सतलुज विवाद के बीच IT एक्ट में संशोधन पर विचार
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

सेंसर बोर्ड से नकारे जाने के बावजूद गुरुद्वारों में विवादित फिल्म ‘सतलुज’ को दिखाए जाने के बाद सरकारी स्तर पर विचार शुरू हो गया है कि किसी भी मंच पर फिल्म दिखाने के लिए लाइसेंस की जरूरत होनी चाहिए। यानी सिनेमाघर और ओटीटी ही नहीं किसी छोटे, निजी, धार्मिक मंच पर भी सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया जा सकता है।
दरअसल, 2022 में ही इस फिल्म पर सेंसर बोर्ड की ओर से आपत्ति जताई गई थी, जिसमें पंजाब में चले आतंकवाद के दौर को एकतरफा पुलिस बर्बरता के रूप में दिखाने की कोशिश हुई थी।
सवा सौ से अधिक कट करने को कहे गए थे, जिसके बाद फिल्म निर्माता बांबे हाई कोर्ट गए थे, लेकिन 2025 में कोर्ट के रुख को देखते हुए याचिका वापस ले ली गई थी। यानी एक तरह से यह मामला बंद माना गया था, लेकिन चुपके से फिल्म ओटीटी जी-5 पर रिलीज कर दी गई।
गुरुद्वारों में दिखाई जा रही है फिल्म ‘सतलुज’
सरकारी आदेश के बाद देश में ओटीटी पर तो फिल्म प्रतिबंधित हो गई, लेकिन पंजाब में एसजीपीसी, कट्टरपंथी अमृतपाल की पार्टी वारिस पंजाब दे और शिरोमणि अकाली दल की ओर से गुरुद्वारों में यह प्रतिबंधित फिल्म दिखाई जा रही है।
पंजाब में अगले कुछ महीनों में चुनाव हैं। दिलजीत दोसांझ की इस फिल्म में पुलिस बर्बरता को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है और आतंकवाद की भेंट चढ़े पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को ही बर्बरता के नायक के रूप में दिखाने का प्रयास किया गया है। इस फिल्म ने राजनीतिक हलचल मचा दी है। जब यह फिल्म सेंसर बोर्ड के सामने लाई गई थी तो इसका नाम गल्लूघरा था। यानी नरसंहार।
सरकार कर रही आईटी एक्ट में संशोधन पर विचार
इस फिल्म को आज भी सेंसर बोर्ड से अनुमति नहीं मिली है, लेकिन सिर्फ नाम बदलकर दिखाया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि सरकार में मंथन चल रहा है कि आईटी एक्ट की धारा 69 ए में संशोधन कर यह भी शामिल किया जाना चाहिए कि किसी भी मंच पर कोई भी फिल्म दिखाने के लिए सेंसर बोर्ड की अनुमति चाहिए। उनके अनुसार, दुनिया के सभी देशों में ऐसी व्यवस्था है।
सूत्रों के अनुसार, यह फिल्म आईटी एक्ट की धारा 69 ए का उल्लंघन है, क्योंकि सेंसर बोर्ड ने पाया था कि फिल्म देश की संप्रभुता और सुरक्षा को भी नुकसान पहुंचाती है। बताते हैं कि सेंसर बोर्ड के सामने आई फिल्म में पंजाब के अंतरराष्ट्रीयकरण की भी कोशिश हुई थी।
फिल्म में बिना किसी ठोस तथ्य के 25 हजार से अधिक मौत की बात की गई थी। सेंसर बोर्ड ने इसे भी हटाने को कहा था। राजनीतिक रूप से यह फिल्म कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करती है, क्योंकि उस वक्त उसी की सरकार थी। लेकिन मुख्य रूप से कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू के लिए परेशानी का सबब बन गई है।
जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी पंजाबी फिल्म ‘सतलुज’ पर रोक लगने के बाद से ही पंजाब का एक पुराना और दर्दनाक जख्म फिर से हरा हो गया। इस प्रतिबंध के बाद राज्य में आतंकवाद के उस दौर को लेकर राजनीतिक बहस चरम पर पहुंच गई है। जहां एक तरफ विपक्षी दल उस समय की सरकारों की भूमिका पर तीखे सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया है।
रवनीत बिट्टू ने उस खौफनाक दौर की कुछ ऐसी तस्वीरें और वीडियो साझा किए हैं, जिसने पूरे पंजाब की राजनीति में हलचल मचा दी है। बिट्टू का साफ कहना है कि पंजाब के इतिहास को किसी एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता, बल्कि आने वाली पीढ़ी के सामने पूरा सच आना चाहिए। उन्होंने सवाल पूछा है कि क्या कभी कोई इस पर भी फिल्म बनाएगा। बिट्टू लगातार अपने इंटरनेट अकाउंट्स पर आतंकवाद के दौर की पोस्टों को साझा कर रहे हैं।
बम धमाके की वीडियो जारी कर मांगा जवाब
पोस्ट में केंद्रीय मंत्री ने 80 व 90 के दशक में हुए खतरनाक रेडियो बम धमाकों का एक वीडियो साझा किया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे उस दौर में आतंकवादी सार्वजनिक जगहों पर रेडियो, ट्रांजिस्टर या बच्चों के खिलौनों में बम छिपाकर रख देते थे। जैसे ही कोई अनजान व्यक्ति या बच्चा उन्हें उठाता, भयानक विस्फोट हो जाता था। इस तरह की कायराना हरकतों से पूरे सूबे में खौफ फैलाया जाता था और शाम होते ही गलियों में सन्नाटा पसर जाता था। बिट्टू ने जोर देकर कहा-
- इतिहास का केवल एक पहलू नहीं, बल्कि पूरा सच जानना आवश्यक है।
- यह वह दर्द है जो पंजाब ने अपने निर्दोष लोगों की कुर्बानियों से सहा है।
- हर पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए और उन्हें हमेशा याद रखा जाना चाहिए।
- सच्ची शांति केवल सत्य के मार्ग से ही प्राप्त होती है।
बच्चों के सामने प्रिंसिपल को मारी थी गोली
एक अन्य वीडियो में उन्होंने सरकारी स्कूल की बहादुर महिला प्रिंसिपल निर्मल कांता की तस्वीर साझा करते हुए चुनौती दी कि अगर किसी में सच दिखाने की हिम्मत है, तो इस दर्दनाक घटना पर फिल्म बनाकर दिखाए। बिट्टू ने दावा किया कि वर्ष 1990 में आतंकवादियों ने स्कूल परिसर के भीतर मासूम बच्चों के सामने इस प्रिंसिपल की गोली मारकर बेरहमी से हत्या कर दी थी।
उनका अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने गरीब बच्चों की भलाई के लिए आतंकवादियों द्वारा तय किए गए ड्रेस कोड को लागू करने के लिए थोड़ा समय मांग लिया था। इस मामूली बात पर प्रतिबंधित आतंकी संगठन बब्बर खालसा ने उनकी जान ले ली। बिट्टू ने कहा कि ऐसी वीरांगना का बलिदान भी दुनिया के सामने आना जरूरी है।
