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बंगाल में 15 साल बाद ढह गया ममता बनर्जी का किला

बंगाल में 15 साल बाद ढह गया ममता बनर्जी का किला

श्रीनारद मीडिया, स्‍टेट डेस्‍क:

पश्चिम बंगाल और असम समेत पांच राज्यों में नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। बंगाल में बीजेपी 200 सीटों के करीब पहुंच गई है। वहीं असम में भी BJP की आंधी आई है और पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। तमिलनाडु में इस बार खेल ही बदल गया। ऐक्टर विजय की टीवीके बहुमत के करीब पहुंच गई है। इधर केरल में कांग्रेस गठबंधन ने जीत का दावा कर दिया है। पुडुचेरी में फिर से एनडीए की सरकार रिपीट होती नजर आ रही है।

पश्चिम बंगाल में संवेदनशील माहौल देखते हुए मतगणना केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। बंगाल में एक तरफ जश्न मनाया जा रहा है तो दूसरी तरफ, आसनसोल, बैरकपोर और बाकुरा में टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं में झड़प के मामले सामने आ रहे हैं। बंगाल में संभावित चुनावी हिंसा को देखते हुए ही केंद्रीय बलों को तैनात किया गया है। इस बार तमिलनाडु, केरल और पुडुच्चेरी में भी जमकर मतदान हुआ था।

बंगाल में बीजेपी के पक्ष में ऐसे सुनामी आई ।

पहला फैक्टर- ध्रुवीकरण। ममता की छवि, उनके बयान और पार्टी नेताओं के बयानों ने हिंदू वोटरों को बीजेपी के पक्ष में एकजुट किया।

दूसरा फैक्टर- रिवर्स पोलराइजेशन। हुमायूं कबीर कोई बड़ा फैक्टर नहीं रहा। बावजूद इसके इस तरह का माहौल बनाया गया कि हुमायूं के पक्ष में कुछ इलाकों में मुस्लिम एकजुट हो रहे हैं। ममता के स्टिंग ऑपरेशन, शुरुआत में ओवैसी के गठबंधन की वजह से रिवर्स पोलराइजेशन का माहौल बना। ग्रामीण इलाकों में हिंदू एकजुट।

तीसरा फैक्टर – ओबीसी एकजुटता। ममता बनर्जी ने इस फैक्टर को छुआ नहीं। अब तक बंगाल की सत्ता में कायस्थ, ब्राह्मण हावी रहे। ग्रामीण इलाकों में बीजेपी ने ओबीसी मुख्यमंत्री, ओबीसी सरकार की आवाज को बुलंद किया। टीएमसी इसका काट नहीं कर पाई।

चौथा फैक्टर – बदलाव की बुलंद आवाज। ममता बनर्जी तीन बार से सीएम है। सत्ता विरोधी लहर को बीजेपी ने हवा दी। ममता के राज को जंगल राज बताया। कटमनी और महिला सुरक्षा को मुद्दा बनाया। ममता विकास के नाम पर इसको काटने की कोशिश की लेकिन फेल रही।

पांचवां फैक्टर – वोटर मूवमेंट प्लान।
बंगाली अस्मिता  के नाम पर टीएमसी ने सत्ता में वापसी की। बीजेपी ने इसकी काट निकाली। बंगाल से बाहर रह रहे 12 से 15 फीसदी वोटरों का मूवमेंट कराया। ये वो वोटर रहे जो रोजी रोजगार के लिए राज्य से बाहर गए थे। बीजेपी का टारगेट औसतन अपना वोट पांच से सात फीसदी बढ़ाने का था। उन लोगों को अप्रोच किया जो बंगाल से बाहर रह रहे थे। बिहार में भी सेम प्रयोग किया था।

छठा फैक्टर – माइक्रो मैनेजमेंट। बीजेपी ने देश के अलग अलग राज्यों से करीब दस हजार कार्यकर्ताओं को लगाया। एक विधानसभा में करीब 30 से 40 दूसरे राज्यों के वर्कर की टीम। इसमें संगठन के पदाधिकारी से लेकर सांसद, विधायक सब लगे। करीब 45 से 50 दिनों का टास्क पूरा किया। इसके लिए भाषा या क्षेत्र का बाउंडेशन नहीं किया। हर टीम में एक दो बांग्ला भाषी को रखा। बिहार , झारखंड , असम, पूर्वोत्तर के रहने वाले सीमावर्ती कार्यकर्ताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में ड्यूटी दी।

सातवां फैक्टर – भद्रलोक का भरोसा । पिछले चुनाव में भद्रलोक का समर्थन आखिरी वक्त में बीजेपी को नहीं मिला। ममता जीत को लेकर कॉन्फिडेंट हो गईं थी। इस बार भद्रलोक बोला नहीं। टूटने का मैसेज गया। देश की मीडिया युद्ध में व्यस्त रही। बीजेपी ने नितिन नवीन को भद्रलोक का प्रतीक बनाकर पेश किया। कुर्ता, धोती और जैकेट के जरिए संदेश दिया। कोलकाता में ही नितिन नवीन ने छोटी बड़ी 50 से ज्यादा मीटिंग, मुलाकात की ।

आठवां फैक्टर – RSS का शक्ति सहयोग। इस चुनाव के लिए rss ने करीब दो लाख बैठकें कंप्लीट की। RSS ने ग्रामीण इलाकों को फोकस किया। सरकारी कर्मचारी और लेफ्ट की विचारधारा से प्रभावित परिवारों को हिंदूवादी विचार से आकर्षित किया। ग्रामीण इलाकों को अलग अलग सेक्टर में बांटकर रणनीति बनाई।

नौवां फैक्टर – बंगाली अस्मिता का बीजेपी संस्करण।
बंगाल को लेकर बीजेपी ने अलग रणनीति पर काम किया। उन मुद्दों को हवा नहीं दी जिससे अस्मिता पर चोट का मौका ममता बनर्जी को मिल पाता। बीजेपी ने लोकल लीडर को आगे रखा। बातचीत, बयानबाजी में उनको ही तरजीह दी। उनसे ही एजेंडा सेट करवाए। ममता को चोट करने का मौका नहीं मिला। झालामुरी, फुटबॉल, मछली हर तस्वीर में संदेश था।

दसवां फैक्टर- महिला शक्ति। महिलाओं के लिए अलग अलग राज्यों में चल रही स्कीम को आधार बनाया। सुरक्षा को टॉप एजेंडे में रखा। Rg कर पीड़ित परिवार को उम्मीदवार बनकर संदेश दिया कि महिला सम्मान और सुरक्षा उसी की नीति है। अमित शाह के भाषण और बयानों को जूनियर नेताओं ने दोहराया। कैसेट और टेप सुदूर इलाकों में बजवाए गए।

ग्यारहवां फैक्टर- सुरक्षा। बंगाल के चुनाव में खून खराब आम माना जाता रहा है। शहरी क्षेत्रों में संभ्रांत वोटर डर के मारे निकलते नहीं थे। इस बार जवानों की तैनाती, कश्मीर की सुरक्षा वाले हथियारों का प्रदर्शन, चुनाव बाद भी जवानों के डिप्लॉयमेंट के भरोसे ने महिला वोटरों के डर को खत्म किया। वोट परसेंटेज बढ़ा।

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