मानसून की चाल पर अलनीनो का प्रभाव दिख रहा है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मानसून की चाल और तीव्रता पर अलनीनो का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है। केरल में मानसून के आगमन के दो सप्ताह के भीतर ही इसके तेवर ढीले पड़ने लगे हैं। पश्चिमी हिस्से में एक हफ्ते से मानसून ठिठका हुआ है, जबकि पूर्व में भी इसकी रफ्तार काफी धीमी है।
जून में अब तक देश में सामान्य से 28 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। मौजूदा परिस्थितियों को मौसम विज्ञानी अलनीनो के प्रभावी होने का शुरुआती संकेत मान रहे हैं। अलनीनो की स्थिति अभी बहुत प्रभावी नहीं मानी जा रही है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह सितंबर तक मजबूत हो सकता है।
भारत पर अलनीनो का असर
अलनीनो के दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका संबंध कमजोर मानसून और कम वर्षा से जोड़ा जाता है।
सामान्य तौर पर जून को मानसून के विस्तार का महीना माना जाता है, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। चार जून को देश में प्रवेश करने के कुछ दिन तक मानसून की प्रगति संतोषजनक रही, मगर बाद में रफ्तार कमजोर पड़ गई।
जून में ही ‘ब्रेक मानसून’
स्काइमेट के जेपी शर्मा के अनुसार अगले सात से दस दिनों तक हालात में सुधार के संकेत नहीं हैं। आमतौर पर ‘ब्रेक मानसून’ की स्थिति जुलाई या अगस्त में दिखाई देती है, लेकिन जून में ही मानसून की यह सुस्ती चिंता का विषय है। इस सुस्ती की सबसे बड़ी वजह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में किसी मजबूत मौसम प्रणाली का विकसित न हो पाना है।
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र और चक्रवात मानसून को मजबूती देते हैं तथा उसे देश के विभिन्न हिस्सों की ओर तेजी से बढ़ने में मदद करते हैं। फिलहाल ऐसी कोई सक्रिय प्रणाली दिखाई नहीं दे रही है।
आईएमडी का बयान
मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्रा के अनुसार अरब सागर में लो-लेवल जेट भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है, जिससे मानसून को अपेक्षित ताकत नहीं मिल पा रही।
वर्षा के आंकड़े भी मानसून की सुस्ती की पुष्टि कर रहे हैं। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। महाराष्ट्र में अब तक सामान्य से लगभग 72 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।
इसके विपरीत उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश हुई है, लेकिन इसका कारण मानसून नहीं बल्कि सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ हैं। हालांकि मौसम वैज्ञानिक अभी निराश नहीं हैं।
उनका कहना है कि मानसून की अंतिम तस्वीर जुलाई और अगस्त में ही स्पष्ट होगी, क्योंकि यही कोर मानसून माह होते हैं और इसी दौरान अधिकांश वर्षा होती है।
20 जून के बाद हालत सुधरने के आसार
मृत्युंजय महापात्रा का कहना है कि 20 जून के बाद परिस्थितियां कुछ बेहतर हो सकती हैं। बंगाल की खाड़ी में मौसम प्रणाली विकसित होने की उम्मीद है, जिससे मानसून महाराष्ट्र से आगे बढ़ना शुरू कर सकता है।
यदि ऐसा होता है तो जुलाई के पहले सप्ताह तक कई क्षेत्रों में अच्छी वर्षा देखने को मिल सकती है और वर्षा की मौजूदा कमी भी काफी हद तक पूरी हो सकती है।
