के लाउडस्पीकर सँभालता। उस नन्हेपन में हम सेवा क्या जानते, पर मन भीतर से भावुक होता। जैसे किसी बड़े का आदेश मिल गया हो। और सच कहूँ, तो कथा वाचक जब ‘सुंदरकांड’ का पाठ करते, उनकी वाणी में जो लय थी, वह किसी नामी गवैया के गीतों से अधिक मनहर लगती। लगता, मानस कोई पुस्तक नहीं, जीवन की धारा है।

समर्पण, मूल्य, जीवनबोध के अर्थ से भरी हुई। उत्सव की धूम में समूचा मशरक, श्रद्धा से सराबोर। देश भर से नामी कथा वाचक आते। उनकी वाणी में राम कथा जीवंत। पंडाल में श्रोता समुद्र, वातावरण में अगरबत्ती की सुगंध। ‘अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्…’ का आवाहन। उसी पंडाल, उसी भक्ति-धारा में वहीं Akhilesh Shandilya (अखिलेश मणि शांडिल्य) गुरु जी से परिचय हुआ। वे व्यासपीठ पर बैठते।

ओजस्वी विचार, दर्शन व व्याख्यान की गहनता लिए। पर नेत्रों में करुणा का समुद्र। बाल मन उनके पास खिंचा चला गया। उनकी वाणी में न केवल रामकथा, बल्कि जीवन का सार था, ‘मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्…’ का पाठेय उन्हीं से मिला। मनुष्य बनो…। उसी सान्निध्य ने स्थायी संबंध रचा। गुरु जी का अयाचित स्नेह, दुलार आशीर्वाद मिलता रहा। मशरक से लेकर जीवन के कठिन मोड़ तक। उनकी कथा-धारा ने बालक को दिशा दी, जैसे पवनसुत ने शक्ति।

हनुमत् जयंती के पर्व में ही कन्हैया दास जी भी आते। उनकी सन्निधि बाल मन को एक नई दिशा दे गई। वे सगुण भक्ति के साधक थे। उन्हीं से पहली बार सुना था, ‘चारों दुल्हा में बड़का कमाल सखिया…’ यह लोकगीतों का रसास्वादन था। राम की बरात सजी है। मिथिलानी उन्हें निहार रही हैं। कन्हैया दास जी की वाणी में वह लय थी, जो हृदय को स्पंदित कर देती। बालक मन झूम उठता।

भक्ति अब केवल हनुमान के गीत तक नहीं सीमित रही। वह लोकगीतों की सहजता में विलीन हो गई। उनकी सान्निधि ने सिखाया कि भक्ति का अर्थ बाह्य आडंबर नहीं, भीतरी जागरण। मनुर्भव: का भाव यही तो था। मनुष्यत्व को जागृत करो। भक्ति को जीवन-रस बनाओ।

ये दोनों गुरु (अखिलेश मणि शांडिल्य और कन्हैया दास जी) मशरक के उस पंडाल में हनुमत आराधना की ओर झुकाव का हेतु बने। शांडिल्य गुरु जी का दर्शन, कन्हैया जी का लोकराग, दोनों ने बाल मन को पोषित किया। हनुमान की शक्ति-भक्ति में दास्य भाव आया। गुरुओं से जीवन दर्शन। वहाँ पीपल तले बैठे हम तीनों का सान्निध्य अनुभव करते, जैसे त्रिवेणी संगम।

समय बीता। मशरक पीछे छूट गया। पर, स्मृतियाँ ताजा हैं। ग्रामीण जीवन में भक्ति का यह रूप, लाउडस्पीकर का नाद, पीपल की छाँव, गुरु-सेवा, भारतीय परंपरा का जीवंत चित्र। हनुमान भक्ति का सांस्कृतिक अर्थ यही है। शक्ति का समर्पण। वे नायक हैं, जो बलशाली होते हुए राम के चरणों में लीन। यह दास्य भाव समाज को सिखाता है, विजय व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है। लोकगीतों में ‘बजरंग बली’, कथाओं में ‘अंजनी नंदन’, हर रूप निर्भयता का प्रतीक।

धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि हनुमान केवल वानर नायक नहीं, बल्कि भक्ति के प्रतीक हैं। शक्ति में भी विनम्र हैं। विजय में भी दास्य भाव रखते हैं। वे हमारे अन्दर की उस ऊर्जा का रूप हैं, जो कभी किसी स्वार्थ या भय से बँधी नहीं होती। स्मरण है, जब कभी परीक्षा का भय होता, तो हनुमान चालीसा का एक-दो छंद याद कर लेता। कोई जवाब नहीं सूझता, तो हनुमान जी का नाम लेकर तुक्का मार देता। मन विचित्र रूप से स्थिर हो जाता। अब भी जब कठिनाइयाँ घेरती हैं, तो वही बचपन का गीत स्वयमेव कानों में गूँजता है, ‘हे दुखभंजन मारुति नंदन…’

मशरक अब शायद पहले जैसा नहीं रहा। पीपल भी बूढ़ा हो गया होगा या किसी निर्माण ने उसे ढँक लिया होगा। पर वहाँ की वह भोर, वह सुरीला लाउडस्पीकर, वह बाल स्वर में गाया गया पहला भजन, वे सब अब भी भीतर ज्यों के त्यों टिके हैं। अब यह स्मृति किसी गीत की नहीं, बल्कि उस संवेदना की है, जिसमें भक्ति न तो डर से उपजती है, न स्वार्थ से, बल्कि उस सहज स्नेह से जिसमें एक बालक अपने रक्षक को पुकारता है।

कभी-कभी सोचता हूँ, शायद हमारे भीतर के देवता किसी देवालय में नहीं जन्मते; वे उन क्षणों में जन्मते हैं जब पहली बार कोई बाल मन किसी अदृश्य महानता की ओर खिंचता है। उसी क्षण से जीवन में श्रद्धा का बीजारोपण होता है। हमारे लिए वह क्षण हनुमान जी से भेंट का था। उस दिन मैंने जाना था कि शक्ति केवल प्रकट बल नहीं, बल्कि वह साहस है, जो भय को भीतर आने नहीं देता।

आज वर्षों बाद जब कक्षा में छात्रों को पत्रकारिता या संस्कृति पर कुछ बतता हूँ, तो किसी प्रसंग में स्वतः याद आ जाता है, उस पीपल के नीचे की कक्षा, बरामदे में बैठा बालक और उसकी उस भोर में गाई गई विनती। कितनी बार सोचता हूँ, अगर वह गीत न सुना होता, तो शायद मन में यह ‘भक्ति का अनुभव’ कभी आकार नहीं लेता।

अब लगता है, वह हनुमान जी लोक के ही बीच से आए। माटी की गंध, गीत की ध्वनि और सेवा की भावना से निर्मित। हनुमान जी हमारे लिए मंदिर के नहीं, उन दिनों के देवता हैं, जो भोर में गूँजते लाउडस्पीकर से उतरकर बालक मन में प्रवेश कर गए। फिर वहीं ठहर गए।

अब भी जब कभी थकान घेरती है, जिम्मेदारियाँ बोझ लगने लगती हैं, तो मन उसी मशरक को ढूँढ़ता है, जहाँ कभी लाउडस्पीकर पर गीत बजता था और एक बालक उसे सुनकर श्रद्धा से भर जाता था। वही गीत अब स्मृति दीप बन गया है। हर अँधेरे में टिमटिमाता, यह बताता हुआ कि, भक्ति का अर्थ देवता को पाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के निर्भय को पहचानने में है।

 

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