Headlines

हिंदी का संतकाव्य और चम्पारण-डॉ. विनय कुमार सिंह

हिंदी का संतकाव्य और चम्पारण-डॉ. विनय कुमार सिंह

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी द्वारा होटल रूद्र के सभागार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-19 मार्च) के प्रथम दिन के कार्यक्रम में सहभागी होने का अवसर मिला। पूर्वाह्न 10 बजे से ‘संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम अनेक सत्रों में अपराह्न लगभग 6 बजे तक चलता रहा।

कार्यक्रम में प्रो० संजय श्रीवास्तव (माननीय कुलपति), डॉ० रामजी तिवारी, डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचयदास’, प्रो० राजेन्द्र बड़गूजर, डॉ० रामेश्वर मिश्र, डॉ० पूर्णमल गौड़, प्रो० सिद्धार्थ शंकर, डॉ० अशोक बत्रा, डॉ० कृष्ण कुमार सिंह, प्रो० विमलेश कुमार सिंह, प्रो० श्याम कुमार झा, डॉ० बबलू पाल, डॉ० उमेश पात्रा सहित अनेक विद्वज्जन थे।
कार्यक्रम के संयोजकद्वय डॉ० गोविंद प्रसाद वर्मा तथा डॉ० श्यामनंदन जी थे और सह-संयोजक डॉ० गरिमा तिवारी एवं डॉ० आशा मीणा थीं। डॉ० गरिमा तिवारी, विकास कुमार और डॉ० मनीष कुमार भारती मंच-संचालक थे।

मेरा वक्तव्य चम्पारण के संतकाव्य पर था :-

हिंदी का संतकाव्य और चम्पारण

शब्दकोश की दृष्टि से, ‘संत’ शब्द का अर्थ व्यापक है। परिभाषा की दृष्टि से, “संत शब्द सबसे पहले ‘विष्णु सहस्त्रनाम्’ में आया है- वीरहा रक्षण: संत:। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में इसका अर्थ किया है – सन्मार्गवर्तिन: संत: अर्थात् सत् के मार्ग पर चलने वाले संत हैं।”1

अस्तु, हिंदी साहित्य की दृष्टि से हिंदी काव्य में निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी कवियों के काव्य को संतकाव्य की संज्ञा दी जाती है। आचार्य शुक्ल ने ज्ञानाश्रयी कवियों को संत की श्रेणी में ही रखा है। संत कवियों के भक्तिमार्ग की विशेषता बतलाते हुए वे लिखते हैं, “इसकी ओर ले जाने वाली सबसे पहले प्रवृत्ति जो लक्षित हुई, वह ऊँच-नीच और जाति- पाँति के भाव का त्याग और ईश्वर की भक्ति के लिए मनुष्य-मात्र के समान अधिकार का स्वीकार था।”2

इसके विषय में बच्चन सिंह लिखते हैं, “‘संत’ शब्द पर मतभेद की गुंजाइश है। कबीर तथा उनके अनुसरणकर्ताओं को ही संत क्यों कहा जाय ? रामविलास शर्मा तुलसीदास के ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ को पूरी तरह मानते हैं। इसलिए सगुणमार्गी भी संत हैं और निर्गुणमार्गी भी। वे इस बात को भी नहीं स्वीकार करते कि निर्गुण ईश्वर की उपासना अधिक प्रगतिशील है और सगुण ईश्वर की उपासना कम प्रगतिशील । सभी संतों की प्रगतिशीलता का वजन बराबर है। वर्णाश्रम धर्म के समर्थक तुलसी उतने ही प्रगतिशील हैं, जितने वर्णाश्रम धर्म-भंजक कबीर।”3

संतकाव्य के अध्येता, आलोचक परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक ‘संतकाव्य’ में आदि कवि जयदेव से लेकर स्वामी रामतीर्थ के समय तक की चुनी हुई रचनाएँ संगृहीत की हैं। वे लिखते हैं, “संत-परंपरा के अंतर्गत साधारणतः वे ही संत सम्मिलित किये जाते हैं, जिन्होंने संत कबीर साहब अथवा उनके किसी अनुयायी को अपना पथ-प्रदर्शक माना है और उनमें ऐसे अन्य संतों की भी गणना कर ली जाती है, जिन्होंने उनके द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों को किसी न किसी रूप में अपनाया है। इसके सिवाय उसमें कभी-कभी वैसे महात्माओं को भी स्थान दिया जाता है, जो सूफ़ी, वेदांती संगुणोपासक भक्त, जैनी वा नाथपंथी समझे जाते हुए भी, अपने विचार-स्वातंत्र्य एवं निरपेक्ष व्यवहार के कारण संतवत् माने जाते रहे हैं।”4

संतकाव्य से सम्बद्ध सूक्ष्म मत-मतांतर जो भी हो, पर सभी विद्वज्जन संत कवियों की विशेषताओं की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ये अनादि अनंत ब्रह्म के नाम का स्मरण करते हैं, पारंपरिक नवधा भक्ति की अपेक्षा भावपरक भक्ति पर जोर देते हैं, बाह्याचार पर ध्यान नहीं देते, प्रेम और भक्ति पर जोर देते हैं।

संत कवियों का मुख्य उद्देश्य कविता लिखना नहीं था। संतमत का आधार या सतगुरु के ज्ञान का मुख्य आधार शब्द-धुन है, जो उनके उपदेश का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, उनके आध्यात्मिक ज्ञान की आधारशिला है। शब्द-धुन को ही संतमत बताते हुए डॉक्टर जूलियन जॉनसन लिखते हैं, “साधारण शब्दों में कह सकते हैं कि शब्द-धुन की यह धारा वही सृजनहार है, जिसका स्पंदन सारे ब्रह्मांड में हो रहा है। यह परमात्मा से आ रही आध्यात्मिक जीवन की वह लहर है, जो संपूर्ण सृष्टि में हर जीव तक पहुँच रही है। इसी शब्द-धुन से उस सृजनहार ने समस्त रचना की है और इसकी सँभाल कर रहा है। शब्द-धुन के कारण सभी गतिमान हैं, अस्तित्व में हैं और अंत में इसी में समा जाएँगे।”5

संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव अखिल भारतीय रहा। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में, उसकी जनपदीय भाषाओं में संत-परंपरा का समृद्ध साहित्य उपलब्ध है। इसका अध्ययन और अनुशीलन इसलिए अपेक्षित है कि “ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज को भारतीय विचार-परंपरा और दर्शन में सदा सर्वोच्च मानवीय लक्ष्य”6 माना गया है। .. और समष्टि का समग्र अध्ययन करना हो तो व्यष्टि (क्षेत्र-विशेष) का अध्ययन भी अपेक्षित है। इस दृष्टि से हम चम्पारण के संतकाव्य का अध्ययन कर सकते हैं।

चम्पारण में संत कवियों की परम्परा में सरभंग संप्रदाय का प्रभावक्षेत्र व्यापक रहा। प्रो० कामेश्वरशर्मा ने लिखा है, “सरभंग सम्प्रदाय के अनुयायी निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करते हैं और मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं रखते । वे इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना आदि नाड़ियों के संयमन द्वारा स्वर की साधना करते हैं और शून्य में अनहद नाद को सुनकर आनन्दित होते हैं।”

सरभंग-परंपरा के बारे में पं० रमेश चंद्र झा जी ने लिखा है, “चम्पारन में सरभंगों की मोटा मोटी पाँच परम्पराएँ मिलती हैं- (1) सदानन्द जी, (2) करता राम, (3) भीनकराम, (4) हरलाल बाबा, (5) भीखम और टेकभन राम की परम्परा ।
यहाँ चम्पारन के सरभंगों की परम्परा की संक्षिप्त रूप-रेखा प्रस्तुत की जा रही है-
1. सदानन्दजी – आप मिरजापुर (मझौलिया) के निवासी थे, मूल नाम चित्रधर मिश्र था। ×× आप संवत् 1885 के आस पास विद्यमान थे । आपकी एक पुस्तक ‘योगांग-मुक्तावली’ राष्ट्रभाषा परिषद के ‘चौबे-संग्रह’ में सुरक्षित है।7
उनके शिष्य थे, मँगुराहाँ (गोविंदगंज) के परम्पत बाबा (जो संस्कृत और ज्योतिष के अच्छे जानकार थे), गौरीदत्त और मनसा राम।
2. करता राम – ये बलिया जिला स्थित ददरी गाँव के निवासी वीर सिंह के पुत्र थे। कालांतर में गंडकी के किनारे ढेकहाँ (सत्तर घाट) झोपड़ी बना कर रहने लगे। इनकी वाणी है –

“कहै गरीबी झूठ न बोले, जथा लाभ संतोषा है,
तन-मन से उपकार पराया, करता संत अनोखा है।

ना कछु देखौं पूजा पाठ में ना कुछ तीरथ-यात्रा में,
करता राम संत सब देखें राम नाम रस-मात्रा में।

तिलक छाप में राम मिले नहिं नहिं कपड़ा रंगवावे ते,
करता राम संत सोइ जानौं नामहिं सुरति लगावे ते।

झूठी बात न बोले कबहूँ मिहनत करके खाता है,
आठो पहर नाम रस पीवे करता संत कहाता है !”8

धवल राम – ये करता राम के भाई थे ।

3. भीनक राम – पं० रमेश चंद्र झा जी लिखते हैं कि ये आदापुर से उत्तर राजपुर नामक ग्राम के निवासी थे।
4. हरलाल बाबा – इनका जन्म संवत 1801 हरिहरपुर (गोपालगंज) में हुआ बताया जाता है। ये बड़हरवा मठ (गंडकी तट) में रहते थे।
5. भीखम और टेकमन राम की परम्परा – जीवधारा के निकट माधोपुर गाँव के निवासी थे। टेकमन राम इनके शिष्य थे।

चम्पारण में संत कबीर (1398-1518 ई०) का व्यापक प्रभाव रहा। डॉ० शोभाकांत झा जी की एक शोधपरक कृति ही है, ‘महर्षि कबीर और चम्पारन'(2003), इसमें चंपारण एवं उसके आसपास के कबीरपंथी मठों और गुरु परंपरा के महंतों की सूची दी हुई है।
वे लिखते हैं, “चम्पारन में सन्तों की एक परम्परा है, जिस पर महर्षि कबीर का स्पष्ट प्रभाव है, जिसे सरभंग सम्प्रदाय के नाम से जानते हैं । इसपर शैव तथा वैष्णव परम्परा का पूर्ण प्रभाव दिखता है । सिद्धों से विकसित सन्त परम्परा जात-पात, वेद, कर्म काण्ड को अस्वीकार करती है और उनके आधार पर फैले हुए अंधविश्वास, बाह्य आडम्बर पर कुठाराघात करती है । सरभंग का अर्थ इस क्षेत्र में यही लिया जाता है कि जो छुआछूत, जाति प्रथा, ऊँच-नीच, खान-पान में भेदभाव नहीं करता है वह सरभंगी है।”9

झा जी चम्पारण में सरभंग संप्रदाय की छह परंपराओं का जिक्र करते हैं -(1) करता राम-धवल राम की परम्परा,(2) भीखम राम की परम्परा, (3)सदानन्द बाबा की परम्परा, (4)हरलाल बाबा की परम्परा, (5) भिनक राम की परम्परा और (6) योगेश्वराचार्य की परम्परा।

चम्पारण की संत परंपरा में संत-वाणी के कुछ उदाहरण देखें –

हंसा करना नेवास, अमरपुर में।
चलै ना चरखा, बोलै ना ताँती
अमर चीर पेन्है बहु भाँती ॥ हंसा०॥10
– भीखम राम

कुलवा में दगवा बचइह हे सोहागिनि!
दूध से दही, दही से माखन, घीउआ बनके रहिहऽ हे सोहागिनि !
ऊँख से गुड़, गुड़ से चीनी, मिसरी बनके रहिहऽ हे सोहागिनि।
सीरी टेकमन राम दयाकर सतगुरु के, जगवा से नतवा लगइहऽ हे सोहागिनि ॥11
– टेकमन राम

टूटे पचरंगी पिंजड़वा हो सुगना उड़ि जाय ।
सुगनू रहले पिंजड़वा में सोभा बरनी ना जाय ।।12
– योगेश्वर राम (रूपवलिया मठ, चम्पारण)

गुरूजी से करब अरजिया हो राम घुमरि-घुमरि ।
मन दरियाव पाहुन एक अइले पाँच पचिस संग सधिया ।।
पाँच पचिस मिलिके बिजन बनाइले जेंवे बइठे मन रसिया ।
रामनेवाज दया कैलीं सतगुरू सहजे छुटल कुल जतिया ।।13
– रामनेवाज मिश्र (भीखम राम के पुत्र और शिष्य)

संत कवियों के बारे में हरिमोहन शर्मा ने सही कहा है, “मानवमात्र की समानता और पीड़ित जनता के प्रति अबाध सहानुभूति के कारण संत कवि आज तक प्रासंगिक बने हुए हैं। कबीर, रैदास और नानक-जैसे संत कवि अपनी वाणियों से सामान्य जनता को न केवल प्रभावित करते हैं, बल्कि उनमें आशा, प्रेरणा और उत्साह पैदा करते हैं। संतकाव्य स्वार्थपरता एवं तुच्छताओं को त्यागकर मनुष्य को सत्कर्म के मार्ग पर चलना सिखाता है और मनुष्य को मनुष्य बने रहने की प्रेरणा देता है।”14

संदर्भ :-
1. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, भाग-7, प्रधान संपादक – शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद्, 2019, पृष्ठ -3026
2. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, लोकभारती प्रकाशन, 2012, पृष्ठ -42
3. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन,2006, पृष्ठ -83
4. संतकाव्य, परशुराम चतुर्वेदी, किताब महल, 1952 (प्र०सं०), प्रस्तावना
5. अध्यात्म मार्ग, डॉ० जूलियन जॉनसन, राधास्वामी सत्संग ब्यास, 2011, पृष्ठ -434
6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, पृष्ठ -4
7. चम्पारण की साहित्य-साधना, श्री रमेशचन्द्र झा, भारती प्रकाशन, पृष्ठ -36
8. उपरिवत, पृष्ठ -38
9. महर्षि कबीर और चम्पारन, डॉ० शोभाकांत झा, 2003, पृष्ठ -91
10.भोजपुरी के कवि और काव्य, श्री दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, 2001, पृष्ठ 119
11. उपरिवत्, पृष्ठ -121
12.बिहार के निर्गुण भक्त कवि, डॉ० तारकेश्वर उपाध्याय, कल्पना प्रकाशन,2023, पृष्ठ -65
13.उपरिवत्, पृष्ठ -69
14. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, पृष्ठ -3831

Leave a Reply

error: Content is protected !!