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महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में मेरा व्याख्यान

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संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना

संत साहित्य का अभिकेंद्रक ईश्वर नहीं, मनुष्य है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

संत साहित्य पर बोलना मानो उस हवा को छूने की चेष्टा है, जो दिखाई नहीं देती, पर हर स्पर्श में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। वह किसी ग्रंथालय की शांत अलमारियों में बंद कोई जड़ परंपरा नहीं बल्कि एक जीवित कंपन है—इतिहास की भीड़ में अपनी अलग लय पर धड़कता हुआ। यह वही स्वर है जो अपने समय से असहमत होते हुए भी उससे कटता नहीं बल्कि भीतर ही भीतर उसे बदलने का साहस करता है। शायद यही कारण है कि इसे समझना आसान नहीं और स्वीकार करना उससे भी कठिन।

संत साहित्य का मूल स्वर अनुभव है—निजी किन्तु केवल निजी नहीं। यह वह अनुभव है जो व्यक्ति के भीतर जन्म लेता है पर वहीं ठहरता नहीं; वह लोक की धड़कनों में घुल जाता है। “आँखिन देखी” की जिद केवल देखने की बात नहीं करती, वह देखने के अधिकार की घोषणा करती है। यहाँ कोई मध्यस्थ नहीं, कोई शास्त्रीय आडंबर नहीं—सत्य और मनुष्य के बीच एक सीधा संवाद है और एक सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि यह इंगित करती है कि यह अनुभव, जितना आत्म का है, उतना ही समाज का भी—एक ऐसी अंतर्ध्वनि, जिसमें ‘मैं’ और ‘हम’ का भेद धीरे-धीरे विलीन हो जाता है।

यहीं से संत साहित्य का प्रतिरोध जन्म लेता है। यह प्रतिरोध तलवार की तरह चमकता हुआ नहीं बल्कि जल की तरह भीतर-भीतर बहता हुआ है। यह सत्ता से टकराता नहीं उसे धीरे-धीरे क्षीण करता है। प्रतीकों के अर्थ बदल देता है शब्दों की दिशा मोड़ देता है और इस तरह वह उस पूरी संरचना को हिला देता है जो अपने को अटल मान बैठी थी। एक गहरी दृष्टि इसे “विघटन की मौन प्रक्रिया” कहती है—जहाँ कोई शोर नहीं पर परिवर्तन अवश्यम्भावी है।

भाषा इस परिवर्तन का सबसे सुंदर माध्यम बनती है। संतों ने जनभाषा को अपनाया—वही भाषा, जिसमें जीवन साँस लेता है। यह चयन केवल सुविधा का नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्वायत्तता का संकेत है। भाषा यहाँ केवल अभिव्यक्ति नहीं, प्रतिरोध भी है। जब शब्द जनता के हो जाते हैं, तब विचार भी स्वतंत्र होने लगते हैं। यही कारण है कि संत साहित्य में भाषा एक जीवित प्राणी की तरह चलती है—सहज पर गहरी; सरल पर बहुस्तरीय।

इस बहुस्तरीयता में अर्थ स्थिर नहीं रहता। वह हर बार नए संदर्भ में नया रूप लेता है। एक ही पद, एक ही पंक्ति—समय के साथ अपना अर्थ बदलती रहती है, जैसे नदी हर मोड़ पर नई दिखाई देती है। एक सूक्ष्म विश्लेषण यह कहता है कि संत काव्य में अर्थ का यह प्रवाह ही उसकी स्थायित्व का कारण है। वह किसी एक व्याख्या में कैद नहीं होता; वह हमेशा खुला रहता है—नई व्याख्याओं, नए अनुभवों के लिए।

‘मैं’ का प्रश्न यहाँ एक रहस्य की तरह उपस्थित होता है। यह ‘मैं’ अहंकार का केंद्र नहीं बल्कि अस्तित्व का एक खुला द्वार है। यह अपने को खोजते-खोजते स्वयं को खो देने की प्रक्रिया है। एक विचार यह भी उभरता है कि संतों का ‘मैं’ दरअसल “अहं का विसर्जन” है—जहाँ व्यक्ति अपने सीमित स्वरूप से बाहर निकलकर एक व्यापक चेतना में विलीन हो जाता है। यह खोज जितनी सुंदर है, उतनी ही कठिन भी, क्योंकि इसमें कोई निश्चित मार्ग नहीं, कोई अंतिम ठिकाना नहीं।

देह यहाँ उपेक्षित नहीं बल्कि स्वीकार की जाती है। यह केवल बंधन नहीं, अनुभव का एक आवश्यक माध्यम है। संत साहित्य में देह एक ऐसा क्षेत्र बन जाती है, जहाँ आत्मा और समाज दोनों की छवियाँ एक साथ दिखाई देती हैं। एक सूक्ष्म दृष्टि इसे “संघर्ष का जीवित स्थल” कहती है—जहाँ आध्यात्मिकता और यथार्थ एक-दूसरे में उलझते और खुलते रहते हैं। इस प्रकार देह केवल साधन नहीं बल्कि अर्थ का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन जाती है।

समाज की कल्पना भी यहाँ विशुद्ध आदर्शवाद नहीं है। यह उस अनुभव से उपजती है, जो असमानता और विभाजन को जी चुका है। संतों के यहाँ समता कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि एक जी हुई सच्चाई है। वे बराबरी की बात इसलिए नहीं करते कि वह सुनने में अच्छी लगती है, बल्कि इसलिए कि उसके बिना जीवन अधूरा है। यह दृष्टि संत साहित्य को एक नैतिक गहराई प्रदान करती है जो उसे केवल काव्य नहीं रहने देती।

संत साहित्य का प्रतिरोध अपनी संरचना में अद्भुत है। वह शब्दों को नहीं बदलता, उनके अर्थ बदल देता है। वही प्रतीक, वही संकेत—पर एक नई व्याख्या। यह “विपरीत अर्थ-निर्माण” की प्रक्रिया है, जिसमें भाषा स्वयं विद्रोह का माध्यम बन जाती है। यह विद्रोह ऊँचा स्वर नहीं उठाता पर उसकी गूँज दूर तक जाती है।

यदि आधुनिक दृष्टि से देखें तो संत साहित्य केवल भक्ति की परिधि में सीमित नहीं रहता। वह आत्म की खोज, सत्ता के प्रश्न, और भाषा की स्वतंत्रता जैसे अनेक विमर्शों से जुड़ता है। एक विचार यह भी कहता है कि यह साहित्य एक “वैकल्पिक आधुनिकता” का संकेत देता है—ऐसी आधुनिकता जो अपनी जड़ों से जुड़ी है, पर अपनी दिशा स्वयं तय करती है।

संत साहित्य एक चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ा होता है। उसे पढ़ना आसान है पर उसे जीना कठिन। वह हमें हमारे अपने ही प्रश्नों के सामने ला खड़ा करता है—ऐसे प्रश्न, जिनसे बचना संभव नहीं। वह पूछता है कि क्या हमारा सत्य सचमुच हमारा है या केवल परंपरा का एक बोझ, जिसे हम ढोते चले जा रहे हैं।

इस प्रकार संत साहित्य कोई समाप्त कथा नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाला संवाद है—मनुष्य और उसके सत्य के बीच। यह संवाद कभी पूर्ण नहीं होता, और शायद इसी अधूरेपन में उसकी पूर्णता छिपी है।

आभार~ परिचय दास

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