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कैसी रही पश्चिम बंगाल की राजनीतिक यात्रा?

कैसी रही पश्चिम बंगाल की राजनीतिक यात्रा?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पश्चिम बंगाल की राजनीति भारत की बदलती राजनीतिक दिशा का जीता-जागता उदहारण है। ब्रिटिश काल में बंगाल विभाजन के विरोध और स्वदेशी आंदोलन से शुरू हुई यह यात्रा राष्ट्रवादी चेतना का प्रमुख केंद्र बनी। आजादी के बाद कांग्रेस ने विकास की नींव रखी, फिर लेफ्ट फ्रंट के लंबे शासन ने स्थिरता और लेफ्ट विचारधारा को मजबूत किया।

साल 2011 में ममता बनर्जी के ‘परिवर्तन’ आंदोलन ने नई राजनीतिक दिशा दी। हाल के वर्षों में भाजपा के उभार ने राजनीति को और प्रतिस्पर्धी बना दिया है। वर्त्तमान समय की बात करें तो प्रमुख मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। बंगाल आज भी विचारधारा, जनआंदोलनों और राजनीतिक जागृति का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। आइये नजर डालते हैं बंगाल के पूरे राजनीतिक सफर पर और जानते हैं कैसे एक राज्य भारत की राजनीति का केंद्र बन गया?

आजादी से पहले का बंगाल

ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1905 में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया गया। बंगाल विभाजन के पीछे भारतीयों की हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने की साजिश थी। अंग्रेजों ने मुस्लिम-बहुल पूर्वी हिस्से को असम के साथ मिलाकर अलग प्रांत बना दिया। वहीं दूसरी तरफ हिंदू-बहुल पश्चिमी हिस्से को बिहार और उड़ीसा के साथ मिलाकर पश्चिम बंगाल नाम का अलग प्रान्त बना दिया।

इसके पीछे अंग्रेजों का मकसद यह था कि दोनों प्रांतों में दो अलग-अलग धर्मों के बहुसंख्यक हों। इस विभाजन के खिलाफ देशभर में आंदोलन हुए। उस दौरान सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और सुभास चन्द्र बोस जैसे नेताओं ने बंगाल को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बनाया। स्वदेशी आंदोलन ने आजादी की लड़ाई में नई ऊर्जा डाल दी। हालांकि, मात्र छह साल बाद इसे फिर से पहले की तरह एक कर दिया गया। 1911 में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा बंगाल को दोबारा एक किया गया।

आजादी के बाद कांग्रेस युग

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता कांग्रेस के हाथ में रही। साल 1947 से 1977 तक कांग्रेस ने सत्ता संभाली। राज्य के पहले मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र घोष थे। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 से 14 अगस्त 1948 तक इस पद को संभाला था।

हालांकि, 1950 में संविधान लागू होने के बाद डॉ. बिधान चंद्र रॉय को राज्य का पहला औपचारिक मुख्यमंत्री माना जाता है। बिधान चंद्र ने ही कोलकाता और राज्य के आधुनिक विकास की नींव रखी। इन्ही की जयंती पर देशभर में 1 जुलाई को ‘डॉक्टर्स डे’ भी मनाया जाता है।

बंगाल में लेफ्ट की सरकार

पश्चिम बंगाल की राजनीति में फिर लेफ्ट फ्रंट का दौर आया। साल 1977 से 2011 तक ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक वाम सरकार ने 34 साल तक पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी लेफ्ट फ्रंट के नेता ज्योति बसु के नाम दर्ज है। उन्होंने 1977 से 2000 तक लगभग 23 साल तक सत्ता संभाली। राजनीति में इतने लंबे समय तक टिके रहना कोई आसान काम नहीं है।

साल 1977 में मुख्यमंत्री बनने के समय राज्य की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर रही थी। वामपंथी विचारधारा के साथ उन्होंने सरकार चलाई और धीरे-धीरे अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि विपक्ष उनके सामने टिक नहीं पाया। उनकी राजनीति में दिखावा कम, काम और फैसलों का असर ज्यादा था। इसी वजह से जनता ने उन्हें बार-बार विश्वास दिया।

ममता बनर्जी और परिवर्तन की राजनीति

साल 2011 में ममता के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 34 साल पुराने लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। इसी के साथ बंगाल में ममता युग की शुरुआत हुई। ममता बनर्जी को बंगाल की सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में गिना जाता है। बंगाल की राजनीति में ममता के दौर को परिवर्तन का दौर कहा जाता है।

बंगाल में भाजपा का उदय

पश्चिम बंगाल में साल 2016 के बाद नया मुकाबला देखने को मिला। भाजपा का उदय मुख्य रूप 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तेजी से हुआ है। 2016 में मात्र 3 सीटों (3% वोट) जीतने वाली भाजपा ने 2021 विधानसभा चुनावों में 77 सीटें (38% से अधिक वोट) जीतकर खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित किया। इसी चुनाव में मुख्यमंत्री ममता खुद अपनी विधानसभा सीट भवानीपुर हार गई थी। बाद में नंदीग्राम उपचुनाव जीतकर ममता ने अपना मुख्यमंत्री पद बनाए रखा था।

2026 में बंगाल का रण

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार को पहले चरण का मतदान होना है। चुनाव से पहले सभी सियासी पार्टियां पूरी जोर आजमाइश कर चुकी हैं। इस बार ममता बनर्जी के 14 साल से अधिक के शासन को भाजपा की सीधी चुनौती मिल रही है। अब देखना होगा कि 4 मई को नतीजे आने के बाद बंगाल का ताज आखिर किसके सिर सजेगा?

 

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