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गौरैया: स्मृतियों की चहचहाहट

गौरैया: स्मृतियों की चहचहाहट

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

गौरैया—एक छोटा-सा नाम, पर उसके भीतर जैसे पूरा आकाश सिमटा रहता है। वह आकाश, जो कभी हमारे आँगन की मुंडेरों पर उतर आता था, खपरैलों की दरारों में घर बना लेता था और सुबह की पहली किरण के साथ अपने नन्हें पंखों से दिन को जगाता था। आज वही आकाश कहीं दूर चला गया है, जैसे किसी ने धीरे-धीरे उसकी आवाज़ को चुरा लिया हो।

गौरैया केवल एक चिड़िया नहीं थी; वह घर की आत्मा थी। वह उस समय का संकेत थी जब जीवन में कृत्रिमता की जगह सहजता थी। जब खिड़कियाँ खुलती थीं तो हवा के साथ चहचहाहट भी भीतर आती थी। जब रसोई में दाल छंटती थी, तो कुछ दाने अनायास ही उसके हिस्से में गिर जाते थे। वह उन दानों को केवल खाती नहीं थी, उन्हें अपनी चोंच में लेकर जैसे एक संबंध भी बुनती थी—मनुष्य और प्रकृति के बीच का, जो अब धीरे-धीरे टूट रहा है।

गौरैया का जीवन किसी कविता की तरह है—सरल, लयात्मक और गहन। वह कभी अकेली नहीं दिखती; उसका अस्तित्व हमेशा ‘साथ’ में है। जोड़ा बनाकर उड़ना, साथ बैठना, साथ चोंच मारना—उसके जीवन में ‘मैं’ की जगह ‘हम’ है। शायद इसी कारण उसकी अनुपस्थिति भी अकेलेपन का बोध कराती है। जैसे किसी घर में बहुत कुछ होते हुए भी कुछ नहीं बचा हो।

सुबह की वह बेला याद आती है, जब सूर्य अभी पूरी तरह उगा नहीं होता था, और आकाश हल्के सुनहरे रंग में भीग रहा होता था। उसी समय गौरैया की चहचहाहट शुरू होती थी—न कोई औपचारिकता, न कोई आग्रह। वह जैसे कहती थी कि जीवन अपने आप में एक उत्सव है, जिसे मनाने के लिए किसी विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं। उसकी आवाज़ में कोई आडंबर नहीं था, पर उसमें एक अजीब-सी ताजगी थी, जो थके हुए मन को भी हरा-भरा कर देती थी।

अब शहरों में कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। ऊँची-ऊँची इमारतें, काँच की दीवारें, बंद खिड़कियाँ—इन सबने उस छोटे-से जीव के लिए जगह ही कहाँ छोड़ी है। मोबाइल टावरों की अदृश्य तरंगें, कीटनाशकों की गंध, और शोर का अनवरत कोलाहल—ये सब मिलकर उसकी दुनिया को धीरे-धीरे संकुचित करते गए। वह जो कभी हर आँगन में थी, अब खोजने पर भी नहीं मिलती। जैसे स्मृतियों का कोई धुँधला कोना बनकर रह गई हो।

विश्व गौरैया दिवस हर वर्ष बीस मार्च को आता है। यह दिन केवल एक तिथि नहीं, एक स्मरण है—उस छोटे-से जीव के प्रति, जिसने बिना कुछ माँगे हमारे जीवन में इतनी मधुरता घोली। यह दिन हमें याद दिलाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हमने क्या-क्या खो दिया है। यह एक तरह का आत्मालोचन है, जिसमें हम अपने ही बनाए हुए संसार की समीक्षा करते हैं और पाते हैं कि उसमें जीवन की सरलतम ध्वनियाँ ही गायब हो गई हैं।

गौरैया का जाना केवल एक पक्षी का विलुप्त होना नहीं है; यह हमारे भीतर की उस संवेदना का क्षय है, जो प्रकृति के साथ संवाद करती थी। अब हम प्रकृति को ‘देखते’ हैं, ‘जीते’ नहीं। हमारे बच्चे किताबों में गौरैया का चित्र देखते हैं पर उसकी चहचहाहट नहीं सुनते। उनके लिए वह एक ‘वस्तु’ है, अनुभव नहीं। यह अंतर बहुत गहरा है और शायद यही सबसे बड़ा शोक भी।

गाँवों में अभी भी कहीं-कहीं उसकी झलक मिल जाती है। मिट्टी की दीवारों के बीच, कच्चे घरों की छतों पर या किसी पेड़ की घनी शाखाओं में वह अपने छोटे-से संसार को बचाए हुए है। वहाँ उसकी चहचहाहट अभी भी जीवन की लय को बनाए रखती है पर यह लय भी धीरे-धीरे टूट रही है, जैसे समय की उँगलियाँ उसे धीरे-धीरे मिटा रही हों।

गौरैया का रंग भी कितना साधारण है—न कोई चटकपन, न कोई आकर्षण। भूरे-सफेद रंगों का एक संयमित संतुलन पर शायद यही उसकी सुंदरता है। वह अपनी सादगी में ही पूर्ण है। वह यह नहीं जानती कि सुंदरता क्या होती है पर उसकी उपस्थिति ही सुंदरता का एक रूप बन जाती है। यह एक ऐसा सौंदर्य है, जो दिखावे से नहीं, अस्तित्व से पैदा होता है।

उसकी उड़ान भी बहुत ऊँची नहीं होती। वह आसमान को छूने का प्रयास नहीं करती बल्कि धरती के करीब रहकर ही अपने संसार को रचती है। यह एक तरह का संतुलन है—आकांक्षा और यथार्थ के बीच। वह हमें यह सिखाती नहीं पर उसके जीवन में यह सहज ही उपस्थित है कि हर ऊँचाई आवश्यक नहीं, हर विस्तार जरूरी नहीं। कभी-कभी छोटे-छोटे दायरों में भी एक पूर्ण जीवन संभव है।

जब वह घोंसला बनाती है, तो तिनका-तिनका जोड़ती है। हर तिनका उसके श्रम और धैर्य का प्रमाण होता है। वह किसी वास्तुकार की तरह नहीं सोचती पर उसका बनाया हुआ घर किसी भी महल से कम नहीं होता—क्योंकि उसमें सुरक्षा है, अपनापन है और एक जीवन की निरंतरता है। यह घर केवल रहने की जगह नहीं, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाने वाले जीवन का पुल है।

अब प्रश्न यह नहीं कि गौरैया क्यों जा रही है; प्रश्न यह है कि हम क्यों नहीं समझ पा रहे कि उसके जाने का अर्थ क्या है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, यह हमारी संवेदना का संकट है। जब हम छोटे-छोटे जीवों के लिए जगह नहीं बचा पाते तो धीरे-धीरे अपने भीतर भी जगह खोने लगते हैं। हमारा मन भी वैसा ही कंक्रीट हो जाता है—सख्त, बंद, और निस्पंद।

फिर भी, कहीं न कहीं एक उम्मीद बची रहती है। जैसे किसी पुराने घर के कोने में अचानक एक गौरैया आकर बैठ जाए, और उसकी चहचहाहट से वह घर फिर से जीवित हो उठे। यह उम्मीद बहुत छोटी है, पर यही सबसे बड़ी भी है क्योंकि जीवन हमेशा छोटे-छोटे संकेतों में ही लौटता है, बड़ी घोषणाओं में नहीं।

विश्व गौरैया दिवस का अर्थ तभी है, जब वह केवल एक ‘दिवस’ बनकर न रह जाए। जब हम अपने घरों की खिड़कियाँ फिर से खोलें, अपने आँगन में कुछ दाने रखें, अपने आसपास कुछ पेड़ लगाएँ, और सबसे बढ़कर, अपने भीतर उस जगह को बचाए रखें जहाँ एक छोटी-सी चिड़िया आकर बैठ सके। क्योंकि अगर वह जगह बची रही, तो गौरैया भी लौट आएगी—और उसके साथ वह खोई हुई चहचहाहट भी, जो जीवन को जीवन बनाती है।

 

आभार~ परिचय दास

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