श्रद्धा और आस्था के साथ सुहागिन महिलाओं ने रखा वट सावित्री व्रत
श्रीनारद मीडिया, दारौंदा, सीवन (बिहार )।
सीवान जिले के दारौंदा प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में शनिवार को सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ वट सावित्री व्रत रखा। महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए वट वृक्ष की पूजा-अर्चना की। प्रखंड के गांवों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर सुबह से ही पूजा को लेकर धार्मिक माहौल बना रहा।
हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत को सुहागिन महिलाओं का अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने तथा माता सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। महिलाओं ने प्रातः काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए और व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप, जल का लोटा, कच्चा सूत, फल एवं मिठाई लेकर वट वृक्ष के पास पहुंचीं।
पूजा के दौरान महिलाओं ने वट वृक्ष में जल अर्पित कर उसकी विधिवत पूजा की। इसके बाद कच्चा सूत लपेटते हुए 7, 11, 51 अथवा 108 बार परिक्रमा की। पूजा के उपरांत महिलाओं ने माता सावित्री और सत्यवान की कथा का श्रवण किया तथा पति की लंबी आयु, परिवार की खुशहाली और धर्म पालन की प्रार्थना की। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन भी किया।
वट सावित्री व्रत की कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा अश्वपति की पुत्री माता सावित्री अत्यंत तेजस्विनी और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, जबकि ऋषियों ने पहले ही सत्यवान की अल्पायु होने की भविष्यवाणी कर दी थी। एक दिन वन में लकड़ी काटते समय सत्यवान मूर्छित होकर गिर पड़े और यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे। तब सावित्री अपने पति के पीछे-पीछे चलती रहीं और अपनी बुद्धि, धर्म तथा पतिव्रता शक्ति से यमराज को प्रसन्न कर लिया। अंततः यमराज ने सत्यवान को पुनः जीवनदान दे दिया। इसी कारण यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार वट सावित्री व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नारी के श्रद्धा, निष्ठा, आत्मबल और दांपत्य प्रेम का प्रतीक है। यह व्रत परिवार में सुख-समृद्धि, प्रेम और स्थिरता बनाए रखने का संदेश भी देता है।