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सीजेआई सूर्यकांत ने चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून सुनवाई से खुद को अलग किया

सीजेआई सूर्यकांत ने चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून सुनवाई से खुद को अलग किया

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को उन याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति और सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती दी गई थी। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ को आज इस मामले की सुनवाई करनी थी, तभी CJI ने हितों के टकराव की बात उठाते हुए खुद को सुनवाई से अलग करने का फैसला किया।

बार एंड बेंच के मुताबिक, इस दौरान CJI ने टिप्पणी की, “क्या मुझे इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए? तल तो कोई भी मुझ पर हितों के टकराव (conflict of interest) का आरोप लगा सकता है।” इसके बाद उन्होंने इस मामले से खुद को अलग कर लिया। गौरतलब है कि जिस कानून को चुनौती दी गई है, उस पर इस आधार पर सवाल उठाए गए हैं कि यह चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए गठित पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखता है।

मामला क्या?

दरअसल यह पीठ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। मामले की सुनवाई इस आधार पर की जा रही है कि उक्त कानून ने प्रधान न्यायाधीश को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार चयन समिति से बाहर रखा है।

SC ने क्या व्यवस्था दी थी?

दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित यह कानून, उच्चतम न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले के कुछ महीनों बाद आया, जिसमें शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति द्वारा की जाए।

न्यायालय ने कहा था कि जब तक कोई नया कानून पारित नहीं हो जाता, यह व्यवस्था लागू रहेगी। इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है। मार्च 2023 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति के परामर्श पर की जाएगी।

 भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार समिति से सीजेआइ को हटाने के 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देनेवाली याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है।

सीजेआइ सूर्यकांत का कहना है कि इस मामले में हितों का टकराव होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुक्रवार को जस्टिस जायमाल्या बागची और विपुल एम. पंचोली की पीठ की अध्यक्षता करते हुए कहा, ”मुझ पर हितों के टकराव का आरोप लगाया जाएगा।” मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले की सुनवाई एक ऐसी खंडपीठ को करनी चाहिए, जिसमें कोई न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में नहीं हो।

CJI ने दिए निर्देश

याचिकाकर्ताओं में से एक के लिए उपस्थित अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सुझाव पर मुख्य न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल को एक अन्य बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए और संकेत दिया कि नई बेंच में वे न्यायाधीश होंगे जो मुख्य न्यायाधीश के पद को ग्रहण करने की कतार में नहीं हैं।

खंडपीठ उन जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रविधानों की वैधता को चुनौती देती हैं। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के चयन पैनल से बाहर किया था।

यह कानून, जिसे संसद ने दिसंबर 2023 में पारित किया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। बेंच ने कहा था कि यह प्रणाली तब तक प्रभावी रहेगी जब तक एक नया कानून पारित नहीं होता।

याचिका में क्या कहा गया?

लेकिन केंद्र ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखने के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता न्यायिक सदस्य की उपस्थिति से उत्पन्न नहीं होती। अब 2023 के अधिनियम के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री के नामित एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) शामिल हैं।

याचिकाओं में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश का पैनल से बाहर होना नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर समेत कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है।

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