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एनसीईआरटी ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित चैप्टर वापस लेते हुए,माफी मांगी

एनसीईआरटी ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित चैप्टर वापस लेते हुए,माफी मांगी

पुस्तक से हटेगा ‘न्यापालिका में करप्शन’ का अध्ययाय

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानी एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का चैप्टर शामिल किया था. आठवीं कक्षा की किताब में शामिल चैप्टर पर हंगामा मचा, तो एनसीईआरटी ने इस बदलाव को वापस ले लिया है. लेकिन एनसीईआरटी को सुप्रीम कोर्ट की जबरदस्त फटकार पडी है. सूत्रों का दावा है कि मंगलवार को कैबिनेट बैठक में पीएम मोदी ने भी इसे लेकर अपनी नाराजगी जताई थी.

यह विवाद ‘द रोल ऑफ द ज्यूडिशियरी इन आवर सोसाइटी’ नाम के अध्याय को लेकर हुआ। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि न्यायपालिका से जुड़े अध्याय की कानूनी समीक्षा क्यों नहीं कराई गई। इस पर एक अधिकारी ने कहा कि पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया में ऐसी कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं है।

एनसीईआरटी की ये किताब अब आपको देखने को नहीं मिलेगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की इस किताब पर बैन लगा दिया है. सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी किताब के अंदर न्यायपालिक में भ्रष्टाचार वाले चैप्टर को लेकर थी, जिसकी वजह से बात इस पर बैन तक जा पहुंची. इस चैप्टर में लिखी बातों का स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि नई किताब तुरंत हर जगह से हटाई जाए.

कोर्ट ने कहा है कि किताब की हार्ड कॉपी, डिजिटल कॉपी, सॉफ्ट कॉपी, इंटरनेट हर जगह से हटाई जाए. यानी बुक पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैंकेट बैन लगा दिया है. दूसरे पब्लिकेशन, डिस्ट्रीब्यूशन और स्कूलों में पहुंचाई जा चुकी किताबों की खेप की हर एक प्रति फौरन जब्त कर ली जाए और 2 हफ्ते में अनुपालन रिपोर्ट दी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के डायरेक्टर, स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को नोटिस भी जारी किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करके पूछा है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जाए. मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी. कोर्ट ने जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है. एनसीईआरटी के डायरेक्टर प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी और स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव 1990 बैच के बिहार कैडर के आईएएस संजय कुमार को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब देना है.

आठवीं के बच्चों की किताब में न्यायपालिका को लेकर जो बातें लिखी गई थीं, वो सुप्रीम कोर्ट को बेहद नागवार गुजरी हैं. चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने खुद से सुनवाई के दौरान कहा कि इससे न्यायपालिका पर गोलीबारी हुई है. न्यायपालिका रक्त रंजित की गई है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि बच्चों को देर से न्याय मिलने की बात समझाने का मकसद था. दो लाख किताबें वापस ले ली गई हैं और एनसीईआरटी ने बिना शर्त माफी भी मांग ली है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सब कुछ ऑनलाइन-ऑफलाइन जनता के सामने आ चुका है, तब वापस लेने का क्या मतलब, माफी पर बाद में विचार करेंगे. हमें पता लगाना है कि जिम्मेदार कौन-कौन है. उन्हें सजा मिलनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने NCERT से उन कमेटी मेम्बर्स के नाम भी मांगे जिन्होंने 8वीं की किताब का ये चैप्टर पास किया था. इस किताब में लिखी बातें लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच चुकी थीं, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त ऐतराज जताया है.

दरअसल, इस किताब में न्यायपालिक की चुनौतियों का जिक्र करते हुए भ्रष्टाचार के बारे में लिखा गया था कि लोग न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का सामना करते हैं. इससे गरीब-जरूरतमंदों के लिए न्याय मुश्किल हो सकता है. इसलिए व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में सरकारें तेजी से कार्रवाई कर रही हैं. 2017-21 के बीच न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की 1600 शिकायतें आ चुकी थी और देश के सुप्रीम कोर्ट में 81000, हाईकोर्ट्स में 62.40 लाख और निचली अदालतों में 4.70 करोड़ केस लंबित हैं.

सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति है कि 8वीं के बच्चों के मन में न्यायपालिका के लिए भ्रष्टाचार की एकपक्षीय बात बैठाने की साजिश की जा रही है. न्यापालिका ने संविधान की रक्षा, मौलिक अधिकारों की रक्षा और आखिरी व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने की जो कोशिशें की हैं, उन्हें नजरअंदाज किया गया है. सरकार के सफाई देने पर भी ये विवाद थमता नहीं दिखता और कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने इसे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिशों से जोड़कर सरकार को निशाने पर लिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नई किताब ‘Exploring Society: India and Beyond, Part 2’ में एक चैप्टर है – ‘The Role of the Judiciary in Our Society’. इस चैप्टर में न्याय व्यवस्था की भूमिका के साथ-साथ उसकी चुनौतियों का भी जिक्र किया गया था. चैप्टर में न्यायपालिका के सामने ‘लंबित मामले (massive backlog)’ और ‘भ्रष्टाचार (corruption)’ जैसी समस्याओं को चुनौतियों के रूप में बताया गया था. किताब में यह भी लिखा गया था कि जजों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रिया और कमजोर स्ट्रक्चर न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी समस्याएं हैं.

NCERT काउंटर से इस किताब की कुल 38 कॉपियां बेची गई थीं. लेकिन अगले ही दिन खरीदारों को फोन करके किताब वापस करने के लिए कहा गया. काउंटर पर काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि पब्लिकेशन डिपार्टमेंट के अधिकारी के निर्देश पर सभी खरीदारों से संपर्क किया गया है.अब तक 16 कॉपियां वापस आ चुकी हैं. जिन लोगों का कॉन्टेक्ट नंबर उपलब्ध नहीं था, उनकी जानकारी बैंक से UPI के आधार पर मांगी गई. कर्मचारी के अनुसार, ‘मंत्रालय की तरफ से किताब वापस लेने का आदेश है.’

डी पी सकलानी, जो एनसीईआरटी के निदेशक हैं, उन्होंने इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है. शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार को इस किताब की कोई भी कॉपी नहीं बेची गई.

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस कंटेंट पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि वे किसी को भी न्यायपालिका की ईमानदारी और प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं देंगे. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

क्यों बना इतना बड़ा मुद्दा?

दरअसल, किताब में न्यायपालिका की चुनौतियों का जिक्र किया गया था, जिसमें भ्रष्टाचार और मामलों का लंबे समय तक लंबित रहना शामिल था. इसी बात को लेकर विवाद खड़ा हुआ. आलोचकों का कहना है कि इस तरह का कंटेंट छात्रों के बीच न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकता है. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि शिक्षा में वास्तविक समस्याओं पर चर्चा होना जरूरी है.

अब आगे क्या?

फिलहाल किताब को वापस मंगा लिया गया है. माना जा रहा है कि इसमें बदलाव या संशोधन के बाद ही इसे दोबारा जारी किया जाएगा. यह मामला दिखाता है कि शिक्षा से जुड़ी किताबों में लिखा गया कंटेंट कितना संवेदनशील हो सकता है और उसे लेकर सरकार और न्यायपालिका कितनी गंभीर रहती है.

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