भविष्य की राजनीति बयां करता चुनाव नतीजा
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पांच राज्यों में से तीन पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी भाजपा के साथ, केरल में वैकल्पिक चुनाव के तहत कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति से परे पूर्ण बदलाव कर सत्ता दो साल पहले राजनीति में आए एक सिने स्टार के हाथ। सोमवार को आया यह नतीजा राज्यों की सीमा से परे वोटरों की अपेक्षाओं- आकांक्षाओं और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति को खुल कर बयां करता है।
यह स्पष्ट करता है कि किसी भी चुनाव के लिए विकास और सुशासन से ज्यादा प्रासंगिक कोई मुद्दा नहीं, चेहरे की विश्वसनीयता से ज्यादा बड़ी कोई गारंटी नहीं, और अगर कहीं इन दोनों विकल्प की कमी हो तो फिर ऐसे चेहरे के हाथ अपनी किस्मत से देने से परहेज नहीं जिसके पास प्रशासनिक अनुभव की कमी हो लेकिन पीठ पर भ्रष्टाचार की गठरी नहीं हो।
पांच राज्यों के इस नतीजे ने आगामी विधानसभाओं और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए भी विमर्श सेट कर दिया है। सोमवार को वोटों की गिनती शुरू होने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पोस्ट किया और कहा- ”कौशल, परिश्रम और करुणा हमारे जीवन की अद्भुत शक्तियां हैं। इनके माध्यम से हम केवल हर चुनौती को ही पार नहीं सकते हैं, बल्कि ये हमारे लक्ष्यों की प्राप्ति में भी मददगार हैं।”
बंगाल का भाजपा के जीवन में खास महत्व
पश्चिम बंगाल के नतीजों पर पहले नजर डालें तो यह सौ फीसद सही साबित होता है। पीएम मोदी के अथक परिश्रम, केंद्रीय गृहमंत्री शाह के ठोस चुनावी प्रबंधन ने ऐसा माहौल तैयार किया जिसमें बंगाल की जीत सिर्फ चुनावी न रहकर वैचारिक जीत के दावे को पूरा कर दिया। बंगाल का भाजपा के जीवन में खास महत्व है। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मु्खर्जी बंगाल से थे और उन्होंने अनुच्छेद 370 के खात्मे के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था।
राष्ट्रवाद और भारत माता भाजपा के हर नारों में होते हैं और वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र बंगाल से थे। अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने सभी स्कूलों और विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि अब से बंकिम चंद्र के लिखे समग्र वंदे मातरम का गायन किया जाए।
उस बंगाल ने भाजपा को प्रचंड जीत देकर एक तरह से उस विचारधारा को खुले बाहों से स्वीकार कर लिया जो भाजपा के लिए प्रिय था और विरोधी दल जिसे बंटवारे के नजरिए से देखते थे। इसीलिए मोदी और शाह बार-बार अंग, बंग और कलिंग की बात करते थे।
भाजपा अगर राज्य में कार्य संस्कृति में बदलाव

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो जिस तरह 2024 के चुनाव में ओडिशा भाजपा के लिए एक नई जमीन के रूप में उभरा था, उसी तरह पश्चिम बंगाल 2029 के चुनाव में भूमिका निभा सकता है। ध्यान रहे कि लोकसभा सीटों की संख्या के मामले में पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बात सबसे बड़ा राज्य है।
अगले तीन वर्षों में भाजपा अगर राज्य में कार्य संस्कृति में बदलाव लाने में सफल रही और विकास का अनुभव लोगों तक पहुंचा तो लोकसभा चुनाव में यह राज्य अहम भूमिका निभाएगा।
न सिर्फ इतना बल्कि आगामी उत्तर प्रदेश समेत दूसरे चुनावों में कार्यकर्ताओं में नया जोश भर सकता है। ओडिशा में बीजद को हराने के बाद लगातार दूसरी बार भाजपा ने एक मजबूत क्षेत्रीय दल को हराया है। इससे पहले दिल्ली में उस आम आदमी पार्टी को पटखनी दे चुकी जिसके उदय ने सबको चौंकाया था।
असम में तीसरी बार बीजेपी सरकार
असम के नतीजे तो आश्चर्यजनक हैं। कुल 126 सीटों वाले विधानसभा में 23 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 60 फीसद से ज्यादा है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कहते रहे हैं कि वहां भाजपा वस्तुत: 103 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। ऐसे में सौ के पार जाना विस्मयकारी है और कांग्रेस के लिए चिंता का विषय। कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद के दावेदार और लोकसभा में उपनेता गौरव गोगोई भी 22 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए। तो फिर नाव कौन चलाए।
केरल में दस साल के बाद वापसी जरूर कांग्रेस को थोड़ा संबल देगा लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि वहां तमिलनाडु की तरह कोई तीसरा विकल्प नहीं था। केरल में भी वाम राजनीति के अंत की शुरूआत और भाजपा के भविष्य की शुरूआत पक्की हो गई तो कोई नहीं जानता कि अगले दस साल में वहां भी कांग्रेस को भाजपा से ही सामना करना पड़े।
वैसे भी पार्टी तिरुअनंतपुरम में अपना मेयर बना चुकी है और गुजरात इसका उदाहरण है कि स्थानीय निकाय चुनाव की जीत भाजपा के लिए नींव की तरह काम करती है। तमिलनाडु जेन जी चुनाव का एक उदाहरण है। 1967 से वहां जिस द्रविड़ राजनीति की शुरूआत हुई और द्रमुक व अन्नाद्रमुक के रूप मे बारी बारी से सत्ता बांटते रहे उस परंपरा को सिने स्टार विजय की लोकप्रियता ने रोक दिया।
वस्तुत: राज्य की जनता दोनों दलों की घिसी पिटी द्रविड़ राजनीति से त्रस्त हो चुकी थी जिसमें सनातन को गाली देना एक फैशन। इन दलों को खुद को प्रासंगिक बनाना होगा। विजय बहुमत के मैजिक अंक से थोड़े पीछे हैं जो दूसरों के समर्थन से हासिल करना मुश्किल नहीं है। लेकिन अगर वह कांग्रेस से भी दूर रहे तो विजय भी भविष्य में एक ऐसे घटक के रूप में दिख सकते हैं जो किसी खेमे में न रहते हुए भी मुद्दों पर आधारिक फैसला ले।
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