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जहां देवता मनुष्य में उतरता है

जहां देवता मनुष्य में उतरता है

हनुमान जयंती पर विशेष आलेख

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

जब हम हनुमान जयंती को एक जीवित सांस्कृतिक क्षण की तरह देखते हैं तो यह केवल आस्था का पुनरावर्तन नहीं रह जाता बल्कि स्मृति और वर्तमान के बीच का एक सक्रिय संवाद बन जाता है। यह संवाद किसी एक दिशा में नहीं बहता; इसमें परंपरा भी बोलती है और आधुनिकता भी अपनी असहज उपस्थिति दर्ज कराती है।

हर सामाजिक अनुष्ठान केवल निष्कपट आस्था नहीं होता, उसमें शक्ति-संबंध भी छिपे होते हैं। इस दृष्टि से देखें तो यह उत्सव एक ‘डिस्कोर्स’ भी है—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ यह तय होता है कि “शक्ति” क्या है, “भक्ति” क्या है और समाज किन मूल्यों को मान्यता देता है।

मंदिरों में गूँजती आवाज़ें केवल प्रार्थना नहीं हैं; वे एक सामाजिक अनुशासन भी रचती हैं, जिसमें व्यक्ति अपने को एक बड़े ढाँचे में समाहित करता है। यह समाहित होना एक ओर उसे सुरक्षा देता है तो दूसरी ओर उसकी स्वतंत्रता को भी एक निश्चित सीमा में बाँध देता है। शायद यही वह सूक्ष्म तनाव है जो हर उत्सव के भीतर छिपा रहता है—मुक्ति और बंधन का एक साथ उपस्थित होना।

यह उत्सव अपने भीतर कई परतों में खुलता है। हनुमान, जो एक ओर पूर्ण समर्पण के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर असाधारण स्वायत्त शक्ति के भी धनी हैं। यह द्वैत किसी दोष की तरह नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है।

यहाँ एक दिलचस्प विडंबना उभरती है—समर्पण के माध्यम से ही स्वायत्तता का जन्म होता है। जहाँ स्वतंत्रता को अक्सर व्यक्तिगत स्वायत्तता के रूप में देखा जाता है, वहीं यहाँ समर्पण ही शक्ति का स्रोत बन जाता है। यह उलटाव इस उत्सव को केवल धार्मिक घटना नहीं रहने देता बल्कि एक दार्शनिक अनुभव बना देता है।

इस पूरे आयोजन में एक अद्भुत दृश्यात्मकता है—लाल चोलों की आभा, धूप और घी की मिली-जुली गंध और भक्ति में डूबे हुए चेहरे पर इस दृश्य के भीतर भी एक गहरा एकांत छिपा रहता है। हर व्यक्ति, भीड़ के बीच खड़ा होकर भी, अपने भीतर के किसी अदृश्य संवाद में लगा होता है।

यही वह क्षण है, जहाँ हनुमान केवल एक पौराणिक पात्र नहीं रहते, बल्कि एक आंतरिक उपस्थिति बन जाते हैं—एक ऐसी शक्ति जो बाहर से नहीं, भीतर से संचालित होती है। शायद यही इस उत्सव की सबसे गहरी परत है—यह हमें बाहर के देवता से अधिक भीतर के मनुष्य से मिलाता है।

मनुष्य अपने अर्थ स्वयं रचता है। इस अर्थ में, हनुमान जयंती एक ऐसा अवसर है, जहाँ मनुष्य अपनी ही रची हुई आकृति के सामने खड़ा होता है और उसमें अपने प्रतिबिंब को पहचानने की कोशिश करता है।

यह उत्सव किसी स्थिर सत्य की घोषणा नहीं करता बल्कि एक निरंतर प्रश्न की तरह उपस्थित रहता है—क्या शक्ति केवल बाहरी है या वह भीतर भी उतनी ही गहरी है? क्या भक्ति केवल समर्पण है या वह आत्म-खोज का एक तरीका भी है?

शायद उत्तर कहीं बीच में है या शायद उत्तर होना ही जरूरी नहीं क्योंकि कुछ अनुभव उत्तरों से नहीं, उनकी अनुपस्थिति से अर्थ पाते हैं।

इसी अनुपस्थिति में, यह उत्सव एक ऐसी जगह बन जाता है, जहाँ मनुष्य थोड़ी देर के लिए अपने सभी निश्चित अर्थों से मुक्त हो सकता है। वह न पूरी तरह भक्त रहता है, न पूरी तरह दार्शनिक—वह बस एक अनुभव बन जाता है, एक प्रवाह, जिसमें विचार और भावना एक-दूसरे में घुलते रहते हैं।

शायद यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि यह उत्सव “क्या है ”। अधिक सटीक यह होगा कि यह “क्या करता है।” यह मनुष्य को उसकी सीमाओं से टकराने के लिए उकसाता है और साथ ही यह भरोसा भी देता है कि उन सीमाओं के पार कुछ है—कुछ ऐसा, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता पर जिसे महसूस किया जा सकता है।

जब यह महसूस होने लगता है, तब उत्सव समाप्त नहीं होता—वह भीतर कहीं स्थिर हो जाता है, एक धीमी पर लगातार चलती हुई लय की तरह… जैसे कोई अदृश्य नृत्य, जिसे कोई देख नहीं रहा पर जो फिर भी हो रहा है।
अब यह पढ़ने लायक है।

मनुष्य ने जब अपनी सीमाओं को पहली बार पहचाना होगा तभी उसने देवताओं की रचना की होगी—और उन देवताओं में सबसे अधिक मानवीय आकृति शायद वही है, जिसे हम हनुमान के रूप में जानते हैं। हनुमान जयंती केवल एक धार्मिक तिथि नहीं बल्कि उस आकांक्षा का उत्सव है, जिसमें मनुष्य अपनी दुर्बलता को शक्ति में, अपने भय को निर्भीकता में और अपने संदेह को अटूट विश्वास में बदलना चाहता है।

यह उत्सव केवल श्रद्धा का मामला नहीं रह जाता; यह एक सांस्कृतिक-पाठ (cultural text) बन जाता है। जैसे कोई कविता केवल शब्दों का समूह नहीं होती, वैसे ही यह जयंती केवल पूजा का आयोजन नहीं बल्कि अर्थों की बहुस्तरीय संरचना है।

हनुमान एक ऐसे संकेत (signifier) हैं, जिनका अर्थ स्थिर नहीं बल्कि प्रसंग के अनुसार बदलता रहता है। वे ‘सेवक’ हैं, ‘वीर’ , ‘ब्रह्मचारी’ और ‘भक्त’ भी। इस बहुआयामी संरचना में उनका चरित्र किसी एक अर्थ में सीमित नहीं होता। जैसे फर्डिनांड द सॉस्यूर ने संकेत और अर्थ के संबंध को मनमाना बताया था, वैसे ही हनुमान का अर्थ भी समाज और समय के साथ निरंतर पुनर्निर्मित होता रहता है।

हनुमान जयंती केवल जन्म का उत्सव नहीं बल्कि अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया का उत्सव है—जहाँ हर भक्त अपने अनुभव के अनुसार हनुमान को नया अर्थ देता है। कोई उन्हें शक्ति का प्रतीक मानता है, कोई भक्ति का, कोई अनुशासन का और कोई प्रतिरोध का।

मनुष्य का अवचेतन इच्छाओं और दमन का खेल है। इस दृष्टि से हनुमान एक ऐसे आदर्श-स्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो इच्छाओं के अराजक प्रवाह को नियंत्रित कर लेता है। उनकी ब्रह्मचर्य की छवि, उनकी अटूट निष्ठा—ये सब उस ‘संयमित पुरुष’ की आकृति हैं, जिसे समाज अपने भीतर देखना चाहता है, पर बन नहीं पाता।

यहाँ हनुमान एक मनोवैज्ञानिक राहत भी बन जाते हैं—एक ऐसा पात्र, जिसमें मनुष्य अपनी दबी हुई आकांक्षाओं को सुरक्षित रूप से प्रक्षेपित कर सकता है। वह खुद तो सीमित है पर अपने देवता को असीम मानकर अपने भीतर एक संतुलन स्थापित करता है।

हनुमान—विशेष रूप से ‘नायक’ और ‘सेवक’ के मिश्रित रूप हैं। वे केवल युद्ध करने वाले नायक नहीं हैं बल्कि सेवा करने वाले नायक भी हैं। यह संयोजन पश्चिमी मिथकों में कम दिखाई देता है, जहाँ नायक अक्सर अपनी महिमा के लिए लड़ता है। हनुमान की शक्ति उनकी विनम्रता में है और यही उन्हें एक विशिष्ट आर्केटाइप बनाता है।

उत्तर-आधुनिक दृष्टि से, जहाँ हर ‘महान कथा’ पर संदेह किया जाता है, वहाँ हनुमान जयंती भी एक प्रश्न के घेरे में आती है। क्या यह उत्सव केवल परंपरा का पालन है या इसके भीतर कोई जीवित अर्थ भी बचा है?

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि यह उत्सव अपने भीतर विरोधाभास भी समेटे हुए है। एक ओर, यह पूर्ण समर्पण की बात करता है—राम के प्रति हनुमान की भक्ति। दूसरी ओर, यह व्यक्तिगत शक्ति और स्वायत्तता का भी उत्सव है—वह शक्ति जो समुद्र लाँघ सकती है, पर्वत उठा सकती है और असंभव को संभव बना सकती है। इस विरोधाभास में ही इसकी जीवंतता है। हनुमान जी से जुड़ा हर पाठ अपने भीतर अंतर्विरोध लिए होता है और वही उसे अर्थपूर्ण बनाता है।

हनुमान जयंती एक ऐसा दिन है जब मनुष्य अपनी सीमाओं को थोड़ी देर के लिए भूलकर अपने भीतर की संभावनाओं को छूने की कोशिश करता है। मंदिरों में गूँजते हुए मंत्र, लाल रंग की आभा और भक्तों की आँखों में चमक—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जहाँ आस्था केवल विश्वास नहीं, अनुभव बन जाती है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह उत्सव हमें ‘शक्ति’ की एक अलग परिभाषा देता है। यहाँ शक्ति केवल प्रभुत्व नहीं है बल्कि समर्पण भी है। यह विचार पश्चिमी शक्ति-चिंतन से थोड़ा अलग है, जहाँ शक्ति अक्सर नियंत्रण और वर्चस्व से जुड़ी होती है। हनुमान के यहाँ शक्ति सेवा में है और सेवा में ही उनकी महिमा है।

हनुमान जयंती केवल अतीत का उत्सव नहीं, वर्तमान की आवश्यकता भी है। एक ऐसा समय, जहाँ मनुष्य अपनी ही बनाई हुई जटिलताओं में उलझा हुआ है, वहाँ हनुमान की छवि एक सरल पर गहरी याद दिलाती है—कि शक्ति और विनम्रता विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

यह उत्सव किसी देवता के जन्म का नहीं बल्कि उस संभावना का उत्सव है जो हर मनुष्य के भीतर छिपी है। वह संभावना जो हमें हमारे भय से मुक्त कर सकती है, हमारे संदेह को शांत कर सकती है और हमें यह एहसास दिला सकती है कि हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक हो सकते हैं।

शायद इसीलिए, हर साल यह जयंती लौटती है—जैसे कोई धीमी पर लगातार चलती हुई स्मृति जो हमें बार-बार यह बताती है कि हमारे भीतर भी एक नृत्य चल रहा है—शक्ति और समर्पण का, साहस और विनम्रता का। और अगर हम उस नृत्य को पहचान लें तो फिर किसी उत्सव की ज़रूरत भी नहीं रह जाती… क्योंकि तब पूरा जीवन ही एक उत्सव बन जाता है।

आभार-परिचय दास

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