प्रेम, संघर्ष और स्वप्न का शिल्पकार- शाहरुख़ ख़ान
जन्मतिथि पर विशेष
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

वह परदे पर नहीं चलते—वह परदे पर बहते हैं। जिस तरह किसी नदी का अपना एक स्वभाव होता है—कहीं तीव्र, कहीं मंद, कहीं गर्जित, कहीं फुसफुसाहट—शाहरुख़ ख़ान भी वैसे ही हैं। उनके भीतर एक व्यापक प्रवाह है; अभिनय जैसे उनके नसों में धड़कता हो, सांसों में गूंजता हो और मुस्कुराहट में चुपचाप जीवन का दर्शन टँका हो।
हिंदी सिनेमा की भीड़ में वह केवल एक अभिनेता नहीं बल्कि वह भाव हैं जिन्हें हिंदी के दर्शक अपनी आँखों के कोरों में छिपा कर रखते हैं। वह आशा हैं, वह रोमांस हैं, वह सपने हैं और वह अपने समय की उस धड़कन का नाम हैं, जिसमें चाहत, संघर्ष और चमक—एक साथ जलते हैं।
उनके चेहरे पर मुस्कान एक पुल है—जो दर्शक को उनके संसार तक ले आती है। यह मुस्कान केवल हँसी नहीं; यह संवाद है। संवाद उस आदमी का जो टूटा और फिर खड़ा हुआ। जिसने एक साधारण शहर में सांस ली, एक साधारण परिवार में बढ़ा और फिर असाधारण ऊँचाइयों को प्राप्त किया। उनकी आँखों में जो चमक है, वह किसी रहस्य की तरह नहीं—किसी सत्य की तरह है, जिसे दुनिया समझ तो लेती है पर व्यक्त नहीं कर पाती। वह चमक दर्शक को बताती है कि सपने बड़े हों या छोटे, उन्हें देखने वालों का दिल बड़ा होना चाहिए।
उनकी आवाज़—मखमली नहीं बल्कि हल्की खुरदरी—जैसे रेत पर चलती हवा। उसमें एक गर्माहट है जो शब्दों को भाव बना देती है। वह आवाज़ प्रेम को प्रेम कहती है, पर संघर्ष को भी नहीं छुपाती। वह प्रेम को केवल स्त्री-पुरुष के आकर्षण में नहीं देखती बल्कि उसे मानवीय विश्वास में, वफादारी में, प्रतीक्षा में और टूटने के बाद फिर से उठ खड़े होने की क्षमता में खोजती है। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता केवल सौन्दर्य या शैली का प्रश्न नहीं—बल्कि हृदय-संबंध का फल है। उनका चेहरा कला की पेंटिंग नहीं—भावनाओं की खिड़की है। वह प्रेम का फूल नहीं—संघर्ष में खिली हवा हैं।
जब वह बाँहें फैलाते हैं—तो दर्शक केवल रोमांस नहीं देखते; उनकी बाँहों में एक घर-सा, एक आसरा-सा, एक पहुँच-जैसा भाव छिपा होता है। यह वह अंदाज़ है जो केवल संवाद से नहीं आता—यह सदी की प्रेम-परंपरा से आता है। कृष्ण-भाव, राधा-आकुलता, प्रेमचंद के नायक की विनम्रता, शरतचंद्र की आतुरता, फिराक़ की नरम धड़कन और धर्मवीर भारती के प्रेम का सिहरता नज़रिया—इन सबका एक अनाम संगम कहीं शाहरुख़ के हाथों की उस फैलावट में है।
पर उनकी यात्रा केवल चमक का गीत नहीं। वह अपनी विधा में ‘रोमांस के राजा’ कहलाते हैं, पर उनका रोमांस गुलाब की पत्तियों पर ठहरा गुलाब नहीं—वह सघन रात में खिली कली है, जो सुबह की धूप में अपनी पंखुड़ियों पर ओस लेकर आती है। उनके भीतर संघर्ष है—उम्र के विरुद्ध नहीं बल्कि सीमाओं के विरुद्ध। उन्होंने सौम्यता से यह सिद्ध किया कि अभिनय केवल चरित्र को निभाना नहीं—चरित्र के भीतर प्रवेश करना है। वह कहानी को भीतर जलाते हैं, फिर परदे पर उसे शीतल धूप की तरह बिखेरते हैं। हर फ्रेम में वह अभिनेता नहीं, अनुभव लगते हैं।
हर संवाद में लय है—एक ऐसा छंद जो आधुनिकता में भी काव्य की धुन रखता है। जब वह प्रेम की बात करते हैं, वह प्रेम को कोई स्पर्श नहीं बनाते; वह प्रेम को प्रतीक्षा में बदल देते हैं। प्रतीक्षा किसी भी प्रेम की सबसे शुद्ध अवस्था है—और शाहरुख़ इस प्रतीक्षा के कलाकार हैं। उनका प्रेम देने वाला प्रेम है—स्वामित्व नहीं। उनका प्रेम पाया जाने वाला प्रेम नहीं—सहयोगी, सहानुभूतिशील और आत्मविभोर प्रेम है। वह प्रेम को दंभ से मुक्त करते हैं। प्रेम उनके यहाँ विनम्र होता है, इसलिए ऊँचा दिखाई देता है।
उनके कदमों में शहर की हलचल है—और उनके मौन में किसी गाँव की मिट्टी। उनकी मुस्कान कभी दिल्ली के दिल्लगी से बनी लगती है तो कभी मुंबई के स्वप्न की धूप से। वह भीड़ में चमकते हुए भी कभी पूरी तरह चमक के आदमी नहीं लगते—बल्कि किसी कोने में बैठा वह लड़का दिखते हैं, जो अपनी मुठ्ठी में सपनों को कस कर पकड़े बैठा है और दुनिया को चुनौती देता है—कि वह हार नहीं मानेगा। वह प्रसिद्धि को ऐसा पहनते हैं जैसे नदी घाट पहनती है—स्वाभाविक रूप से। वह अवसर को ऐसे साधते हैं जैसे किसान ऋतु साधता है—कर्म से, ध्यान से, मन से।
उन्हें देखकर लगता है—सदियों से भारतीय कथा-कहानी में जो ‘नायक-भाव’ चलता आया, उसका आधुनिक अवतार यही है। कभी उनमें राम की मर्यादा का अंश दिखता है, कभी कृष्ण की विनोद-रसिता, कभी आरिफ़ की मोहब्बत, कभी फीरोज़ की चमक और कभी-कभी किसी संत-सा धैर्य। वह अपने समय के हीरो होकर भी समय से बाहर खड़े लगते हैं; जैसे वह कहानी का हिस्सा हों, पर इतिहास के पाठ से निकले हों। वह स्वयं एक कथा हैं—कथा जिसमें प्रेम है, पीड़ा है, फिर विजय है।
उनकी ऊर्जा—उत्सव भी है और अनुशासन भी। वह काम को पूजा जैसा मानते हैं और सफलता को संयोग नहीं—निष्ठा का फल। वह मंच पर चढ़ते हैं तो प्रार्थना जैसे लगते हैं; परदे पर आते हैं तो कोई दीप जल उठता है। वह हार को छुपाते नहीं—उसे गरिमा से स्वीकारते हैं, फिर उसके पार निकलते हैं। उनका जीवन यह बताता है कि असफलता कोई अंत नहीं—वह केवल एक विस्तारित आरंभ है।
भारतीय सिनेमा में शाहरुख़ मात्र अभिनेता नहीं बल्कि एक भावनात्मक पर्यावरण हैं। दर्शक उनके साथ उम्र बढ़ाता है, स्मृतियाँ बनाता है और अपने भीतर की कोमलता को सुरक्षित रखता है। वे दर्शक को उसकी कोमलता लौटाते हैं—उस समय में, जब दुनिया कठोर होती जाती है। उनके कारण दर्शक अपने भीतर प्रेम बचाए रखता है। यह उनकी सबसे बड़ी विजय है। सितारे आते हैं, जाते हैं; लेकिन कुछ संवेदनाएँ युगों तक रहती हैं। शाहरुख़ उस संवेदना का नाम हैं जो आने वाले समय में भी भारतीय मन में धड़कती रहेगी।
उन्हें देखकर लगता है—सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं; वह आत्मा का उत्सव है। अभिनय केवल कला नहीं; वह मनुष्य होने की प्रक्रिया है और प्रेम केवल कहानी नहीं; वह वह अनंत है जिसमें संसार अपनी थकान छोड़ देता है। शाहरुख़ का चेहरा हमारे समय का आईना है—जहाँ सपने अपनी थकान धोकर मुस्कुराते हैं, और जहाँ हृदय चुपचाप कहता है—
“प्रेम कठिन नहीं; बस उसे सच होना पड़ता है।”
इसलिए वे हमेशा प्रेम के कवि रहेंगे—परदे के कवि, भावों के कवि और उस कोमल श्वास के कवि, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। उनके चले जाने के बाद भी, उनकी मुस्कान रहेगी—गीत की तरह, हवा की तरह, याद की तरह। और हिंदी सिनेमा की कहानी जब भी अपने सर्वश्रेष्ठ पलों को याद करेगी, यह कहेगी—
वह समय था जब परदे पर एक आदमी हँसता था और देश उसके साथ हँसता था; वह समय था जब प्रेम केवल कहानी नहीं, जीवन-सा लगता था। वह समय था—शाहरुख़ का।
दुनिया बदलती रहेगी—पर प्रेम की भाषा, संघर्ष का सौंदर्य, विनम्रता का प्रकाश, और सपनों की गरिमा—ये मूल्य शाश्वत रहते हैं। शाहरुख़ की फिल्मों ने इन्हें न केवल छुआ बल्कि इन्हें जीया। उनकी फिल्में समय की आँखों में चमक हैं; और उनके द्वारा छोड़ी गई भाव-रेखाएँ आने वाले वर्षों तक भारतीय मानस की स्मृति में झिलमिलाती रहेंगी।
उनका सिनेमा कहता है—
प्रेम केवल कहानी नहीं; वह जीवन की वह नमी है जो मनुष्य को कठोर होने से बचाती है।
संघर्ष केवल लक्ष्य नहीं; वह आत्मा की उड़ान है।
सपने केवल आँखों में नहीं; वे आचरण में भी होने चाहिए।
और जब कभी मनुष्य थककर बैठता है, उनकी फिल्मों का कोई दृश्य, कोई संवाद, कोई धड़कन—हवा की तरह आती है और कहती है—
“अभी सब खत्म नहीं हुआ है। जीवन अभी भी सुन्दर हो सकता है।”
आभार-परिचय दास sir
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