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दीपक जलाओ साथी-साथ रहे हम जन्म जन्म

दीपक जलाओ साथी-साथ रहे हम जन्म जन्म 

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क 

पूर्वी चंपारण के वर्तमान हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करते हैं तो कई लोगों की सक्रियता नजर आती है। प्रसाद रत्नेश्वर चंपारण महोत्सव या अन्य समारोहों के जरिये साहित्य और रंगमंच को गांवों तक लेकर गये और समाज को इससे जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। प्रोफेसर अरुण कुमार दमदार मंच संचालन और साहित्य जगत के लिए अपनी बेबाक टिप्पणियों के माध्यम से साहित्य, संगीत और कला जगत के लिए गंभीर अध्ययन का भाव जगाने का काम करते रहते हैं। गुलरेज शहजाद बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार और सूक्ष्मदर्शी सोच के रंगकर्मी हैं ।

इन्हें सफल आयोजक के रूप में जाना जाता है। डा. विनय कुमार सिंह गंभीर अध्येता और संतुलित समीक्षक के रूप में अपनी भूमिका से साहित्य जगत को प्रभावित कर रहे है। डा. हरीन्द्र हिमकर गांव समाज के विषयों और शब्दों के सार्थक संयोजन द्वारा
हिन्दी कविता को विशेष गति प्रदान कर रहे हैं। मिथिलेश घायल अपने प्रगतिवादी सोच को शेरों और ग़ज़लों के माध्यम से जनसमुदाय को विशेष रूप से आकृष्ट कर रहे हैं। कमलेश कुमार साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व को शब्दसूत्र में पिरोकर नयी पीढ़ी को अवगत करा रहे हैं। डा. पवन कुमार अपने सार्थक लेखन से चंपारण की ग़ज़ल को समृद्ध कर रहे हैं।

यहां हम मधुबाला सिन्हा द्वारा विरचित ‘दहलीज ‘ हिन्दी काव्य पुस्तक पर एक सरसरी निगाह डाल रहे हैं। मधुबाला की कविताएं स्त्री की मनःस्थिति की परिचायक हैं। ‘दहलीज ‘ गुफ्तगू पब्लिकेशन प्रयागराज से 2022 में प्रकाशित एक सौ सताइश पृष्ठों का काव्य संग्रह है। मधुबाला दो शब्द में लिखतीं हैं -” दहलीज में रचे गये गीत मेरी शुरुआत के हैं ।” प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति अपने यौवन काल में कविता लेखन के क्षेत्र में कदम रखता है तो उसकी शुरुआत प्रेम कविताओं से करता है। इस उम्र में प्रेम ज्यादा समीप होता है। बतौर मधुबाला,” प्रेम का दीपक जलाओ साथी
साथ रहे हम जन्म जन्म ।”


इस काव्य संग्रह में प्रेम को प्रधानता दी गई है। कुछ शीर्षकों को देखकर अनुमान लगा सकते हैं — प्रेमगीत को रचते रचते, महक रहा तन-मन मेरा,याद तेरी जब आई है, तुम मिलने आ जाना ,कह दूं सब मनमीत सांवरे, दूर भले कितना भी रह लो, एक दिवस मिलने आऊंगी, ऐसी लागी लगन मैं दीवानी भई, प्रेम का दीपक जलाओ साथी,दर्द दिल का सहा नहीं जाता जैसी कविताओं में प्रेम मुख्य विषय है।

एक तथ्य गौर करने योग्य है कि इसमें कवयित्री ने अपने प्रारंभिक काव्य लेखन के दौर की कविताएं शामिल की हैं परन्तु प्रकाशन प्रौढ़ावस्था में हुआ है । इसमें वर्तमान की लिखी कविताएं भी हैं जो दाम्पत्य प्रेम पर केन्द्रित हैं । प्रारंभिक कविताओं में प्रेम की धारा उन्मुक्त और गतिमान है । उत्तरार्द्ध की कविताओं में दामपत्यपरक सजग सामाजिक दृष्टिकोण परिलक्षित हो रहा है। कुछ उद्धरणों के माध्यम से देखते हैं –

1. थी कुछ लम्हे चुराने आई
जन्मों में तुमको बांध आई
तीरगी के राह को जीती थी
स्वर्णिम छटा बिखरा आई
2. महक रहा तन-मन है मेरा
मिला जो उसका साथ
मैं लौटी उससे मिलकर मिलकर

3. बहुत याद आते हो तुम तो
दिन कटता नहीं कटती रैना
जब जब रहूं मैं तन्हाई में
मिलती नहीं अरमां को चैना
4. सांझ ढले बहती नदी संग
प्रेम- पातिका लेकर आना
प्रियतम तुम मिलने आना
अब उनकी उतरार्द्ध की कविताओं को देखिए —
1. तुझ संग प्रीत की डोर बंधी
मन की सीमाओं को जोड़ते
बिखर न जाये सपने सतरंगी
है डर लगता अब इन्हें तोड़ते
2. सुबह की बासंती बहार है तू
जीवन का गुनगुनाता राग है तू
एक तेरे होने से गुंजित जीवन मेरा
फागुनी रंगों का बयार है तू
3. हर लेते मन पीड़ सांवरे
रहते संग मनधीर सांवरे
जीत जगत को ले लूं अब
कह दूं सब मनमीत सांवरे

4. इश्क मुहब्बत यारा यारी
यह तो इक बीमारी है
फिर भी होता है जीवन में
जाने कैसी लाचारी है।

प्रेम के अतिरिक्त कुछ अन्य विषयों पर भी कविताएं लिखी गई हैं।- पापाजी तुम भी पापा हो , यूं ना उदास रहा करो, बीत गया है साल पुराना, गीतों का संसार रचो मित्र, आओ मिलकर इत्र बने हम, मैं हुंकार हूं उस सीने की आदि ।

कवयित्री की भाषा सरल गतिमान है। वह प्रायः छंदमुक्त कविताएं लिखती हैं परन्तु सदैव लयात्मकता बरकरार रहती है। वैसे तो हर साहित्यकार का अपना संघर्ष,अपना परिवेश ,अपनी रचना दृष्टि होती है। मधुबाला का भी अपना कैनवास है ।अपना रंग और अपना शिल्प है। मैं आशा करता हूं कि आगे वे अपने विजन को और विस्तृत करेंगीं । हार्दिक शुभकामनाएं।

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