पतझड़ के मौसम और गर्मियों की आहट
जेएनयू की खुरदुरी सड़कों पर टहलते हुए कई तरह के अनुभव हुए
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

कहीं आम के मंजर की महक महसूस हुई तो कहीं सूखे पत्तों से आती एक अलग तरह की सुगंध ने आज के अस्थिर समय में मन को स्थिर किया।
लेकिन जब हमलोग अरवली के बगल से गुज़र रहें थे, तब सड़क पर बिछे हुए सूखे पत्तों से एक अलग तरह की मदहोश करनेवाली महक आई, ठीक वैसी ही जैसे कि सोंधी मिट्टी, आम के मंजर और बुने हुए वस्त्रों से आती हैं! यह महक ही कुछ अलग तरह की होती हैं। बातचीत के क्रम में याद आये नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर और याद आई उनकी 1924 में पतझड़ और गमियों के पहले उनके द्वारा की गई चीन के तीन मशहूर शहरों में शंघाई, बीजिंग और नानजिंग की यात्रा जिसकी चर्चा करते हुए चीनी लेखक ली झांग और जेएनयू से पढ़े हिंदी के विद्वान ग फू फिंग ने बताया था कि जब वह सड़क पर घूम रहें थे तब उन्हें सड़क पर पड़े पत्तों और बिखरे फूलों के बीच एक अलग तरह के सौंदर्य का अहसास हो रहा था –
“मेरे जीवन के स्वामी क्या तुमने मेरे दिन और रातें सहेज कर रखीं? और अपने संगीत की श्रृंखला में मेरे पतझड़ और वसंत के गीतों को पिरो दो।…”
लोग कहते हैं कि टैगोर की यह यात्रा तब उपनिवेशवाद से लड़ रहे भारत और चीन में सांस्कृतिक आदान-प्रदान और बौद्धिक संवाद का एक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत की भी थी। तब उन्हें वहाँ पतझड़ के बाद आये अनगिनत फूलों के दर्शन हुए थे, पर आम के मंजर नहीं दीखे थे। आज जब आम के इस मंजर को देखा तो टैगोर भी याद आएं।
बातचीत के इस इस क्रम में टैगोर की जापान की यात्रा की भी चर्चा भी हुई, जहाँ राष्ट्रवाद पर दिए उनके भाषण काफ़ी चर्चित हुए थे। तब लोगों को यह अनुमान था कि भारत, चीन और जापान को जो चीज एक साथ खड़ी करती थी, वह था बौद्ध दर्शन और उसकी सीखें जो मानव के दुःख को दुनिया के सबसे बड़े सच के रुप में स्वीकार करने की बात करता था। कोई भी लेखक इसी दुःख के ज़रिये मानव मन के एकता की बात करता हैं जिसका एक उदात्त रूप अध्यात्म में भी दीखता हैं। कहीं-न-कहीं यह अध्यात्म और उससे निर्मित ज्ञान, इस दुःख को सामाजिक प्रक्रियाओं से जोड़ते हुए उसके सामाजिक पीड़ा को समझने एवं सामाजिक भराव की कोशिश भी करता हैं।

आधार प्रकाशन से इस वर्ष आई पुस्तक यह, वह देश तो नहीं : मॉरीशस, एक सामाजिक यात्रा/Mauritius : A Social Journey पर कार्य के दौरान मॉरीशस के ग्रामीण समाज से संवाद करते हुए बार -बार महसूस हो रहा था कि मानव मन, सामाजिक प्रक्रियायें, ज्ञान और प्रकृति की यह एक ऐसी आंतरिक धारा हैं जो चेतना के स्तर पर दुनिया को एक साथ खड़ा करती हैं और सामाजिक विकास की प्रक्रिया में एक नया अध्याय रचती हैं।
पतझड़ और गर्मियों के पाहले यह प्रकृति की अनेक निमितियों में दिखलाई पड़ती हैं जिसके रूप को रचने की कोशिश कवि या कोई दार्शनिक करता हैं। सबसे बड़ी बात हैं, जब आम के मंजर, नये फूल की पंखुड़ियाँ अथवा प्रकृति के नये उत्पादन आते हैं, तब उन्हें देखना और महसूस करना नई संराचनाओं से संवाद करने जैसे भी होता हैं। रविंद्रनाथ टैगोर, सुमित्रानन्दन पंत, शू थिंग, मासाओका शिकी आदि अपनी कविताओं में एक ऐसी ही दुनिया की रचना करते हैं जहाँ प्रकृति, जीवन और समाज एक सा दीखता हैं! एकदम आत्मीय, और एक दिल जैसा…; जैसे सदियों से साथ रहा हो!
यह भी तो प्रकृति उत्पादनों के ज़रिये मन की दुनिया के भीतर प्रवेश करने की एक प्रक्रिया जैसे ही तो हैं जिसे आत्मसत करते हुए मनुष्य वृहात्तर सामाजिक समूहों से जुड़ता हैं !
आभार-देवेंद्र चौबे
