पृथ्वी के प्राचीन ताप में डूबा मलमास
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

राजगीर पृथ्वी की देह पर रखा हुआ वह प्राचीन ताप है जो समय के इतने लंबे प्रवाह के बाद भी ठंडा नहीं हुआ। पहाड़ों की पाँच परतों से घिरा यह नगर किसी भूगोल का हिस्सा कम, किसी बहुत पुराने स्वप्न का अवशेष अधिक लगता है। यहाँ पहुँचते ही मनुष्य को लगता है कि वह किसी शहर में नहीं, स्मृतियों की किसी धीमी गुफा में प्रवेश कर रहा है जहाँ पत्थर भी बोलते हैं और हवा भी किसी अनसुनी भाषा में अपना इतिहास दोहराती रहती है।
मलमास के दिनों में राजगीर का रूप और भी विचित्र हो उठता है। जैसे किसी शांत साधु की आँखों में अचानक एक विराट लोक जाग गया हो। दूर-दूर से आने वाले लोग, काँधे पर गमछा डाले बूढ़े, बच्चों का हाथ पकड़े स्त्रियाँ, धूल से भरे पाँव लिए यात्री, संन्यासी, गृहस्थ, भिक्षु, पंडे, गायों के पीछे चलते किसान, सब एक अदृश्य आह्वान से खिंचे चले आते हैं। कोई नहीं जानता कि यह पुकार कहाँ से उठती है। शायद पहाड़ों के भीतर से। शायद उन गर्म जलधाराओं से जो सदियों से पृथ्वी के भीतर जलती हुई अग्नि को अपने साथ ऊपर लाती रही हैं।
राजगीर में मलमास केवल एक मेला नहीं होता, वह समय का खुला हुआ द्वार होता है। ऐसा लगता है कि पृथ्वी ने अपने पुराने दिनों की गठरी खोल दी है और उसमें से धर्म, लोकविश्वास, पुराण, कथा, आस्था और मनुष्य की असंख्य थकानों को बाहर निकालकर धूप में फैला दिया है। यहाँ आने वाला हर आदमी केवल स्नान नहीं करता, वह अपनी भीतर की धूल धोना चाहता है। वह अपने दुखों की किसी अदृश्य राख को पानी में बहा देना चाहता है।
ब्रह्मकुंड की ओर जाने वाली गलियों में सुबह का उजाला धीरे-धीरे उतरता है। दुकानों पर अगरबत्तियों की गंध तैरती रहती है। कहीं गरम दूध उबल रहा होता है, कहीं पूड़ी तलती हुई कड़ाहियों से धुआँ उठता है, कहीं कोई बूढ़ा पंडा काँपती आवाज़ में मंत्र बोल रहा होता है। पहाड़ों के ऊपर से उतरती हुई हवा जब जलकुंडों की भाप से मिलती है तब पूरा वातावरण किसी पुरानी कथा की तरह धुँधला और रहस्यमय हो उठता है। मनुष्य वहाँ खड़ा होकर अपने समय को भूल जाता है। उसे लगता है कि वह किसी ऐसे काल में लौट आया है जहाँ जीवन अभी इतना कठोर नहीं हुआ था।
राजगीर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने भीतर अनेक युगों को एक साथ सँभाले रहता है। यहाँ बुद्ध की करुणा भी है, महावीर की निस्तब्धता भी, अजातशत्रु की महत्वाकांक्षा भी और अनगिनत लोकविश्वासों की अनगढ़ चमक भी। मलमास के दिनों में ये सब परतें जैसे एक-दूसरे के ऊपर आकर चमकने लगती हैं। कोई यात्री गर्म जल में डुबकी लगाते हुए बुद्ध का स्मरण करता है, कोई विष्णु का, कोई अपने पितरों का, और कोई केवल इस विश्वास का कि इस संसार में अभी भी कुछ ऐसा बचा हुआ है जो मनुष्य को भीतर से निर्मल कर सकता है।
राजगीर के पहाड़ इन दिनों बहुत ध्यान से मनुष्यों को देखते प्रतीत होते हैं। वे जानते हैं कि मनुष्य अपने भीतर कितनी थकान लेकर आता है। शहरों की धूल, असफलताओं की जलन, रिश्तों की उलझन, जीवन की अनगिनत पराजयों का बोझ लेकर लोग इन कुंडों तक पहुँचते हैं। और फिर जल में उतरते ही उनके चेहरे बदलने लगते हैं। पानी की भाप उनके माथों से चिपकी हुई चिंताओं को धीरे-धीरे ढीला करने लगती है। ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी स्वयं उन्हें अपनी गर्म हथेलियों से सहला रही हो।
रात में मेला और भी अलौकिक हो उठता है। पहाड़ अँधेरे में धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं, पर उनके भीतर का मौन अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगता है। दूर कहीं घंटियाँ बजती रहती हैं। भजन की आवाज़ हवा में तैरती रहती है। छोटे-छोटे बल्बों की रोशनी में दुकानों की कतारें किसी लोकचित्र की तरह चमकती हैं। बच्चे खिलौनों के पीछे भागते हैं। साधु अलाव के पास बैठे रहते हैं। कोई वृद्ध अपने पोते को कथा सुनाता है कि देवता इन दिनों राजगीर में निवास करते हैं। बच्चा विस्मय से पहाड़ों की ओर देखने लगता है, जैसे सचमुच अभी किसी चट्टान के पीछे से कोई देवता निकल आएगा।
मलमास के दिनों में राजगीर मनुष्य को यह विश्वास दिलाता है कि दुनिया केवल बाजार नहीं है। अभी भी पृथ्वी पर ऐसे स्थान बचे हुए हैं जहाँ लोग लाभ से अधिक विश्वास लेकर आते हैं। जहाँ हजारों अपरिचित लोग एक-दूसरे से बिना परिचय के भी जुड़े हुए महसूस करते हैं। जहाँ स्नान केवल शरीर की क्रिया नहीं रह जाता, वह आत्मा की किसी पुरानी प्यास का रूप ले लेता है।
राजगीर की भोर विशेष रूप से अद्भुत होती है। पहाड़ों के पीछे से सूरज धीरे-धीरे उठता है और उसकी पहली रोशनी जब जलकुंडों की भाप पर गिरती है तब पूरा दृश्य सोने की तरह चमकने लगता है। उस समय वहाँ खड़े होकर लगता है कि पृथ्वी अभी-अभी बनी है और मनुष्य पहली बार जल को इतने आदर से देख रहा है। पक्षियों की आवाज़ें दूर तक फैलती हैं। मंदिरों की घंटियाँ हवा में घुलती हैं। कुंडों से उठती भाप आकाश में विलीन होती रहती है। उस क्षण राजगीर किसी नगर की तरह नहीं, एक प्रार्थना की तरह दिखाई देता है।
यहाँ की मिट्टी में एक अजीब धैर्य है। उसने साम्राज्य देखे हैं, युद्ध देखे हैं, धर्मों का उत्थान और पतन देखा है, यात्रियों के असंख्य पाँव देखे हैं, फिर भी वह शांत बनी हुई है। मलमास के दिनों में वही मिट्टी फिर से मनुष्यों के पदचिह्नों से भर जाती है। हर पदचिह्न में एक इच्छा होती है, एक भय, एक प्रार्थना, एक उम्मीद। और राजगीर सबको अपने भीतर समेट लेता है, बिना किसी निर्णय के, बिना किसी शोर के।
कभी-कभी लगता है कि राजगीर वास्तव में एक नगर नहीं, पृथ्वी का स्मृति-कोश है। यहाँ समय सीधा नहीं चलता, गोल-गोल घूमता है। पुराण वर्तमान में उतर आते हैं, वर्तमान अचानक प्राचीन हो उठता है। एक आदमी मोबाइल से तस्वीर ले रहा होता है और उसके ठीक पास कोई वृद्ध स्त्री आँख बंद करके वैसा ही मंत्र दोहरा रही होती है जो शायद उसने अपनी माँ से सीखा था और उसकी माँ ने अपनी माँ से।
मलमास का मेला इसीलिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। वह मनुष्य की उस गहरी आकांक्षा का उत्सव है जिसमें वह अपने जीवन को किसी बड़े अर्थ से जोड़ना चाहता है। वह चाहता है कि उसके दुख केवल निजी दुख न रहें, वे किसी विराट परंपरा की नदी में बह जाएँ। राजगीर उसे यह अवसर देता है। वह कहता है, आओ, थोड़ी देर इस पृथ्वी के प्राचीन ताप के पास बैठो। अपनी थकान उतार दो। अपने भीतर के अंधेरे को इस भाप में घुल जाने दो।
मनुष्य देखता है कि पहाड़ अब भी वहीं हैं, जल अब भी गरम है, घंटियाँ अब भी बज रही हैं, और पृथ्वी ने अभी तक आशा छोड़ नहीं दी है।
आभार-~ परिचय दास
