बंगाल में भाजपा ने कैसे 53 सीटों पर लगाई सेंध?

बंगाल में मुस्लिम वोट का गणित बदले ही पूरा समीकरण बदल गया। चुनाव के परिणाम आने के बाद स्थिति यह है कि, ममता बनर्जी खुद की सीट नहीं बचा पाई। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी हो जाता है कि, आखिर खेल हुआ कहां। इसमें सबसे पहला कारण SIR है।
चुनाव आयोग ने कुल 91 लाख लोगों के नाम को वोटर लिस्ट से हटाने का काम किया था। इन 91 लाख नामों में से 63% (लगभग 57.47 लाख) हिंदू थे और 34% (लगभग 31.1 लाख) मुस्लिम थे। आबादी के अनुपात में इतने मुस्लिम वोट कटना अपेक्षाकृत ज्यादा अहम रहा। इस बदलाव ने कई क्षेत्रों में मुस्लिम-निर्णायक कारक कमजोर किया, जिससे भाजपा को लाभ मिला।
इसके कारण भाजपा ने मुस्लिम प्रभाव वाले जिलों में बढ़त बनाई। इसमें मालदा, मुर्शिदाबाद और 24 परगना जैसे जिलों की 118 सीटों में से भाजपा 53 पर जीती। इन क्षेत्रों में 2021 में भाजपा की 14 सीटें थीं। टीएमसी के अजेय 119 पुराने किलों में से 69 सीटें भाजपा को यहीं से मिली।
मैन-टू-मैन मार्किंग ने किया कमाल
इसके साथ ही मैन-टू-मैन मार्किंग की नीति ने भी कमाल किया। अमित शाह ने चाणक्य नीति के तहत पन्ना प्रमुख बनाए। पीएम मोदी सभाओं में ममता का नाम लेने से बचे। भाजपा ने 44,000 से अधिक मतदान केंद्रों को मजबूत, केंद्रित व कमजोर श्रेणियों में बांटा। केंद्रित बूथ वे थे जहां तृणमूल और भाजपा में कांटे की टक्कर थी। यहां मैन-टू-मैन मार्किंग की। इस नीति के कारण भाजपा को 2021 से 62.5 लाख वोट ज्यादा मिले, जबकि टीएमसी के 30 लाख वोट घटे।
ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के 7.5% वोट बढ़ गए
TMC के लिए लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं गेम चेंजर थीं। इसमें 1000-1200 रुपये दिए जाते थे। इसकी जगह भाजपा ने 3 हजार का वादा किया। दीदी बेरोजगार भत्ते के तौर पर 1500 रुपये देती थीं, भाजपा ने हर महीने 3 हजार रुपये देने का वादा किया। इसके साथ ही एक करोड़ जॉब भी देने का वादा किया।
इसके कारण 2026 में भाजपा को 47.6% और टीएमसी 40.2% वोट मिले। 2021 में टीएमसी को 48.2%, भाजपा को 40.1% वोट मिले थे। 5 साल में भाजपा को गांवों से 7.5% वोट मिले और टीएमसी के 8% वोट घटे। इसके साथ ही भाजपा ने शहरी वोट बैंक में 7.3% सेंध लगाई।
महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर लोगों का साथ मिला
भाजपा का 7वां वेतन आयोग लागू करने का वादा भी बहुत काम आया। दरअसल, राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय दरों पर डीए न देने से कर्मचारी खफा थे। भाजपा ने इसे सम्मान से जोड़ दिया। इसके साथ ही नए भर्तियां नहीं होने पर युवाओं में जबरदस्त गुस्सा था। 15 साल की एंटी इन्कंबेंसी ममता को भारी पड़ गई। भाजपा ने इसे सही तरीके से भुना लिया।
संदेशखाली में महिलाओं से उत्पीड़न और भूमि हड़पने की घटनाओं ने गांवों में तृणमूल की छवि खराब की थी। आरजी कर पीड़िता की मां भाजपा के टिकट पर 28,836 वोट से जीतीं। भाजपा के इस कदम से शहरी महिलाओं का आक्रोश पार्टी के पक्ष में गया।
साल 2011 में राज्य में करीब 530 शाखाएं थीं, जो 2500 से ज्यादा हो चुकी हैं। पिछले साल में 583 नई शाखाएं खुलीं। चुनाव से पहले संघ ने पर्दे के पीछे रहकर एक लाख से ज्यादा छोटी बैठकों के जरिए परिवर्तन का नैरेटिव सेट कर दिया।
पीड़ितों का सुरक्षा ‘कवच’
2021 की हिंसा के बाद संघ सुरक्षा कवच की भूमिका में आया। पीड़ितों के घर जाकर आर्थिक और कानूनी मदद दी। शीर्ष नेतृत्व से संवाद कराया। संदेश गया कि संगठन साथ है।
संदेशखाली की आवाज
संघ में संदेशखाली जैसे इलाकों में सीधे टकराव के बजाय भरोसे की रणनीति अपनाई। महिलाओं व पीड़ितों से संवाद के जरिए उन्हें बात उठाने को प्रेरित किया। बड़ी संख्या में लोग सामने आए।
बाहरी नैरेटिव खत्म: सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर काम किया। स्थानीय त्योहारों, विवेकानंद और सुभाष चंद्र बोस जैसे
महापुरुषों और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए भाजपा को स्थानीय विकल्प के रूप में पेश किया।
डर तोड़ने का अभियान
गांव-मोहल्ले तक पहुंच वोटर्स वर्कर्स में भरोसा बनाया कि निडर हो वोट दें। लोगों को बूथ तक लाने की तैयारी की। हर क्षेत्र – बूथ की जमीनी स्थिति भाजपा तक पहुंचाई।
मुद्दों की लड़ाई
शिक्षक भर्ती घोटाला, आरजीकर व अन्य मामलों को परिवार और महिलाओं की सुरक्षा व भविष्य से जोड़ा। मुद्दे गांव और शहरी मध्यमवर्ग तक पहुंचाए । असंतोष को वोट में बदलने का माहौल बना।
