रघुनाथपुर की यह तस्वीर सिर्फ एक सड़क की हालत नहीं दिखाती, बल्कि वर्षों की अनदेखी और विकास के खोखले दावों की सच्चाई भी बयां करती है
कागज़ों में विकास की गंगा बह रही है,लेकिन ज़मीन पर सच्चाई कीचड़ और धूल में सिसक रही है
दशकों से उपेक्षित एक सड़क की सच्चाई पढ़िए ग्रामीण डॉ• प्रवीण किशोर की कलम से
श्रीनारद मीडिया,प्रसेनजीत चौरसिया,सीवान (बिहार)

सीवान जिला के रघुनाथपुर प्रखंड के हरनाथपुर से नीलकंठ ब्रह्म बाबा होते हुए प्रखंड मुख्यालय रघुनाथपुर तक जाने वाली यह सड़क, जो कभी लोगों की जिंदगी की रफ्तार थी, कभी गांव की धड़कन हुआ करता था।
आज खुद ही सांसें गिन रही है।गांव के लोग आज भी धूल और गड्ढों से होकर गुजरने को मजबूर हैं.दशकों बीत गए, सरकारें बदलीं, वादे बदले, नारे बदले…लेकिन इस सड़क की तकदीर नहीं बदली।
यह वही रास्ता है— जहाँ कभी बच्चों की टोली, बुज़ुर्गों का सहारा, और युवाओं का जोश साथ चलता था…
आज वही रास्ता सुनसान पड़ा है, जैसे विकास की राह ही भटक गई हो।
सबसे कम दूरी का यह मार्ग, आज सबसे लंबी पीड़ा बन चुका है।
क्योंकि यह सिर्फ दूरी नहीं घटाता था, बल्कि लोगों के सपनों को भी जोड़ता था।
यह रास्ता वक्त और व्यवस्था दोनों की मार झेल रहा है।
ईंटें उखड़ चुकी हैं, धूल उड़ रही है, और विकास के दावे कहीं गुम हो चुके हैं।
सरकार से एक सवाल-
क्या विकास सिर्फ शहरों की चौड़ी सड़कों तक सीमित है?
क्या गाँव की टूटी सड़कें आपकी नजर में नहीं आतीं?
आज भी अगर कोई बीमार हो जाए, कोई छात्र जल्दी पहुँचना चाहे, तो यह सड़क उसकी मजबूरी बन जाती है, सुविधा नहीं।

इस सड़क की दुर्दशा के लिए नेताओं के साथ साथ गांव के राजनीतिक पार्टियों के लिए झंडा ढोने वाले कार्यकर्ता भी जिम्मेवार है जो अपने नेताओं से अपने गांव के रास्ते को बनवाने को कहने के बजाय उनके आगे पीछे घूमते रहते है।
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