जब तक यह संवाद जीवित है, तब तक फगुआ नहीं मरेगा
जब तक यह संवाद जीवित है, तब तक फगुआ नहीं मरेगा फगुआ महज, एक पर्व भर नहीं है, वह लोक के भीतर धड़कती कविता है श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क आज होली है। फागुन की इस दोपहर में कोई पुरानी स्मृति-धुन लौट रही है। हवा में गीले आम्र-मंजरियों की गंध है। कहीं दूर घंटियों की धीमी…
