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सोमनाथ:जहाँ समुद्र शिव का नाम जपता है

सोमनाथ:जहाँ समुद्र शिव का नाम जपता है

मंदिर निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष आलेख

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अरब सागर की लहरें जब सोमनाथ के पत्थरों से टकराती हैं, तब लगता है जैसे जल किसी मंदिर से नहीं, समय से संवाद कर रहा हो। समुद्र का अपना कोई धर्म नहीं होता, फिर भी वह सदियों से इस तट पर आकर माथा टेकता है। मनुष्य ने इसे शिव का ज्योतिर्लिंग कहा, इतिहास ने इसे आक्रमणों का स्थल कहा, राजनीति ने इसे प्रतीक बनाया, लेकिन समुद्र अब भी इसे केवल एक उजाला समझता है, जो अँधेरे के बीच टिका हुआ है। शायद प्रकृति मनुष्यों से अधिक उदार होती है। वह नामों में नहीं उलझती।

सोमनाथ केवल मंदिर नहीं है। यह भारतीय स्मृति का ऐसा शंख है जिसमें पराजय भी गूँजती है और पुनर्जन्म भी। यहाँ पत्थरों से अधिक ध्वनियाँ हैं। अगर ध्यान से सुनिए तो किसी प्राचीन नाविक की थकी हुई साँस, किसी शिल्पी की हथौड़ी, किसी स्त्री की प्रार्थना, किसी साधु की राख, किसी राजा की महत्वाकांक्षा और किसी पराजित सभ्यता की मौन कराह एक साथ सुनाई पड़ती है। मनुष्य का इतिहास भी विचित्र चीज़ है। वह हर टूटन को आख़िरकार कथा में बदल देता है।

सुबह का सोमनाथ एक ऋचा की तरह खुलता है। सूरज जब समुद्र के भीतर से निकलता है तो लगता है शिव ने अपनी जटाओं से अग्नि का कमल बाहर रख दिया हो। मंदिर की दीवारों पर नमक की महीन परत चमकती है। हवा में घुली समुद्री नमी घंटियों की ध्वनि को भी गीला कर देती है। वहाँ खड़े होकर यह समझ में आता है कि भारतीय संस्कृति ने ईश्वर को आकाश में कम, ध्वनि में अधिक खोजा है। घंटा बजता है और भीतर की अनेक मृत चीज़ें थोड़ी देर के लिए जीवित हो उठती हैं।

सोमनाथ का रास्ता केवल भूगोल का रास्ता नहीं है। यह भारतीय मानस के भीतर जाने वाली सुरंग है। यहाँ आते हुए आदमी अपने साथ अपना धर्म, अपनी जाति, अपनी राजनीति, अपना दुख, अपनी थकान, अपना अभिमान सब लेकर आता है; लेकिन समुद्र के सामने खड़े होते ही उसे पता चलता है कि लहरें किसी परिचय-पत्र को नहीं पढ़तीं। वे केवल छूती हैं और लौट जाती हैं। शायद इसी कारण समुद्र के किनारे बने मंदिर अधिक विनम्र लगते हैं। उन्हें हर क्षण अपने डूब सकने का ज्ञान रहता है।

कई सभ्यताओं ने अपने देवताओं को पहाड़ों पर रखा, भारत ने उन्हें यात्राओं में रखा। सोमनाथ उसी यात्रा का एक अनन्त पड़ाव है। यहाँ श्रद्धा स्थिर नहीं रहती, चलती रहती है। कोई वृद्ध काँपते हाथों से जल चढ़ाता है, कोई बच्चा सीपियाँ बटोरता है, कोई नवविवाहित जोड़ा समुद्र की ओर देखकर चुप हो जाता है, कोई साधु दूर क्षितिज में कुछ खोजता रहता है। मंदिर के बाहर चाय बेचने वाला लड़का भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना गर्भगृह का पुजारी। संस्कृति केवल शास्त्रों में नहीं होती, वह उबलती हुई केतली में भी होती है। भारत इसी कारण बचा रहा। यहाँ आध्यात्म और भाप एक साथ उठते हैं।

सोमनाथ के इतिहास को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि यह मंदिर कम, राख से उठता हुआ कोई पक्षी अधिक है। कितनी बार टूटा, कितनी बार बना। मनुष्य को शायद सबसे अधिक भय पत्थरों से नहीं, स्मृतियों से होता है। इसलिए आक्रमणकारी सबसे पहले स्मृति पर चोट करता है। लेकिन भारतीय संस्कृति की एक विचित्र आदत है। यह मरती नहीं, रूप बदल लेती है। कभी लोकगीत बन जाती है, कभी कथा, कभी तीर्थयात्रा, कभी किसी दादी की आवाज़। सोमनाथ उसी जीवित स्मृति का पत्थरीला फूल है।

मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर यदि आँखें बंद की जाएँ तो भीतर कोई पुराना वैदिक वन उगने लगता है। कहीं दूर ऋषि अग्नि में आहुतियाँ डाल रहे हैं। किसी नाव में बैठा व्यापारी समुद्र यात्रा से पहले प्रार्थना कर रहा है। किसी स्त्री ने अपने पति की वापसी के लिए दीप जलाया है। किसी कवि ने पहली बार लहरों को सुनकर छंद बनाया है। संस्कृति का जन्म ऐसे ही होता है। वह किसी संसद में पारित नहीं होती। वह धीरे-धीरे मनुष्यों की साँसों में जमती है।

सोमनाथ का सबसे बड़ा सौन्दर्य उसका विरोधाभास है। यहाँ वैराग्य भी है और वैभव भी। साधु की भस्म भी है और पर्यटक का मोबाइल कैमरा भी। कोई मंत्र पढ़ रहा है, कोई सेल्फ़ी ले रहा है। प्राचीनता और आधुनिकता एक ही सीढ़ी पर बैठी दिखाई देती हैं। कभी-कभी लगता है भारत दरअसल एक विशाल रेलवे प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ वेद, वाई-फाई, पुराण, प्लास्टिक की बोतलें, शंख, ड्रोन कैमरे और नारियल पानी एक साथ उपस्थित रहते हैं। और आश्चर्य यह कि यह अव्यवस्था भी किसी गहरे संगीत की तरह काम करती है।

रात में सोमनाथ का रंग बदल जाता है। समुद्र काला पड़ने लगता है और मंदिर दूधिया रोशनी में किसी स्वप्न की तरह चमकता है। दूर बैठा आदमी समझ नहीं पाता कि वह पत्थर देख रहा है या प्रकाश। लहरें लगातार आती रहती हैं। उनमें एक अजीब धैर्य है। वे जानती हैं कि मनुष्य अपने इतिहास से थक जाएगा, पर जल का गीत नहीं रुकेगा। शायद इसी कारण सोमनाथ में खड़े होकर मृत्यु का भय थोड़ा कम हो जाता है। वहाँ लगता है कि नष्ट होना अन्त नहीं है। टूटना भी एक प्रकार की यात्रा है।

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि उसने भव्य मंदिर बनाए; बल्कि यह कि उसने टूटे हुए मनुष्य को भी प्रार्थना करना सिखाया। सोमनाथ उसी शिक्षा का समुद्री संस्करण है। यहाँ आकर आदमी अपने भीतर के ध्वंस को भी स्वीकारने लगता है। उसे लगता है कि अगर यह मंदिर इतने आक्रमणों के बाद फिर खड़ा हो सकता है, तो मनुष्य का हृदय भी किसी दिन फिर उजाला पा सकता है।

समुद्र के किनारे बैठा एक बच्चा रेत से छोटा-सा शिवलिंग बना रहा था। अगली ही लहर आई और उसे बहा ले गई। बच्चा कुछ क्षण उदास रहा, फिर मुस्कुराकर दोबारा बनाने लगा। शायद भारतीय संस्कृति का सबसे सटीक दर्शन वही बच्चा है। निर्माण यहाँ घटना नहीं, स्वभाव है।

और तब समझ में आता है कि सोमनाथ केवल गुजरात में नहीं है। वह भारतीय आत्मा के उस हिस्से में है जहाँ मनुष्य हार मानने से इनकार करता है। जहाँ स्मृति राख से फिर उठती है। जहाँ पत्थर भी कविता की तरह धड़कते हैं। जहाँ समुद्र हर शाम आकर यह कहता है कि समय चाहे जितना निर्दयी हो जाए, प्रकाश का एक स्तम्भ हमेशा बचा रहेगा।

आभार-~ परिचय दास

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