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पश्चिम बंगाल में ‘संवैधानिक तंत्र की विफलता’ पर सवाल उठा

पश्चिम बंगाल में ‘संवैधानिक तंत्र की विफलता’ पर सवाल उठा

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

सुप्रीम कोर्ट में I-PAC मामले की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल में ‘संवैधानिक तंत्र के विफल होने’ को लेकर बड़ा सवाल उठा। हालांकि, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने साफ किया कि उसने कभी यह नहीं कहा कि राज्य में पूरी तरह संवैधानिक व्यवस्था ठप हो गई है।

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ED का तर्क केवल कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) के उल्लंघन तक सीमित है, इसे संवैधानिक तंत्र के फेल होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि अगर संवैधानिक तंत्र के टूटने की बात मानी जाती है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जैसे राष्ट्रपति शासन लागू होना।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस एन वी अंजारिया ने कहा कि अदालत को उम्मीद है कि ED इस तरह का संकेत नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि यह बहुत गंभीर मुद्दा है और इसके बड़े असर हो सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि ED ऐसा तर्क कभी नहीं दे सकती और वह केवल मामले के तथ्यों पर ही बात कर रहे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सिर्फ मामले से जुड़े विवाद के संदर्भ में सवाल उठा रही है, किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है।

ममता बनर्जी पर आरोप और क्या है I-PAC मामला?

यह मामला कोलकाता में 8 जनवरी को ED की छापेमारी के दौरान कथित बाधा से जुड़ा है। ED ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के अन्य अधिकारियों ने जांच में रुकावट डाली।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि अगर कोई मुख्यमंत्री जांच में हस्तक्षेप करता है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा हो सकता है। इसी बीच, I-PAC से जुड़ा एक आंतरिक ईमेल सामने आया है, जिसमें बताया गया कि संगठन ने 20 दिनों के लिए अपने ग्राउंड ऑपरेशन रोक दिए हैं।

ईमेल के मुताबिक, यह फैसला कुछ कानूनी कारणों की वजह से लिया गया है और पश्चिम बंगाल में काम तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया गया है। संगठन ने कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया में पूरा सहयोग कर रहा है और उसे भरोसा है कि न्याय जरूर मिलेगा।

कलकत्ता में आईपैक पर ईडी के छापे के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वहां जाकर दखल देने के मामले में सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सिटिंग मुख्यमंत्री के इस आचरण पर तीखी टिप्पणियां की।

कोर्ट ने कहा कि यह असाधारण मामला है। ये केंद्र और राज्य के बीच का विवाद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता।

शीर्ष अदालत ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए वकीलों द्वारा दी गई पुराने फैसलों की नजीरों पर कहा कि इन फैसलों में अदालत ने कभी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी, कि छापे के दौरान कोई सिटिंग मुख्यमंत्री वहां पहुंच जाए।

इस मामले में ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल कर आईपैक छापे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वहां जाकर दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेने के मामले की एफआईआर दर्ज करने और जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की है।

ईडी ने ममता बनर्जी और राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है जिस पर कोर्ट आजकल सुनवाई कर रहा है। मामले में गुरुवार को भी बहस जारी रहेगी जिसमें केंद्र और ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्ष रख सकते हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया कर रहे हैं।

जब पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की ओर से पेश वकील मेनका गुरुस्वामी ने ईडी की याचिका पर सुनवाई को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि ये मामला वास्तव में केंद्र और राज्य के बीच का विवाद है और इसके लिए ईडी अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकती।

ये राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं – कोर्ट

तभी पीठ की अगुवाई कर रहे न्यायाधीश प्रशांत कुमार ने उनकी दलीलों से असहमति जताते हुए कहा कि इसमें राज्य का कौन सा अधिकार शामिल है। ये राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है।

जस्टिस कुमार ने कहा कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री, चल रही जांच के बीच में आकर , लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकता, और फिर दलीलें दे, इसे राज्य और केंद्र के बीच का विवाद न बनाया जाए। जस्टिस कुमार ने आगे कहा कि यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है। यह अपने आप में एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है जो संयोगवश मुख्यमंत्री भी है, जिसने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया।

गुरुस्वामी ने मामले में महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा शामिल होने की बात करते हुए पांच जजों की संविधान पीठ को भेजे जाने का आग्रह भी किया। गुरुस्वामी के बाद वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने बहस शुरू की और उन्होंने भी कहा कि ईडी मौलिक अधिकारों के हनन की दुहाई नहीं दे सकता।

संविधान एक जीवंत दस्तावेज- सुप्रीम कोर्ट

उन्होंने कहा कि ईडी ने ऐसी ही याचिका हाई कोर्ट में भी दाखिल की है तो फिर वह सुप्रीम कोर्ट में नहीं दाखिल कर सकता। यह केवल राम बनाम श्याम का केस नहीं है, यह एक असाधारण मुकदमा है।

जस्टिस कुमार ने कहा कि हम हमेशा कहते हैं कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है। हर नई स्थिति कोर्ट के सामने नये सवाल खड़े करेगी, और कोर्ट को मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए उन सवालों के जवाब देने होंगे।

संविधान और प्रविधानों की व्याख्या समय के साथ बदलती रहती है। शुरुआत में अभिषेक मनु सिंघवी ने बंगाल राज्य की ओर स से बहस की थी। बहस कल भी जारी रहेगी।

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