सीवान के महामाया प्रसाद बने थे बिहार के प्रथम गैर कांग्रेसी मुख्य मंत्री
दिलचस्प तथ्य यह कि वे अपने जनक्रांति दल के एकमात्र विधायक होते हुए भी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए थे
बिहार के पांचवें सीएम, बहुमत कांग्रेस का, सत्ता विपक्ष की
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अविश्वास के बीच, 329 दिन बाद बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार गिर गई
सीवान आजादी के बाद बिहार में लगातार कांग्रेस की सरकार बन रही थी। लेकिन सूब में साल 1967 में पहली बार कांग्रेस की सरकार न बनकर एक मिलीजुली सरकार बनी और मुख्यमंत्री बने महामाया प्रसाद सिन्हा। उनके मुख्यमंत्री बनने की कहानी भी दिलचस्प है, क्योंकि वह अपनी पार्टी जन क्रांति दल के एकमात्र विधायक होते हुए भी सीएम बन गए थे। हालांकि उनकी मिलीजुली सरकार एक साल के अंदर ही गिर गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री महामाया सिन्हा का जन्म सीवान के महराजगंज प्रखंड के पतेढी गांव में 1909 में हुआ था। सीवान जिले से अब तक मात्र एक महामाया प्रसाद सिन्हा ही मुख्यमंत्री बने हैं।
महामाया प्रसाद सिन्हा एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी व बिहार के 5वें मुख्यमंत्री थे। वह जनता की समस्याओं से अवगत होने के लिए खुद सड़क पर उतरकर आम लोगो के बीच जाकर उनसे बाते करते व उसका समाधान करते थे। आखिर एक ईमानदार नेता को जनता व प्रदर्शनकारी से किसी भी प्रकार का भय नही होता है।
1967 का साल भी कुछ ऐसा ही था — जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत था, मगर सियासी बिसात ऐसी बिछी कि सरकार विपक्ष की बन गई। मुख्यमंत्री की कुर्सी उस नेता को मिली, जिनकी अपनी पार्टी में वह अकेले विधायक थे — महामाया प्रसाद सिन्हा। यह वही दौर था जब जनता बदलाव के मूड में थी, कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ रही थी और राजनीति में सिद्धांत बनाम सत्ता की लड़ाई पूरे उफान पर थी।
महामाया प्रसाद सिन्हा का जन्म 1 मई 1909 को सिवान जिले के महाराजगंज के पटेढ़ी गांव में हुआ था। पिता चाहते थे कि बेटा आईसीएस (उस समय आज की सिविल सर्विस परीक्षा के आईएएस को आईसीएस कहा जाता था) बने, और 1929 में उन्हें इसका अवसर भी मिला,वह ICS अधिकारी थे लेकिन 1929 में महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से प्रभावित होकर अपनी सिविल सेवा की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था।
अगले साल 1930 में उनकी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी हुई और जेल में हीट स्ट्रोक के चपेट में आने व सही इलाज के नही मिलने के कारण उनके बोलने की क्षमता प्रभावित हो गयी थी। फिर वह ज़िन्दगी भर साफ नही बोल पाए व लड़खड़ा के बोलते थे। वह 1932 में राष्ट्रीय कांग्रेस कमिटी के सदस्य बने व 1935 में बिहार प्रोविंशियल कांग्रेस के सेक्रेटरी बने। 5 जनवरी,1967 को बिहार के 5वें मुख्यमंत्री बने। 1977-80 में उन्होंने लोकसभा के सदस्य के तौर पर भूमिका भी निभाई।
प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू उन्हें “प्रखर वक्ता और बिहार के सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ताओं में से एक” मानते थे। 1977 में वे जनता पार्टी से पटना से सांसद बने और 12 फरवरी 1987 को उनका निधन हुआ।
महामाया प्रसाद सिन्हा का मुख्यमंत्री बनना बिहार के राजनीतिक इतिहास का एक अपवाद था — एक ऐसा उदाहरण जो दोबारा नहीं दोहराया गया। अकेले विधायक होकर मुख्यमंत्री बनना, बिना किसी बड़े दल के समर्थन के, फिर भी वैचारिक गठबंधन को चलाना — यह उनके नेतृत्व और व्यक्तित्व की ताकत थी। भले ही उनकी सरकार एक साल भी नहीं चली, लेकिन उन्होंने जो शुरुआत की, उसने बिहार की राजनीति को नई दिशा दी — जहां सत्ता सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि सिद्धांत और साहस से तय होती है।
