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दलपीठी का लोक और उसकी रसोई

दलपीठी का लोक और उसकी रसोई

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

गँवई साँझ कुछ और ही रंग में रंगी होती है। धूप ढलकर जब चौखटों से उतरती है। आँगन में धुएँ की हलकी लकीरें उठती हैं। उसी में घुला रहता है किसी पकवान की महक। कभी लहसुन के छौंक की, कभी पंचफोरना की, कभी सोंधी दाल की। कभी गेहूँ के आटे की भीनी गंध की। आज जब मोबाइल स्क्रीन पर छोटी बहन शालू का मैसेज चमका, साथ में गरमागरम दलपीठी की तस्वीर, तो लगा जैसे गाँव का आँगन मेरे कमरे में उतर आया हो। भीतर कुछ पिघला। स्मृतियों का मसान भी जैसे दाल की गंध में जीवंत हो उठा।

दलपीठी, नाम भर नहीं, एक गंध, एक राग, एक अनुभूति है। यह भोज्य पदार्थ कम, स्मृति का छूआ हुआ अध्याय अधिक है। जिस तरह किसी पुराने गीत की धुन सुनते ही कुछ बिसरा हुआ बीता लौट आता है, उसी तरह ‘दाल पिठी बन गइल बा’ सुनते ही अपनापन किसी गदगद तान की तरह मन में उतर आता है।

वैसी भी हमारे भोजपुरांचल की यह सृजनशील भूमि केवल गीत और गाथाओं की ही नहीं, रसना-संवेदना की भी भूमि रही है। यहाँ का हर पकवान केवल पेट की तृप्ति के लिए नहीं, बल्कि भावनाओं की भाषा है। दलपीठी उसी भाषा का एक मार्मिक वाक्य है। इसे बनाने का भी एक साधना है। पहले अरहर की दाल को धुलने-भरकाने की रस्म, फिर उसे पीतल की बटुली में रखकर धीमी आँच पर पकाने की साधना। उसके बाद आटे की छोटी-छोटी लोइयाँ बनती हैं, जिनका आकार बनानेवाली गृहिणी की कल्पना पर निर्भर है। कोई गोल, कोई नुकीली, कोई ‘चेउंआ’ जैसी, तो कोई बस मुट्ठी भर उठाई हुई लयात्मक संरचना।

पहले यह सब किसी कुकर की संगति में नहीं होता था। पीतल की बटुली, नीचे संठी आ लवना की आँच और ऊपर से दाल के अदहन की सोन्हाई भाप में मिल जाती थी। वह जो धुएँ की हल्की परत पकवान के साथ शामिल होती, वही शायद ‘घर के स्वाद’ का दूसरा नाम थी।

बहरहाल आज के पोषण विज्ञान की भाषा में देखें, तो दलपीठी लो कार्ब, हाई प्रोटीन और लो कोलेस्ट्रॉल डाइट है। पर भोजपुरी समाज ने इसे बनाने के समय कभी इन शब्दों में नहीं बाँधा। उनके लिए भोजन विज्ञान से पहले सौंदर्य था, स्वाद था, अपनापन था।
दलपीठी केवल शरीर की भूख नहीं मिटाती; यह मन की स्मृति को भी तृप्त करती है। जिस अरहर की गाढ़ी दाल में वही आटे की लोई मिलती है, वही तो हमारे जीवन की सरलता और संतुलन का प्रतीक है। गाँव की रसोई में यह व्यंजन स्त्री-शक्ति की सृजनात्मकता का एक स्वर भी है। सीमित साधन। पर अनंत कल्पना।

जब यह पक जाती है और ऊपर से देसी घी का हींग-जीरे का तड़का गिरता है, तो मानो एक संगीत फूट पड़ता है। लाल मिर्च की फुहार जैसे किसी तबले की थाप हो, और हरी मिर्च उस पर चाँद सा झिलमिल सुर।

भोजपुरी अंचल का उल्लेख आते ही लोग लिट्टी-चोखा का नाम लेते हैं, जैसे यही इसका परचम हो। पर सच्चाई यह है कि यह भूभाग स्वादों की एक महागाथा है। लिट्टी-चोखा तो बस उसका एक अध्याय है। यहाँ पुआ-पकवान की मिठास है। ठेकुआ की श्रद्धा है। चूड़ा-मटर की सहजता है, चने की घाटी और कढ़ी-बेसन की खटास है। रिकवच है। हर मौसम के हिसाब से भोजन की एक नयी संरचना मिलती है।

सावन का महीना आए तो बेरहिन-पूड़ी, रसियाव, कुआर में धान की कटाई के समय पीठा-पकवान; और जब ठंड उतरती है, तो चूल्हे पर अटक कर रहनेवाली दलपीठी। हर व्यंजन के पीछे एक सामाजिक कथा है। दलपीठी की कथा संयुक्त परिवारों की रसोई से शुरू होती है, जहाँ एक पकवान सबके हिस्से में बराबर उतरता है। कोई हिस्सा बड़ा, कोई छोटा नहीं। यही तो भोजपुरी संस्कृति का मूल मूल्य भी है। सब मिलके, सब संग।

कहा जाता है कि भोजन हमारे समय और समाज की याद का एक सबसे गाढ़ा दस्तावेज़ है। जब-जब दलपीठी की गंध आती है, तब-तब बचपन लौट आता है। मामी का वह झुककर कुकर की सीटी गिनना। नानी का तवे पर मिर्च भूनते हुए कहना, ‘अब डालऽ घी, आ तड़का दे दऽ…’ गाँव के घरों में भोजन केवल भूख शांत करने का उपाय नहीं रहा; वह संवाद का औचित्य था। खाना बनाना भी एक सामूहिक आयोजन होता था। दलपीठी की थाली तैयार होने तक बातें भी पक जाती थीं। खेत की, फसल की, त्योहार की।

शहर में आज रसोई गैस और माइक्रोवेव ने भोजन को महज ‘डिश’ बना दिया है। पर गाँव के लिए हर व्यंजन एक कथा होता है। इसमें श्रम, समय और स्नेह तीनों मिलकर स्वाद का प्राण रचते हैं। दलपीठी इसलिए केवल पकवान नहीं, भाव-संस्मरण है। असल में यह एक ऐसा व्यंजन, जो भूख से अधिक अपनापन तृप्त करता है।

भोजपुरी अंचल की खान-पकवान परंपरा लोकजीवन की तरह ही बहुरंगी और मिलनसार है। यह क्षेत्र अनेक नदियों की तरह अनेक रसोइयों से सिंचित है। कहीं मसालेदार, कहीं मृदुल, कहीं खट्टा-मीठा।

रसोई यहाँ केवल पेट नहीं पालती, यह पीढ़ियाँ पालती है। माँ के हाथ की दाल पिठी जिसने खाई है, वह जानता है कि स्वाद केवल जीभ पर नहीं रहता, यह भीतर के किसी कोमल कोने में बस जाता है। शायद इसीलिए प्रवासी भोजपुरी हृदय को सबसे पहले याद आती है, यही सोंधी गंध। दिल्ली या मुंबई की भागमभाग में भी अपनी घर की याद दिला जाती है।

गँवई जीवन की गंध मिट्टी की महक से अलग नहीं। यही गंध दलपीठी में भी है। इस व्यंजन की देह में घुला हुआ है गाँव का जीवंत संगीत, उसकी सरलता और मनुष्य की आत्मीयता। आज जब हम शहरों में ‘डाइट चार्ट’ और ‘कैलोरी काउण्ट’ गिनते हैं, तब दलपीठी का स्वाद यह याद दिलाता है कि भोजन केवल गणना नहीं, संवेदना भी है।

जिस दिन गाँव लौटना होगा, मैं सोचता हूँ, भर कुकुर दाल पिठी माँ से जरूर बनवाऊँगा। तब कुकर की सीटी नहीं गिनूँगा, बल्कि उन यादों की सांसें गिनूँगा, जो हर उबलती भाप के साथ ऊपर उठेंगी, बचपन की महक बनकर। और तब समझूँगा, मनुष्य जब अपने भोजन से जुड़ा रहता है। तभी वह अपनी मिट्टी से भी जुड़ा रहता है।

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