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पं. महेंद्र मिश्र की जयंती पर जलालपुर चौक स्थित प्रतिमा पर राजद नेता सुधांशु रंजन ने किया माल्यार्पण

पं. महेंद्र मिश्र की जयंती पर जलालपुर चौक स्थित प्रतिमा पर राजद नेता सुधांशु रंजन ने किया माल्यार्पण

श्रीनारद मीडिया, के के सिंह सेंगर, छपरा/जलालपुर (सारण)।

पूर्वी धुन के जनक और महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित महेंद्र मिश्र की जयंती सोमवार को श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर राजद नेता सुधांशु रंजन ने जलालपुर चौक स्थित गोलंबर पर लगी पंडित महेंद्र मिश्र की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया।

माल्यार्पण के बाद उन्होंने कहा कि सरकार ने पंडित महेंद्र मिश्र के नाम पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की है। उनकी जयंती को सरकारी कैलेंडर में शामिल तो किया गया, लेकिन उन्हें अब तक स्वतंत्रता सेनानी का समुचित सम्मान भी नहीं मिल सका है, जो बेहद दुखद है। उन्होंने कहा कि बिहार सरकार यह स्वीकार कर चुकी है कि आजादी की लड़ाई के दौरान ब्रिटिश शासन की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के आरोप में पंडित महेंद्र मिश्र को दस वर्ष से अधिक समय तक बक्सर जेल में रहना पड़ा था।

उन्होंने यह भी कहा कि आज तक सरकार ने उनके पैतृक घर को राजकीय संग्रहालय घोषित नहीं किया है, जिसका दर्द जलालपुरवासियों को आज भी है। इस मांग को लेकर हर वर्ष साइकिल रैली भी निकाली जाती है।

राजद नेता ने बताया कि पंडित महेंद्र मिश्र की जयंती के अवसर पर राज्य सरकार की पहल पर जलालपुर हाई स्कूल परिसर में कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने रविवार को आयोजित कवि सम्मेलन में दर्शकों की कम उपस्थिति पर भी क्षोभ व्यक्त किया और कहा कि यदि कार्यक्रम का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ होता तो जलालपुर के मैदान में श्रोताओं के बैठने के लिए कुर्सियां भी कम पड़ जातीं।

उन्होंने कहा कि पंडित महेंद्र मिश्र द्वारा रचित पूर्वी धुनें आज भी भोजपुरी समाज में लोकप्रिय हैं और इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन सरकार की नजर में उनकी अब तक पर्याप्त अहमियत नहीं दी गई है।

बताया जाता है कि “आंगुरी में डसले बिया नगिनिया रे…”, “सासु मोरा मारे रामा बांस के छेवकिया…” जैसे अनेक लोकगीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं और इन गीतों के रचयिता पंडित महेंद्र मिश्र को याद दिलाते हैं।
गौरतलब है कि पंडित महेंद्र मिश्र का जन्म 16 मार्च 1886 को सारण जिले के जलालपुर प्रखंड के मिश्रवलिया गांव में हुआ था। आजादी की लड़ाई के दौरान उन्होंने जाली नोट छापकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों की आर्थिक मदद की थी, जिसके कारण उन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर लंबे समय तक जेल में रखा था।

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