कुलपति के दामन पर मोबिल फेंकना गलत है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

किसी व्यक्ति पर मोबिल फेंकना विरोध का आदर्श तरीका नहीं हो सकता। कानून अपना काम करे, दोषी जो भी हो उसे सजा मिले।
लेकिन…
क्या कभी किसी ने यह पूछा कि आखिर एक छात्र उस स्थिति तक पहुंचता क्यों है?
क्या जयप्रकाश विश्वविद्यालय में सब कुछ आदर्श है?
क्या यहां समय पर परीक्षा होती है? क्या समय पर रिजल्ट आता है? क्या मार्कशीट और पंजीयन की गड़बड़ियां खत्म हो चुकी हैं? क्या छात्रों को अपने ही विश्वविद्यालय में सम्मानपूर्वक प्रवेश मिलता है? क्या एक सामान्य छात्र की समस्या बिना महीनों दौड़ाए हल हो जाती है?
अगर इन सभी सवालों का जवाब “हां” है, तो फिर छात्र विरोध क्यों कर रहे हैं?
लेकिन अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर असली सवाल छात्रों से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।
छपरा, सारण और आसपास के लाखों परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए खेत बेचते हैं, कर्ज लेते हैं और उम्मीदें लगाते हैं। गांव से कोई छात्र सुबह बस पकड़कर 300-500 रुपये खर्च कर विश्वविद्यालय पहुंचता है और शाम को बिना काम हुए वापस लौट जाता है।
किसी की मार्कशीट में गड़बड़ी। किसी का एडमिट कार्ड गलत। किसी का पंजीयन अधूरा। किसी की डिग्री वर्षों से लंबित। किसी का सत्र इतना लेट कि नौकरी की उम्र निकल जाए।
तीन साल का कोर्स पांच साल में पूरा हो जाए तो यह सिर्फ शैक्षणिक समस्या नहीं, यह युवाओं के सपनों पर हमला है।
जब छात्र धरना देते हैं, कितने पत्रकार उनकी समस्याएं प्रमुखता से छापते हैं?
जब हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर होता है, तब कितने लोग विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगते हैं?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन उससे भी बड़ा दायित्व है समस्याओं का समाधान करना।
अगर विश्वविद्यालय छात्रों की बात सुने, समय पर परीक्षा और परिणाम दे, प्रमाणपत्रों की समस्याओं का समाधान करे और छात्रों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करे, तो ऐसे विवाद पैदा ही नहीं होंगे।
सवाल मोबिल का नहीं है।
सवाल उन लाखों सपनों का है जो हर दिन विश्वविद्यालय की फाइलों में फंसकर दम तोड़ रहे हैं।
और इस सवाल का जवाब किसी छात्र को नहीं, व्यवस्था को देना होगा।
क्योंकि छात्र पढ़ने आते हैं, लड़ने नहीं।
