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एसजीपीसी ने ‘सतलुज’ फिल्म पर लगी रोक हटाने की मांग की है

एसजीपीसी ने ‘सतलुज’ फिल्म पर लगी रोक हटाने की मांग की है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

‘सतलुज’ फिल्म पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने शुक्रवार को अमृतसर में शक्ति प्रदर्शन किया। कमेटी की ओर से घंटाघर चौक स्थित गोल्डन प्लाजा से डिप्टी कमिश्नर कार्यालय तक पैदल मार्च निकाला गया। मार्च के समापन पर एडीसी (जनरल) पल्लवी शर्मा को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर फिल्म पर से प्रतिबंध तुरंत हटाने की मांग की गई।

मार्च में बड़ी संख्या में शिरोमणि कमेटी के पदाधिकारी, कर्मचारी, सिख संगत और विभिन्न धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने फिल्म पर रोक के खिलाफ आवाज उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी विषय को सामने रखने वाली फिल्म पर प्रतिबंध लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विपरीत है।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि ‘सतलुज’ फिल्म शहीद भाई जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष और उस दौर में सिख नौजवानों पर हुए कथित पुलिस अत्याचारों को सामने लाती है। उनका कहना था कि फिल्म पर रोक लगाकर सरकार ने सच को लोगों तक पहुंचने से रोकने का प्रयास किया है, जो उचित नहीं माना जा सकता।

प्रतिबंध तत्काल वापस लेने की रखी मांग

प्रधान धामी ने कहा कि शिरोमणि कमेटी किसी भी कीमत पर इस मुद्दे को दबने नहीं देगी। इसी उद्देश्य से राज्यपाल के माध्यम से सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने के लिए यह पैदल मार्च आयोजित किया गया। उन्होंने मांग की कि फिल्म पर लगाया गया प्रतिबंध तत्काल वापस लिया जाए ताकि लोग पूरे घटनाक्रम को देख और समझ सकें।

मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराया। प्रशासन की ओर से ज्ञापन प्राप्त कर इसे राज्यपाल तक पहुंचाने का आश्वासन दिया गया।

अंतिम अरदास में लोगों को पहुंचने की अपील

इस मौके पर शिरोमणि कमेटी के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मनन ने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज और एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी का संदेश भी संगत तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि 14 जुलाई 2026 को हरिके पत्तन में अंतिम अरदास आयोजित की गई है। इस अंतिम अरदास में बड़ी संख्या में संगत पहुंचे।

उन्होंने इसे मानवाधिकारों, न्याय और सच्चाई की आवाज को मजबूत करने का अवसर बताते हुए सभी से बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की। शिरोमणि कमेटी ने स्पष्ट किया कि फिल्म पर प्रतिबंध हटने तक लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करने का अभियान जारी रहेगा।

पिछली सदी के अंतिम दशक में पंजाब के अशांत दौर और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम ‘पंजाब 95’) इन दिनों गहरे विवादों में है। यह फिल्म रिलीज के महज दो दिन बाद ही रोक दी गई।

तीन जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर बिना किसी सेंसर कट के रिलीज हुई इस फिल्म को ‘सुरक्षा चिंताओं’ के चलते पांच जुलाई को हटा दिया गया था। अब केंद्र सरकार इस मामले को आइटी (सूचना और प्रसारण) नियम 2021 के तहत गठित एक अंतर-विभागीय समिति को सौंपने की तैयारी में है, जो इसके भविष्य का फैसला करेगी।

सेंसर बोर्ड को दरकिनार करने का आरोप

सूत्रों के मुताबिक, फिल्म निर्माता थिएटर रिलीज के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा सुझाए कट्स को टालते रहे और इसे चुपचाप नए नाम ‘सतलुज’ के साथ ओटीटी पर रिलीज कर दिया।

चूंकि ओटीटी प्लेटफॉर्म सीधे तौर पर सेंसर बोर्ड के दायरे में नहीं आते, इसलिए निर्माताओं ने इस कानूनी ढाल का फायदा उठाने की कोशिश की। जब यह बात सरकार के संज्ञान में आई, तो देश की संप्रभुता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जी5 को तुरंत इसे हटाने का निर्देश दिया गया।

आपातकालीन शक्तियों और नियमों का हवाला

हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने आईटी नियमों के तहत ‘आचार संहिता’ पर रोक लगा रखी है, लेकिन सरकार ने नियम 16 के तहत अपनी ‘आपातकालीन शक्तियों’ का इस्तेमाल किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय जैसे कई विभागों के प्रतिनिधियों वाली यह समिति अब फिल्म की गहन समीक्षा करेगी।

समिति के पास फिल्म में संशोधन करने, चेतावनी जारी करने या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत इसे पूरी तरह प्रतिबंधित करने की सिफारिश करने का अधिकार है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कला की अभिव्यक्ति और राष्ट्र की सुरक्षा के इस टकराव में ‘सतलुज’ की धारा आगे बढ़ पाती है या नहीं।

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