धुरंधर को बस फिल्म की तरह क्यों ले…जबकि ये सच्चाई बयां कर रही है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

इसने जिस जिस विषय को उठाया है,उसमे टेरर फंडिंग,जाली नोट,वो सोच जिसमें भारतीयों के सिर को काट कर मुदरिके के मिनारों से टांगने की बात है…
पर सबसे दुखद और खुन खौलाने वाला लब्ज है मेजर इक़बाल द्वारा कहा गया ‘माल-ए-ग़नीमत’ …वो जिसे कौड़ियो दो कौड़ियों में बेचने की बात कहता है,जो सपना है इस फिरके का…
माल ए गनीमत इतिहास का एक बेहद पीड़ादायक और संवेदनशील अध्याय है…ये भारत को लुटने आए अरबी,तुर्क,म़ंगोल हर किसी ने करनेकी कोशिश की है…यूं तो इसका अर्थ है युद्ध में जीती गई वस्तु…पर युद्ध में सामान से ज्यादा किमती इज्जत है,जिसको लुटना इसका सही अर्थ समझते हैं येए….
और इसमें सबसे संवेदनशील है , बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 के दौरान महिलाओं को जिस तरह पाकिस्तानी फौज ने रौंदा,वो जुल्म अत्याचार मानवता को झकझोर देने वाले थे।
माल ए गनीमत का ज़िक्र करना बेहद जरूरी है। यह कोई साधारण शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच को दर्शाता है,जिसमें औरतें उसकी जिती ग्ई मिल्कियत हैं।
जिसका भयावह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान, पाकिस्तानी सेना द्वारा महिलाओं पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किए गए।
हजारों स्वतंत्र स्रोतों और शोधों चिख चिख कर बताते हैं कि औरतों पर यह हिंसा केवल युद्ध का हिस्सा नहीं थी, बल्कि बंगाली समाज को तोड़ने और डर फैलाने की एक सुनियोजित रणनीति थी।
महिलाओं को जबरन उठाया गया, उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उन्हें नंगा करक कैदी शिविरों में रखा गया,उनपर बलात्कार हुएं। इन घटनाओं ने असंख्य परिवारों और पीढ़ियों को गहरे घाव दिए। कई पीड़िताओं को बाद में समाज में भी स्वीकार्यता नहीं मिल सकी और उनकी पीड़ा इतिहास के पन्नों के अंदर दब कर रह गई।
‘माल-ए-ग़नीमत’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल, किसी भी इंसान खासकर महिलाओं को वस्तु के रूप में देखने की मानसिकता को दर्शाता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है।
पर ये होता है, हमास ने इजराइली महिलाओं के साथ किए, आइएसआइ ने कुर्द महिलाओ के साथ किया,भारत में जब जब विदेशी अक्रांता भारत आएं तो यहां कि महिलाओं के साथ हुआ,भारत की वीर राजपूतानियों ने इससे बचने के लिए जौहर किए ।
और सबसे ताजा तो आपरेशन सिंदूर के वक्त कुछ पाकिस्तानी पत्रकार आन रिकार्ड भारत की अभिनेत्रियों को अपनी लौंडिया या माल ए गनीमत बनाने के इच्छुक दिखे।
युद्ध के दौरान ऐसी सोच बस एक खास आइडियोलॉजी में हैं,जो क्रूरता को और बढ़ावा देते है।
इतिहास के ये किस्से हमें केवल दर्द ही नहीं, बल्कि एक सीख भी देते हैंकि किसी भी परिस्थिति में स्त्री की गरिमा, सम्मान और अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए।
पर पाकिस्तान का बच्चा बच्चा दिल्ली लालकिले पर गौ के कबाब खाने की बात करता है और व्यस्क पाकिस्तानी भारत की इज्जत को माल ए गनीमत बनाने को आतुर…
यही उनकी सोच है,वही उनको सिखाया गया है और यही उनके लिए आखिरी सच है,जिसके लिए वो जान लेने और देने की हद पार कर देते है।
धुरंधर प्रोपेगंडा नही है,हम शुतुरमुर्ग हैं…
