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आज महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती है

आज महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज महाराणा प्रताप की जयंती है. देशप्रेम, साहस, शौर्य, पराक्रम से भारतीयों के मन में गौरव और गर्व का भाव भरकर, मनोबल बढ़ानेवाले इतिहास के विलक्षण अमर महानायक.उनकी वीरता, साहस, शौर्य और सरोकार को शत-शत नमन. उन्हें याद करते हुए श्यामनारायण पांडेय की कविता ‘हल्दीघाटी’ का स्मरण हो रहा है.

आज उसी की अमर–वीरता
व्यक्त करूंगा गानों में.
आज उसी के रणकौशल की
कथा कहूंगा कानों में

यह एक मामूली अंश है. ‘हल्दीघाटी’ काव्यखंड कुल 17 सर्गों में है. 1941 में प्रकाशित हुई थी. बचपन में ही हमने इसे पढ़ा. व्यस्क होने पर इसके मर्म को अच्छे से समझा. गुलामी से मुक्ति और राष्ट्र के निर्माण के लिए बलिदान-कुर्बानी की महान वीरता की गाथा है, इस खंडकाव्य में. हल्दीघाटी युद्ध का जीवंत विवरण. इतिहास में हल्दीघाटी की लड़ाई को ऐसा मोड़ माना जाता है, जहां से भारतीयों का आत्मसम्मान और स्वाभिमान शीर्ष पर पहुंचा.

डॉ राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था, पिछले हजार वर्षों में भारत के राष्ट्रीय चरित्र को समझने के लिए एक वाक्य काफी है कि यहां एक हल्दीघाटी है, तो 50 या 100 बक्सर हैं. (प्रखर समाजवादी राजनीतिक कार्यकर्ता, लेखक, चिंतक और लोहिया-जेपी के करीबी अरुण भोले की चर्चित किताब ‘राजनीति मेरी प्रेयसी’ में उद्धृत).हल्दीघाटी वह जगह है, जहां 18 जून 1576 को अकबर की सेनाओं के साथ मेवाड़ के राणा प्रताप सिंह का घनघोर युद्ध हुआ था.

राणा प्रताप करीब-करीब आखिरी सिपाही तक लड़ते रहें.पर, 22 अक्तूबर 1764 को बक्सर के मैदान में जब अंग्रेज और भारतीयों का मुकाबला हुआ, तो बंगाल के नवाब मीर ​कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और दिल्ली के बादशाह शाह आलम की सम्मिलित सेना में लगभग 50 हजार सिपाही थे.अंग्रेजों की तरफ बस तीन-चार हजार. लेकिन लड़ाई से मुश्किल से पांच मिनट चली. फतह अंग्रेज सेनापति मेजर हेक्टर मुनरो की हुई. है न चौंकानेवाली बात. पुन:, महाराणा प्रताप की स्मृतियों को शत-शत नमन.

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