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अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है?

अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पहला कारण यह है कि यह युगों के परिवर्तन की तिथि है। दूसरा कारण यह है कि इस दिन कई दिव्य घटनाएं घटित हुईं जैसे परशुराम जन्म, गंगावतरण और अक्षय पात्र की प्राप्ति। तीसरा कारण यह है कि यह संधिकाल है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा सबसे अधिक सक्रिय होती है। चौथा कारण यह है कि इस दिन किए गए दान, पुण्य और पूजन का फल अनंत गुना होकर मिलता है। पाँचवाँ कारण यह है कि ग्रीष्म ऋतु के आरंभ पर जल, सत्तू और शीतल वस्तुओं के दान से समाज सेवा का भी पर्व मनाया जाता है।

अक्षय तृतीया केवल भौतिक समृद्धि का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी पर्व है। सनातन संस्था के अनुसार इस दिन ब्रह्मा एवं श्रीविष्णु, इन दो देवताओं का सम्मिलित तत्त्व पृथ्वी पर आने से वातावरण की सात्विकता में वृद्धि होती है। इस कालमहिमा के कारण पवित्र नदियों में स्नान, दान और धार्मिक कृत्य करने से अधिक आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन में अच्छे कर्म ही सबसे बड़ी संपत्ति हैं। धन के साथ-साथ पुण्य भी कमाना चाहिए और दूसरों की सहायता करना सबसे बड़ा धर्म है।

अक्षय तृतीया का धार्मिक महत्व

अक्षय तृतीया का धार्मिक महत्व कई पहलुओं से समझा जा सकता है:

सर्वसिद्ध मुहूर्त: यह तिथि “अबूझ मुहूर्त” है। इस दिन बिना कोई पंचांग देखे विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ, वाहन खरीद जैसे सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं.

पितृ तर्पण का महत्व: पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण और पिंडदान अक्षय फल प्रदान करता है। गंगा स्नान से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

दान का अक्षय फल: इस दिन दिए गए दान का कभी क्षय नहीं होता। जिन वस्तुओं का दान किया जाता है, मान्यता है कि वे अगले जन्म में भी प्राप्त होती हैं।

जैन धर्म में महत्व: जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने एक वर्ष के उपवास के बाद इक्षु (गन्ने) के रस से पारण किया था। इसीलिए इस दिन को “अक्षय तृतीया” कहते हैं।

विष्णु पूजन: यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। भगवान विष्णु, जो सृष्टि के पालनकर्ता हैं, उनकी आराधना इस दिन विशेष फलदायी मानी जाती है।

अक्षय तृतीया का इतिहास — पौराणिक कथाएं

अक्षय तृतीया का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। पुराणों और शास्त्रों में इस तिथि से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन मिलता है:

1. त्रेतायुग का आरंभ

हिंदू कालगणना के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सत्ययुग का अंत और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। इसीलिए इसे “युगादि तिथि” भी कहा जाता है। यह संधिकाल का समय होता है और हिंदू धर्मशास्त्र में संधिकाल में की गई साधना का फल अनेक गुना मिलता है।

2. भगवान परशुराम की जयंती

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। यही कारण है कि इस दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है।

3. माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण

भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा इसी दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, जिससे समस्त जीवों का उद्धार संभव हुआ।

4. अक्षय पात्र की प्राप्ति

महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान, भगवान सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को अक्षय पात्र प्रदान किया था। इस पात्र से कभी अन्न की कमी नहीं हुई और द्रौपदी इससे असंख्य लोगों का पेट भर सकती थीं।

5. सुदामा और कृष्ण का मिलन

द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा की दरिद्रता का नाश इसी तिथि को किया था। भक्ति और मित्रता की यह कथा आज भी लोगों को प्रेरणा देती है।

6. तीन अवतारों का प्राकट्य

इस दिन भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार, परशुराम अवतार और नरनारायण अवतार का प्राकट्य हुआ। इस दिन ब्रह्मा और श्रीविष्णु, इन दो देवताओं का सम्मिलित तत्त्व पृथ्वी पर आता है, जिससे पृथ्वी की सात्विकता बढ़ जाती है।

 

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